BRICS Diplomacy: ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकना भारत की सबसे बड़ी चुनौती, जानिए क्या कहते हैं कूटनीतिक विश्लेषक

ब्रिक्स समूह को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकने के प्रयास में भारत के सामने कई कूटनीतिक चुनौतियां हैं। रूस, चीन और ईरान की मौजूदगी के बीच संतुलन के समीकरण समझें।

By INA News Desk
Sep 12, 2026 - 14:40
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BRICS Diplomacy: ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकना भारत की सबसे बड़ी चुनौती, जानिए क्या कहते हैं कूटनीतिक विश्लेषक
  • BRICS Diplomacy: ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोकना भारत की सबसे बड़ी चुनौती, जानिए क्या कहते हैं कूटनीतिक विश्लेषक
  • Global Politics: रूस, चीन और ईरान के बीच संतुलन साधना नई दिल्ली के लिए कठिन, ब्रिक्स के स्वरूप पर गहराया मंथन
  • India Foreign Policy: क्या ब्रिक्स बनेगा एंटी-वेस्टर्न ब्लॉक? भारत के सामने रणनीतिक स्वायत्तता बचाने की गंभीर कशमकश
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वैश्विक भू-राजनीति में ब्रिक्स (BRICS) समूह के तेजी से बढ़ते दायरे ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में एक नई बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों और कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बहुपक्षीय मंच पर भारत की सबसे प्राथमिक और जटिल चुनौती ब्रिक्स को एक 'पश्चिम-विरोधी' (Anti-West) गुट के रूप में तब्दील होने से बचाना है। विस्तारित ब्रिक्स में रूस, चीन और ईरान जैसे राष्ट्रों की प्रभावी मौजूदगी के कारण यह कूटनीतिक संतुलन साधना नई दिल्ली के लिए बेहद संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है। जहां मॉस्को, बीजिंग और तेहरान अपने-अपने भू-रणनीतिक और आर्थिक कारणों से पश्चिमी प्रभुत्व और अमेरिकी प्रतिबंधों का सीधा मुकाबला करने के लिए इस मंच का इस्तेमाल करने के पक्षधर दिखते हैं, वहीं भारत इसे केवल विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा और निष्पक्ष बहुध्रुवीय व्यवस्था के संवाहक के रूप में देखना चाहता है।

  • दो ध्रुवों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

भारत की विदेश नीति की आधारशिला 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) और 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) पर टिकी है। नई दिल्ली एक तरफ क्वाड (QUAD), जी7 (G7) संवाद और पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ अपने रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी संबंधों को लगातार नई ऊंचाई दे रही है। दूसरी तरफ, वह ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों का सक्रिय संस्थापक सदस्य रहकर ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाती रही है।

विश्लेषकों का आकलन है कि यदि ब्रिक्स एक वैचारिक या टकराव वाले पश्चिम-विरोधी मोर्चे के रूप में चिन्हित होने लगा, तो इससे पश्चिमी साझेदारों के साथ भारत के व्यापारिक, तकनीकी और सुरक्षा समीकरणों में असहजता आ सकती है। भारत का स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है कि ब्रिक्स को 'गैर-पश्चिम' (Non-Western) मंच होना चाहिए, न कि 'पश्चिम-विरोधी' (Anti-Western)। गैर-पश्चिमी होने का अर्थ है विकासशील दुनिया की विशिष्ट समस्याओं जैसे बुनियादी ढांचा, ऋण संकट और असमान व्यापार नियमों पर स्वतंत्र चर्चा करना, बिना किसी तीसरे पक्ष के विरुद्ध रणनीतिक मोर्चा खोले।

  • रूस, चीन और ईरान का कड़ा रुख

भारत के इस संतुलनकारी प्रयास में सबसे बड़ा अवरोध समूह के भीतर मौजूद आंतरिक विरोधाभास हैं। यूक्रेन संघर्ष के बाद से रूस पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए अभूतपूर्व आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंधों ने मॉस्को को डॉलर के प्रभुत्व से पूरी तरह बाहर निकलने और वैकल्पिक वित्तीय ढांचे के निर्माण की ओर धकेल दिया है। रूसी नेतृत्व ब्रिक्स को एक ऐसे सुरक्षा और आर्थिक तंत्र के रूप में विकसित करना चाहता है जो पश्चिमी वित्तीय दबावों को पूरी तरह बेअसर कर सके।

वहीं, दूसरी ओर चीन वैश्विक मंचों पर अमेरिकी भू-राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स के विस्तार को एक सशक्त साधन के रूप में देखता है। बीजिंग की कोशिश इस मंच के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी आर्थिक और रणनीतिक पैठ को गहरा करने की रही है। समूह में ईरान के शामिल होने के बाद यह रुझान और अधिक स्पष्ट हुआ है, क्योंकि तेहरान पर लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंध लागू हैं और वह किसी भी ऐसे बहुपक्षीय मंच का स्वागत करता है जो पश्चिमी एकाधिकार का विरोध करता हो। इन तीनों प्रमुख देशों की प्राथमिकताओं के सामने भारत का यह आग्रह कि ब्रिक्स को तटस्थ और केवल विकास-उन्मुख रखा जाए, एक कठिन कूटनीतिक परीक्षा बन गया है।

  • मुद्रा और वित्तीय तंत्र को लेकर अलग दृष्टिकोण

ब्रिक्स के भीतर डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) यानी व्यापार में अमेरिकी डॉलर के उपयोग को खत्म करने को लेकर भी विचारों में गहरा अंतर है। रूस और ईरान जहां वैश्विक स्तर पर एक नई साझा ब्रिक्स मुद्रा या पूरी तरह डॉलर-मुक्त व्यवस्था के पक्ष में खुलकर आवाज उठाते हैं, वहीं भारत का रुख अधिक व्यावहारिक और नपा-तुला है।

भारत की आधिकारिक स्थिति यह है कि वह द्विपक्षीय व्यापार में अपनी राष्ट्रीय मुद्रा 'रुपये' और साझेदार देशों की स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने का समर्थक है, ताकि लेन-देन की लागत घटाई जा सके। लेकिन नई दिल्ली किसी कृत्रिम साझा मुद्रा या ऐसी प्रणाली का समर्थन नहीं करती जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली में अस्थिरता पैदा करे या वैश्विक वित्तीय संस्थानों के साथ टकराव का रूप ले ले। भारतीय नीति-निर्माताओं का मानना है कि वैश्विक वित्तीय सुधार धीरे-धीरे और अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में होने चाहिए, न कि टकराव के रास्ते पर चलकर।

  • अन्य नए सदस्यों का रुख और भारत को समर्थन

ब्रिक्स में हुए हालिया विस्तार के बाद नए सदस्यों के आने से भारत के लिए कुछ सकारात्मक संतुलनकारी संभावनाएं भी पैदा हुई हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी पश्चिम के साथ अपने गहरे आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को दांव पर नहीं लगाना चाहते। यूएई एक प्रमुख वैश्विक वित्तीय केंद्र है, जिसकी अर्थव्यवस्था अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी निवेश से गहराई से जुड़ी है।

अतः भारत अकेले इस समूह में संतुलन साधने वाला देश नहीं है। नई दिल्ली उन सदस्य देशों के साथ मिलकर एक मध्यम मार्ग (Middle Ground) तैयार करने की कोशिश कर रही है जो न तो पश्चिमी दबावों के आगे झुकना चाहते हैं और न ही किसी शीतयुद्ध जैसी गुटबाजी का हिस्सा बनना चाहते हैं। भारत की यह रणनीति ब्रिक्स के संयुक्त घोषणापत्रों की भाषा में भी स्पष्ट दिखाई देती है, जहां हर बार चरमपंथी बयानों के स्थान पर समावेशी बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर जोर दिलवाया जाता है।

  • वैश्विक मंच पर भारत की मध्यस्थ भूमिका

कूटनीतिक विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि भारत आज दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो पश्चिमी राजधानियों और यूरेशियन तथा एशियाई शक्तियों दोनों के साथ एक ही समय में उच्च स्तरीय संवाद बनाए रखने में सक्षम हैं। भारत की यह विशिष्ट स्थिति उसे ग्लोबल साउथ और विकसित देशों के बीच एक विश्वसनीय सेतु (Bridge) की भूमिका प्रदान करती है।

आने वाले समय में ब्रिक्स की बैठकों में भारत का मुख्य जोर इस बात पर रहेगा कि यह संगठन केवल किसी एक भू-राजनीतिक एजेंडे का बंधक न बने। ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य आपूर्ति, जलवायु परिवर्तन के लिए आवश्यक वित्त और डिजिटल तकनीक के लोकतांत्रिक उपयोग जैसे मुद्दे ही ब्रिक्स के प्राथमिक विमर्श रहने चाहिए। यदि भारत इस समूह को एक व्यावहारिक आर्थिक सहयोग संगठन बनाए रखने में सफल रहता है, तो इससे न केवल ब्रिक्स की साख मजबूत होगी बल्कि भारत की वैश्विक कूटनीतिक क्षमता का लोहा भी पूरी दुनिया मानेगी।

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