CJP Protest Live: प्रदर्शनकारियों पर पुलिसिया सख्ती पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, बोले जस्टिस सूर्यकांत- 'मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल न हो'
जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन से पहले पुलिसिया धरपकड़ पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि 'मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।'
- जंतर-मंतर CJP प्रदर्शन विवाद: शीर्ष अदालत ने सरकार और पुलिस कार्रवाई पर जताई चिंता, आनुपातिक बल के इस्तेमाल की दी नसीहत
- Supreme Court on CJP Protest: 'हथौड़े से मक्खी नहीं मारी जाती...' प्रदर्शनकारियों की धरपकड़ पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत की दो टूक
- Delhi Protest Row: ध्रुव राठी और CJP नेताओं की हिरासत का मामला पहुंचा अदालत, प्रशासनिक अति-उत्साह पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के इस्तीफे की मांग को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली पुलिस द्वारा की गई व्यापक धरपकड़, हवाई अड्डे पर विमान के भीतर से नेताओं की हिरासत और 150 से अधिक कार्यकर्ताओं की रोकथाम का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। इस पूरे घटनाक्रम और प्रशासनिक सख्ती पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत (Justice Surya Kant) की अध्यक्षता वाली पीठ ने बेहद गंभीर और नीतिगत टिप्पणी की है। अदालत ने पुलिस और प्रशासन के अति-उत्साह व अत्यधिक बल प्रयोग की ओर इशारा करते हुए सख्त शब्दों में कहा कि "किसी मक्खी को मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए (You cannot use a sledgehammer to kill a fly)।"
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की इस विधिक टिप्पणी ने राज्य प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था के नाम पर उठाए गए 'निवारक कदमों' (Preventive Actions) के औचित्य, नागरिक स्वतंत्रताओं और आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) पर एक नया संवैधानिक विमर्श छेड़ दिया है। अदालत का यह मौखिक रुख उस समय सामने आया जब हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों और डिजिटल क्रिएटर्स की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में आपातकालीन उल्लेख (Urgent Mentioning) कर पुलिसिया कार्रवाई को असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का हनन बताया।
- अदालत में क्या हुआ और किस संदर्भ में आई यह टिप्पणी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने शीर्ष अदालत के समक्ष दलील दी कि एक लोकतांत्रिक समाज में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, असहमति व्यक्त करने और सभा करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है। वकीलों ने अदालत को अवगत कराया कि कैसे प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही हवाई जहाजों के भीतर घुसकर, रेलवे स्टेशनों पर और सड़कों पर युवाओं व सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को धारा 144 के नाम पर हिरासत में लिया गया।
इस पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की बाध्यता को तो स्वीकार किया, लेकिन साथ ही प्रशासनिक मशीनरी द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों पर असहजता प्रकट की। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रेखांकित किया कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों की प्रतिक्रिया खतरे या समस्या के अनुपात में होनी चाहिए। अदालत ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि यदि कोई शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक जमावड़ा या असहमति का कार्यक्रम प्रस्तावित था, तो उससे निपटने के लिए इतने आक्रामक और भारी सुरक्षा तामझाम की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी, जो भय का माहौल उत्पन्न करे।
- क्या है 'आनुपातिकता का सिद्धांत' (Doctrine of Proportionality)?
सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय संवैधानिक कानून के एक स्थापित सिद्धांत से जुड़ी है:
संतुलन की आवश्यकता: राज्य को जब भी सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा के आधार पर नागरिकों के अधिकारों को सीमित करना हो, तो उठाए गए कदम का प्रभाव समस्या की गंभीरता से अधिक नहीं होना चाहिए।
न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय: यदि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यातायात डायवर्जन या सामान्य नियमन जैसे हल्के उपाय उपलब्ध हैं, तो सीधे व्यापक पैमाने पर गिरफ्तारियों या निवारक हिरासत का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए।
अभिव्यक्ति की सुरक्षा: प्रशासनिक तंत्र को यह समझना होगा कि हर विरोध प्रदर्शन कोई सार्वजनिक दंगा या हिंसा का खतरा नहीं होता।
अदालत में यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में आई जब शनिवार की सुबह से ही दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियों ने अत्यधिक आक्रामक रुख अपना रखा था:
फ्लाइट के भीतर से गिरफ्तारी: CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके, रांका और सौरव को दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड होते ही विमान के अंदर से हिरासत में लिया गया था।
इन्फ्लुएंसर्स पर शिकंजा: प्रसिद्ध सोशल मीडिया क्रिएटर काव्या कर्नाटक (KK Create) और लोकप्रिय यूट्यूबर ध्रुव राठी समेत 150 से अधिक कार्यकर्ताओं को जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही बसों में भरकर विभिन्न थानों में नजरबंद कर दिया गया।
हाई-टेक घेराबंदी: जंतर-मंतर पर तैनात दिल्ली पुलिस के जवानों को आधुनिक नाइट-विजन बॉडी कैमरों और अर्धसैनिक बलों के साथ मुस्तैद रखा गया था, जिससे राजधानी का दिल कहे जाने वाले लुटियंस इलाके में अघोषित आपातकाल जैसा दृश्य बन गया था।
- शीर्ष अदालत के रुख के क्या हैं दूरगामी मायने?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी भविष्य में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा अपनाई जाने वाली 'प्री-एम्प्टिव' (पूर्व-नियोजित) गिरफ्तारियों की रणनीति पर लगाम लगाने का काम करेगी। बार काउंसिल और नागरिक अधिकार मंचों ने अदालत के इस रुख का स्वागत करते हुए कहा है कि लोकतंत्र में असहज करने वाले सवालों और व्यंग्य-आधारित अभियानों को दबाने के लिए राज्य शक्ति का असंतुलित उपयोग नहीं होना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के नियमन के लिए एक पारदर्शी और संतुलित रूपरेखा का होना अनिवार्य है ताकि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच एक स्वस्थ संतुलन कायम रह सके।
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