Maharashtra Mid-Day Meal Crisis: सूखे की मार के बीच मिड-डे मील का बजट अटका, अपनी जेब से बच्चों को खाना खिला रहे शिक्षक

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील का फंड महीनों से अटका हुआ है। बच्चों को भूखा रहने से बचाने के लिए शिक्षक अपनी जेब से पैसे खर्च कर रहे हैं।

By INA News Desk
Oct 9, 2026 - 13:21
5 Views
Maharashtra Mid-Day Meal Crisis: सूखे की मार के बीच मिड-डे मील का बजट अटका, अपनी जेब से बच्चों को खाना खिला रहे शिक्षक
प्रतीकात्मक तस्वीर
  • महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में गहराया संकट: मध्याह्न भोजन योजना का फंड रुका, कर्ज लेकर बच्चों की थाली भर रहे मास्टर साहब
  • Drought & Mid-Day Meal: मराठवाड़ा-विदर्भ में भुखमरी की नौबत, प्रशासनिक लेटलतीफी के बीच शिक्षकों ने संभाला पोषण का मोर्चा
  • Maharashtra School News: मिड-डे मील का पैसा न मिलने से मुश्किल में शिक्षक, सूखे से जूझते ग्रामीण इलाकों में योजना पर संकट

मुंबई: महाराष्ट्र के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में सूखे और कृषि संकट के बीच प्राथमिक शिक्षा और पोषण व्यवस्था से जुड़ी एक अत्यंत चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र व राज्य सरकार की संयुक्त 'प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण' (पूर्व में मिड-डे मील योजना) का नियमित बजट पिछले कई महीनों से प्रशासनिक स्तर पर अटका हुआ है। रसोई गैस, दाल, तेल, मसाले, सब्जियां और रसोइयों के मानदेय के लिए मिलने वाली अग्रिम राशि (कन्वर्जन कॉस्ट) न मिलने से योजना ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी। ऐसे संकट के समय ग्रामीण स्कूलों के शिक्षकों ने मानवीय मिसाल पेश करते हुए अपनी निजी बचत और वेतन के पैसों से बच्चों के लिए दोपहर के भोजन का प्रबंध जारी रखा है।

विशेष रूप से मराठवाड़ा, विदर्भ और उत्तरी महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित जनपदों में जहां गरीब और खेतिहर मजदूर परिवारों के लिए स्कूल में मिलने वाला यह भोजन पोषण का सबसे बड़ा सहारा होता है, वहां शिक्षकों के इस व्यक्तिगत प्रयास ने हजारों नौनिहालों को भूखा रहने से बचा लिया है। हालांकि, लंबे समय से अपनी जेब से खर्च कर रहे शिक्षकों पर अब भारी आर्थिक बोझ आ गया है और कई शिक्षक संगठनों ने सरकार से तुरंत बकाया राशि जारी करने की मांग की है।

  • सूखे की दोहरी मार: गरीब परिवारों के लिए एकमात्र सहारा

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर, जालना, बीड, धाराशिव, लातूर, नांदेड़, यवतमाल और बुलढाणा जैसे जिलों में इस वर्ष कम बारिश और अनियमित मानसून के चलते सूखे जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मजदूरी के अवसरों में कमी आई है और पेयजल संकट के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित हुई है।

ऐसे कठिन समय में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा 1 से 8) में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के लिए दोपहर का यह भोजन केवल उपस्थिति बनाए रखने का साधन नहीं, बल्कि दिन भर का सबसे पौष्टिक आहार होता है। शिक्षकों का कहना है कि यदि स्कूल में दोपहर का चूल्हा बंद हो गया, तो कई बच्चों को भूखे पेट पढ़ाई करनी पड़ेगी और ड्रॉपआउट दर तेजी से बढ़ जाएगी। इसी जिम्मेदारी के अहसास ने शिक्षकों को अपनी जेब ढीली करने पर मजबूर कर दिया।

  • किराना दुकानों पर शिक्षकों के नाम पर लाखों का कर्ज

जमीनी स्तर पर काम कर रहे प्राथमिक शिक्षक संघों के प्रतिनिधियों के अनुसार, मिड-डे मील योजना के संचालन की वर्तमान स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुकी है:

सामग्री का अभाव: खाद्यान्न (चावल और गेहूं) तो कई जगह सरकारी गोदामों से मिल जाता है, लेकिन दालें, पत्तेदार सब्जियां, अंडा, खाद्य तेल, मसाले और एलपीजी गैस सिलेंडर खरीदने के लिए प्रतिदिन नकद राशि की आवश्यकता होती है।

उधारी पर चल रहा सिस्टम: अधिकांश गांवों में स्कूल के मुख्याध्यापक और शिक्षक स्थानीय किराना दुकानों से अपने निजी नाम और गारंटी पर सामान उधार ले रहे हैं। कई स्कूलों पर स्थानीय दुकानों का 30,000 रुपये से लेकर 70,000 रुपये तक का बकाया चढ़ चुका है।

दुकानदारों ने दिया अल्टीमेटम: पिछले 3 से 4 महीनों से भुगतान न होने के कारण अब स्थानीय व्यापारियों ने भी राशन उधार देने से हाथ खड़े करने शुरू कर दिए हैं।

रसोइयों का मानदेय लंबित: भोजन पकाने वाली महिला रसोइयों (Cook-cum-Helpers) को मिलने वाला नाममात्र का मासिक मानदेय भी महीनों से जारी नहीं हुआ है, जिससे वे भी आर्थिक संकट से जूझ रही हैं।

  • प्रशासनिक पेच और बजट आवंटन में देरी का कारण

शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच बजट शेयरिंग फॉर्मूले (60:40) के तहत वित्तीय मंजूरी और ट्रेजरी प्रक्रिया में तकनीकी देरी के चलते यह स्थिति उत्पन्न हुई है।

हाल के वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा सिंगल नोडल एजेंसी (SNA) और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के जरिए सीधे खातों में राशि अंतरित करने के नए नियम लागू किए गए हैं। जिला परिषद स्तर पर डाटा अपलोडिंग, तकनीकी सत्यापन और राज्य के वित्त विभाग से ट्रेजरी बिल पास होने में देरी के कारण धन सीधे स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) के खातों में समय पर क्रेडिट नहीं हो पाया।

  • शिक्षक संघों की चेतावनी: 'अब और वहन करना संभव नहीं'

महाराष्ट्र राज्य प्राथमिक शिक्षक परिषद और विभिन्न जिला संगठनों ने स्कूल शिक्षा विभाग तथा शिक्षा आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया है। शिक्षकों का कहना है कि वे अपने सीमित वेतन से अपने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ स्कूल के सैकड़ों बच्चों का भोजन खर्च हमेशा नहीं उठा सकते।

शिक्षकों ने मांग की है कि:

लंबित कन्वर्जन कॉस्ट और रसोइयों के मानदेय की पूरी राशि दीपावली से पूर्व तत्काल जारी की जाए।

आपातकालीन स्थितियों के लिए प्रत्येक स्कूल प्रबंधन समिति के खाते में कम से कम दो महीने का अग्रिम कोष आरक्षित रखा जाए।

शिक्षकों पर वित्तीय और प्रशासनिक दबाव बनाने के बजाय भोजन आपूर्ति के लिए एक सुचारु केंद्रीयकृत या ब्लॉक स्तरीय व्यवस्था बनाई जाए।

यदि सरकार ने जल्द ही बजट जारी नहीं किया, तो आगामी दिनों में कई जिलों के स्कूलों में दोपहर का भोजन पकाना पूरी तरह बंद हो सकता है, जिसका सीधा असर राज्य के लाखों वंचित स्कूली बच्चों पर पड़ेगा।

Also Read- यूपी में औद्योगिक क्रांति: 3 वर्षों में फैक्ट्री पंजीकरण दोगुने, 50 हजार से अधिक युवाओं को मिला रोजगार

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow