Hardoi: सवायजपुर तहसील में बड़ा जमीन घोटाला! मौत से 10 साल पहले दर्ज हुई विरासत, फर्जी प्रमाण पत्रों से जमीन हड़पने का आरोप।

सवायजपुर तहसील एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। यहां राजस्व अभिलेखों में कथित फर्जीवाड़ा, फर्जी मृत्यु प्रमाण

May 15, 2026 - 13:46
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Hardoi: सवायजपुर तहसील में बड़ा जमीन घोटाला! मौत से 10 साल पहले दर्ज हुई विरासत, फर्जी प्रमाण पत्रों से जमीन हड़पने का आरोप।
सवायजपुर तहसील में बड़ा जमीन घोटाला! मौत से 10 साल पहले दर्ज हुई विरासत, फर्जी प्रमाण पत्रों से जमीन हड़पने का आरोप।

हरदोई। सवायजपुर तहसील एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। यहां राजस्व अभिलेखों में कथित फर्जीवाड़ा, फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र और रिश्वतखोरी के दम पर जमीन हड़पने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पीड़ित ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, जिलाधिकारी और प्रधानमंत्री तक शिकायत भेजकर तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

ग्राम घटवासा निवासी रामासरे पुत्र नन्हे ने आरोप लगाया है कि विपक्षी गणेश शंकर आदि ने लेखपाल और राजस्व निरीक्षक से कथित सांठगांठ कर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उनकी पुश्तैनी जमीन की विरासत अपने नाम दर्ज करा ली। पीड़ित का कहना है कि सवायजपुर तहसील में भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि “पैसे फेंको और कोई भी काम करा लो” जैसी स्थिति बन चुकी है। उन्होंने चकबंदी, विरासत, आय, जाति, मूल निवास प्रमाण पत्र समेत कई राजस्व कार्यों में खुलेआम रिश्वतखोरी के आरोप लगाए हैं।

शिकायत के अनुसार खतौनी वर्ष 1401 से 1406 तक खाता संख्या 80, गाटा संख्या 828 की भूमि रामासरे के पिता नन्हे पुत्र कन्हैयालाल के नाम दर्ज थी। चकबंदी के बाद नई गाटा संख्या 435 पर रामासरे का कब्जा और खेती होना बताया गया है। आरोप है कि इसी जमीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से फर्जी विरासत तैयार कराई गई।

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह बताया जा रहा है कि विपक्षियों के पिता की विरासत 05 जनवरी 1991 को दर्ज करा दी गई, जबकि प्रस्तुत मृत्यु प्रमाण पत्र में मृत्यु तिथि 03 मई 2001 दर्शाई गई है। यानी जिस व्यक्ति को कागजों में मृत दिखाया गया, उसकी विरासत मौत से करीब 10 वर्ष पहले ही दर्ज हो गई। इस खुलासे के बाद पूरे मामले को बड़े फर्जीवाड़े और संगठित जालसाजी से जोड़कर देखा जा रहा है।

पीड़ित का आरोप है कि मुकदमे के दौरान नायब तहसीलदार कटियारी न्यायालय को गुमराह करने के लिए फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तक पेश किया गया। इतना ही नहीं, वास्तविक नाम “रामफेरे पुत्र बुद्धी” होने के बावजूद अभिलेखों में “रामफेरे पुत्र नन्हे उर्फ बुद्धी” दर्ज करा दिया गया, ताकि जमीन पर कब्जे का रास्ता साफ किया जा सके।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर तहसील में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की नजरों के सामने इतना बड़ा खेल कैसे हो गया? क्या बिना राजस्व कर्मियों की मिलीभगत के मौत से पहले विरासत दर्ज होना संभव है? यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न माना जाएगा।

पीड़ित ने मुख्यमंत्री से निष्पक्ष जांच, फर्जी अभिलेख निरस्त कराने और दोषियों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग तहसील प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

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