Xi Jinping India Visit: 7 साल बाद भारत पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ब्रिक्स सम्मेलन के लिए दिल्ली आगमन से कूटनीतिक हलचल
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल के अंतराल के बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने दिल्ली पहुंचे हैं। इस दौरे से भारत-चीन संबंधों में नए घटनाक्रम की संभावना है।
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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत की राजधानी नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। पिछले सात वर्षों के लंबे अंतराल के बाद चीनी राष्ट्राध्यक्ष का भारतीय धरती पर यह पहला आगमन है। वर्ष 2019 में तमिलनाडु के मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में आयोजित अनौपचारिक द्विपक्षीय शिखर बैठक के बाद दोनों देशों के बीच उपजे गंभीर सैन्य और कूटनीतिक तनावों के पश्चात यह पहला अवसर है जब शी जिनपिंग भारत पहुंचे हैं। नई दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन पर विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और राजनयिकों ने औपचारिक प्रोटोकॉल के साथ उनकी अगवानी की। इस यात्रा के चलते राजधानी में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए गए हैं, जबकि वैश्विक और क्षेत्रीय कूटनीति के विश्लेषक इस ऐतिहासिक आगमन के व्यापक राजनीतिक संदेशों का आकलन करने में जुट गए हैं।
- सात साल के अंतराल का कूटनीतिक परिदृश्य
वर्ष 2019 के बाद से भारत और चीन के संबंधों में गंभीर उतार-चढ़ाव आए हैं। वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के विभिन्न क्षेत्रों में हुए सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों में अभूतपूर्व ठहराव आ गया था। उस घटनाक्रम के बाद दोनों पक्षों के बीच व्यापार, निवेश, सीधी हवाई उड़ानों और राजनयिक संवाद पर गहरा असर पड़ा था।
पिछले कुछ वर्षों में सैन्य कोर कमांडर स्तर और विदेश मंत्रालय के विशेष प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद सीमावर्ती अग्रिम मोर्चों से सैनिकों की वापसी (Disengagement) और गश्त व्यवस्था को नियमित करने पर व्यावहारिक समझौते सामने आए हैं। ऐसे में शी जिनपिंग का सात साल बाद भारत की धरती पर कदम रखना दोनों पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रतीकात्मक घटनाक्रम माना जा रहा है।
- ब्रिक्स के बहुपक्षीय मंच पर चीनी नेतृत्व का एजेंडा
विस्तारित ब्रिक्स समूह में चीन एक प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक धुरी रहा है। नई दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति के शामिल होने से बहुपक्षीय मंच की रूपरेखा और चर्चाओं का स्तर व्यापक हो गया है। चीन इस सम्मेलन के माध्यम से विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) में अपनी आर्थिक परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे के निवेश और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती पर जोर देने का प्रयास करेगा।
इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन में वैकल्पिक प्रणालियों के विकास और स्थानीय मुद्राओं के प्रयोग जैसे विषयों पर भी चीनी प्रतिनिधिमंडल सक्रिय रहने की उम्मीद है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले व्यापारिक प्रतिबंधों और तकनीक निर्यात नियंत्रण के बीच बीजिंग ब्रिक्स देशों के साथ सहयोग के नए आयाम स्थापित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि चीन यह प्रदर्शित करने का प्रयास करेगा कि एशिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बहुपक्षीय जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए एक साथ संवाद कर सकती हैं।
- द्विपक्षीय वार्ता की संभावना और भारत का रुख
कूटनीतिक हलकों में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या ब्रिक्स सम्मेलन के व्यस्त कार्यक्रमों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मध्य एक औपचारिक द्विपक्षीय बैठक होगी। इससे पूर्व दोनों नेताओं की मुलाकातें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के इतर संक्षिप्त अभिवादन या सीमित बातचीत तक ही सीमित रही थीं।
भारत की आधिकारिक और सुस्थापित स्थिति यह रही है कि समग्र द्विपक्षीय संबंधों का सामान्य होना वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूर्ण शांति और स्थिरता की बहाली से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि जब तक सीमावर्ती क्षेत्रों में आपसी समझ और संप्रभुता का पूर्ण सम्मान सुनिश्चित नहीं होता, तब तक संबंधों के अन्य क्षेत्रों में पूर्ण सामान्यीकरण संभव नहीं है। यदि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बैठक निर्धारित होती है, तो उसमें सीमा प्रबंधन, व्यापार घाटा, कनेक्टिविटी और दोनों देशों के बीच जन-संवाद को दोबारा शुरू करने जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा की संभावना है।
- वैश्विक भू-राजनीति और शक्ति संतुलन पर असर
शी जिनपिंग की इस यात्रा को वाशिंगटन से लेकर मॉस्को और ब्रुसेल्स तक अत्यंत गंभीरता से देखा जा रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी (विशेषकर क्वाड समूह) पिछले कुछ वर्षों में बहुत मजबूत हुई है। वहीं, चीन का रणनीतिक तालमेल रूस और पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में बढ़ा है। ऐसे वैश्विक परिवेश में भारत और चीन के शीर्ष नेताओं का एक ही राजधानी में उपस्थित होना वैश्विक शक्ति संतुलन की दृष्टि से गहरा अर्थ रखता है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए यह संदेश दे रहा है कि वह बहुपक्षीय मंचों पर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संवाद स्थापित करने में सक्षम है। भारत न तो किसी पश्चिमी खेमे का हिस्सा बनकर अपने पड़ोस में स्थायी दुश्मनी चाहता है और न ही अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार है।
राजधानी में सम्मेलन के मुख्य आयोजन स्थलों, प्रतिनिधिमंडलों के ठहरने के प्रमुख होटलों और यात्रा मार्गों पर केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों और दिल्ली पुलिस ने त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरा तैयार किया है। तकनीकी निगरानी, ड्रोन रोधी उपाय और वीवीआईपी प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया जा रहा है।
आगामी दो दिनों में सम्मेलन के औपचारिक कार्यसत्रों, पूर्ण बैठकों (Plenary Sessions) और रात्रिभोज के दौरान दोनों नेताओं के बीच होने वाले संवाद के प्रत्येक संकेत पर घरेलू और विदेशी मीडिया की पैनी नजर रहेगी। आने वाले सत्रों के बाद जारी होने वाला संयुक्त वक्तव्य यह तय करेगा कि सात साल के इस अंतराल के बाद शुरू हुआ यह नया संपर्क भारत-चीन संबंधों को किस दिशा में आगे ले जाता है।
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