Vijay Mallya Interview: 'क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए', विजय माल्या ने भारतीय एजेंसियों और प्रत्यर्पण पर तोड़ी चुप्पी

भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में भारतीय जांच एजेंसियों, बैंकों के कर्ज और अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर 'कॉकरोच' वाली टिप्पणी की है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

By INA News Desk
Sep 10, 2026 - 15:07
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Vijay Mallya Interview: 'क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए', विजय माल्या ने भारतीय एजेंसियों और प्रत्यर्पण पर तोड़ी चुप्पी
  • विजय माल्या का तीखा बयान: 'क्या मुझे कॉकरोच बनना होगा', बैंकों के कर्ज और भारत वापसी के कानूनी विवाद पर दी सफाई
  • 'क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए?' विजय माल्या ने बीबीसी इंटरव्यू में अपनी जिंदगी और कानूनी मामलों पर कही यह बात
  • 'क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए': ब्रिटेन में रह रहे विजय माल्या का इंटरव्यू में छलका दर्द, बैंकों के कर्ज विवाद पर बोले

लंदन में रह रहे भारतीय शराब और विमानन क्षेत्र के पूर्व दिग्गज कारोबारी विजय माल्या ने बीबीसी को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में अपने मौजूदा जीवन, कानूनी मामलों और भारत में अपनी बनाई गई सार्वजनिक छवि पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारतीय बैंकों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज न चुकाने और वित्तीय अनियमितताओं के मामलों में भारत सरकार द्वारा 'भगोड़ा आर्थिक अपराधी' घोषित किए जा चुके माल्या ने बातचीत के दौरान सवालिया लहजे में कहा, "क्या मुझे कॉकरोच बन जाना चाहिए और किसी कोने में छिप जाना चाहिए?" यह टिप्पणी उन्होंने अपनी सामान्य जीवनशैली जीने के अधिकार और भारत में उनके खिलाफ चल रहे तीखे विरोध के संदर्भ में की। माल्या ने दोहराया कि किंगफिशर एयरलाइंस का विफल होना एक व्यावसायिक असफलता थी, न कि कोई योजनाबद्ध धोखाधड़ी, और वे बैंकों का पूरा मूलधन लौटाने के लिए लंबे समय से तैयार थे।

  • 'कॉकरोच' वाली टिप्पणी और इंटरव्यू के मुख्य अंश

बीबीसी के साथ बातचीत में विजय माल्या से जब यह पूछा गया कि भारत में बैंकों के बकाए और कानूनी शिकंजे के बावजूद वे लंदन में किस तरह खुलकर अपनी जिंदगी जी रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं, तो उन्होंने नाराजगी भरे अंदाज में पलटवार किया। माल्या का कहना था कि जब तक कोई अदालत उन्हें अंतिम रूप से किसी अपराध का दोषी नहीं ठहरा देती, तब तक उन्हें एक सामान्य नागरिक की तरह जीने का अधिकार है।

माल्या ने कहा कि मीडिया और राजनीतिक विमर्श में उन्हें इस तरह चित्रित किया गया है मानो उनका कोई मानवाधिकार ही न बचा हो। उन्होंने कहा, "क्या लोग यह उम्मीद करते हैं कि मैं कॉकरोच बन जाऊं और जमीन पर रेंगते हुए किसी अंधेरे कोने में छिप जाऊं?" माल्या ने तर्क दिया कि किसी भी असफल कारोबारी को व्यक्तिगत स्तर पर पूरी तरह खत्म कर देने की मानसिकता न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि वे ब्रिटेन के कानूनों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं और वहां की न्यायपालिका के समक्ष अपने मामलों की पैरवी कर रहे हैं।

  • किंगफिशर एयरलाइंस का संकट- व्यावसायिक विफलता या वित्तीय अपराध?

इंटरव्यू के दौरान माल्या ने अपने पुराने रुख को फिर से दोहराया कि किंगफिशर एयरलाइंस का डूबना भारतीय विमानन क्षेत्र की आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम था। उन्होंने कहा कि एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) की आसमान छूती कीमतें, अत्यधिक टैक्स संरचना और उस समय की वैश्विक आर्थिक मंदी ने एयरलाइन की वित्तीय कमर तोड़ दी थी।

भारतीय जांच एजेंसियां केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) माल्या पर आरोप लगाती रही हैं कि किंगफिशर एयरलाइंस के नाम पर भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम से लिए गए 9,000 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज को जानबूझकर डायवर्ट किया गया। एजेंसियों का दावा है कि ऋण राशि का इस्तेमाल उन उद्देश्यों के लिए नहीं किया गया जिसके लिए वे स्वीकृत हुए थे। दूसरी ओर, माल्या ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि एयरलाइन को बचाने के लिए उन्होंने अपनी निजी संपत्तियां और यूबी ग्रुप की अन्य कंपनियों का पैसा भी झोंक दिया था, जिसे एक आपराधिक कृत्य के बजाय व्यावसायिक जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए।

  • बैंकों के बकाए और संपत्ति जब्ती पर माल्या के दावे

ऋण अदायगी के मुद्दे पर बोलते हुए माल्या ने कहा कि उन्होंने कभी भी कर्ज चुकाने से इनकार नहीं किया था। उनका दावा है कि उन्होंने 2016 में ही कर्नाटक उच्च न्यायालय और बाद में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बैंकों के मूलधन का 100 प्रतिशत चुकाने का औपचारिक प्रस्ताव रखा था।

माल्या ने इंटरव्यू में कहा कि भारत के प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) कोर्ट और ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) ने उनकी और उनसे जुड़ी कंपनियों की जो संपत्तियां जब्त की थीं, उनकी कीमत बैंकों के कुल बकाए से कहीं अधिक थी। उन्होंने उल्लेख किया कि बैंकों ने उनकी संपत्तियों और शेयरों विशेषकर यूनाइटेड ब्रुअरीज और यूनाइटेड स्पिरिट्स के शेयरों को बेचकर मूलधन की पूरी वसूली कर ली है। हालांकि, भारतीय जांच एजेंसियों और बैंकों का कानूनी रुख यह रहा है कि माल्या की ओर से दिए गए प्रस्ताव शर्तों से बंधे थे और संपत्तियों की वसूली अदालती आदेशों और कानूनी जब्ती के जरिए संभव हो सकी, न कि माल्या द्वारा स्वेच्छा से किए गए भुगतान से।

  • प्रत्यर्पण प्रक्रिया और ब्रिटेन में कानूनी लड़ाई

विजय माल्या मार्च 2016 में भारत छोड़कर यूनाइटेड किंगडम चले गए थे। इसके बाद भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण के लिए ब्रिटिश सरकार से औपचारिक अनुरोध किया था। 2018 में लंदन की वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट अदालत ने भारत सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माल्या के प्रत्यर्पण की सिफारिश की थी, जिसे बाद में ब्रिटिश गृह मंत्रालय ने भी मंजूरी दे दी थी।

इसके बाद माल्या ने ब्रिटिश हाईकोर्ट में अपील दायर की, जिसे मई 2020 में खारिज कर दिया गया। इसके साथ ही ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट में अपील की उनकी अर्जी भी नामंजूर हो गई थी। तकनीकी और कानूनी तौर पर प्रत्यर्पण की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद माल्या पिछले कुछ वर्षों से ब्रिटेन में ही बने हुए हैं। ब्रिटिश गृह विभाग के अनुसार, उनके मामले में एक 'गोपनीय कानूनी प्रक्रिया' लंबित है, जिसे कई कानूनी जानकार शरण (असाइलम) के आवेदन से जोड़कर देखते हैं। जब तक यह गोपनीय प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक ब्रिटेन के कानून के तहत उन्हें भारत नहीं भेजा जा सकता। माल्या ने इस इंटरव्यू में भी उस गोपनीय कानूनी प्रक्रिया के विवरण पर खुलकर बोलने से इनकार कर दिया और केवल इतना कहा कि मामला कानून के दायरे में है।

  • राजनीतिक आख्यान और 'पोस्टर बॉय' बनाए जाने का आरोप

माल्या ने भारतीय राजनीति पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उन्हें भारत में बैंक डिफ़ॉल्ट और भ्रष्टाचार के मामलों का 'पोस्टर बॉय' बना दिया गया है। उन्होंने कहा कि उनके जाने के बाद देश में कई अन्य बड़े कॉरपोरेट एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां) के मामले सामने आए, जहां बैंकों ने हजारों करोड़ रुपये के बट्टे खाते (राइट-ऑफ) स्वीकार किए, लेकिन राजनीतिक कारणों से उनके नाम को चुनाव और मीडिया बहसों में सबसे ज्यादा घसीटा गया।

उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाइयां निष्पक्ष जांच से अधिक एकतरफा धारणा पर आधारित थीं। माल्या का तर्क था कि भारत में राजनेताओं ने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया, जबकि असलियत यह है कि भारतीय उद्योग जगत में कई बड़ी कंपनियां डूबी हैं और उन्हें दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत समाधान की अनुमति दी गई, जबकि किंगफिशर को वह अवसर नहीं मिला।

  • भारत में न्यायिक स्थिति और कोर्ट की अवमानना का मामला

भारत में विजय माल्या की न्यायिक स्थिति अत्यंत जटिल है। साल 2019 में मुंबई की विशेष अदालत ने उन्हें 'भगोड़ा आर्थिक अपराधी' घोषित किया था, जिससे सरकार को देश और विदेश में उनकी संपत्तियों को जब्त करने का सीधा अधिकार मिला।

इसके अलावा, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2022 में माल्या को अदालत की अवमानना के एक मामले में चार महीने की जेल और 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। शीर्ष अदालत ने उन्हें 2017 में अपने बच्चों के खातों में 40 मिलियन डॉलर ट्रांसफर करने के मामले में अदालत को पूरी और सही जानकारी न देने का दोषी पाया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें यह 40 मिलियन डॉलर आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ बैंकों को वापस लौटाने का भी आदेश दिया था। भारत की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट लंबित हैं और प्रत्यर्पण के बाद उन्हें सीधे न्यायिक हिरासत में भेजने की तैयारी की गई है।

  • भारतीय एजेंसियों का रुख

बीबीसी के साथ इस साक्षात्कार के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि ब्रिटिश कानून के तहत माल्या कब तक भारत वापसी से बच सकते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय और केंद्रीय जांच एजेंसियों का आधिकारिक रुख हमेशा स्पष्ट रहा है कि वे माल्या के शीघ्र प्रत्यर्पण के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के साथ निरंतर संपर्क में हैं।

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि मुंबई की आर्थर रोड जेल की बैरक संख्या 12 को माल्या की हिरासत के लिए पूरी तरह सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार रखा गया है, जिसके संबंध में पहले ही ब्रिटिश अदालतों को वीडियो साक्ष्य सौंपे जा चुके हैं। माल्या की कानूनी टीम ब्रिटेन के न्यायिक तंत्र के हर संभव विकल्प का इस्तेमाल कर रही है, जिसके चलते प्रत्यर्पण का मामला कानूनी पेंचों में फंसा हुआ है। माल्या का ताजा बयान उनकी हताशा और कानूनी घेराबंदी के बीच अपनी छवि को बचाने की एक और कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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