Punjab Jail Drug Menace: मानसा जेल में 69% कैदी नशे की चपेट में, हाईकोर्ट ने सभी जेलों का मांगा ब्योरा

Punjab Mansa Jail: मानसा जेल में 69% कैदियों के नशे की चपेट में होने पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट सख्त। मान सरकार से सभी जेलों की रिपोर्ट और पुनर्वास योजना मांगी।

Aug 25, 2026 - 18:59
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Punjab Jail Drug Menace: मानसा जेल में 69% कैदी नशे की चपेट में, हाईकोर्ट ने सभी जेलों का मांगा ब्योरा
  • पंजाब की मानसा जेल में 69 फीसदी कैदी नशा पीड़ित, हाईकोर्ट सख्त; मान सरकार से मांगा नशामुक्ति और पुनर्वास का प्लान
  • पंजाब की जेलों में नशे का खौफनाक सच: मानसा जेल के 69% कैदी नशे की चपेट में, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा पूरा एक्शन प्लान
  • Punjab: मानसा जेल के 69% कैदी नशे की गिरफ्त में, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य की सभी जेलों से तलब की रिपोर्ट

पंजाब की जेलों में मादक पदार्थों की लत और कैदियों के स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक खुलासा हुआ है। मानसा जिला जेल में बंद कुल कैदियों में से लगभग 69 प्रतिशत कैदी नशे की गंभीर गिरफ्त में पाए गए हैं। इस संवेदनशील मामले पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की है। अदालत ने राज्य की भगवंत मान सरकार और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (जेल) को हलफनामा दायर कर पंजाब की सभी जेलों का विस्तृत ब्योरा पेश करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने सरकार से यह भी पूछा है कि जेलों में चल रहे ओपिओइड असिस्टेड ट्रीटमेंट (OOAT) केंद्रों की क्या स्थिति है और सजा पूरी कर बाहर आने वाले कैदियों को दोबारा नशे के दलदल में जाने से रोकने के लिए प्रशासन के पास क्या ठोस कार्ययोजना है।

मानसा सत्र संभाग के प्रशासनिक न्यायाधीश द्वारा जेल निरीक्षण के बाद तैयार की गई एक विस्तृत रिपोर्ट ने पंजाब के कारागार प्रशासन में हड़कंप मचा दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मानसा जेल में बंद कुल 767 कैदियों में से 530 कैदी नशामुक्ति के लिए संचालित ओपिओइड असिस्टेड ट्रीटमेंट (OOAT) क्लीनिक में पंजीकृत हैं। यह आंकड़ा जेल की कुल बंदी आबादी का लगभग 69 प्रतिशत बैठता है।

इस भयावह स्थिति को देखते हुए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले में स्वतः संज्ञान लिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की पीठ ने इसे गंभीर जनस्वास्थ्य और मानवाधिकार संकट मानते हुए राज्य सरकार से प्रदेश की सभी 26 जेलों में बंद नशा पीड़ित कैदियों का जेलवार आंकड़ा और चिकित्सा व्यवस्था का पूरा विवरण तलब किया है।

पंजाब में लंबे समय से मादक पदार्थों की तस्करी और खपत एक गंभीर सामाजिक व प्रशासनिक चुनौती रही है। न्यायिक अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण के दौरान जब मानसा जेल का रिकॉर्ड खंगाला गया, तो सामने आया कि विचाराधीन और सजायाफ्ता बंदियों की एक बहुत बड़ी तादाद अफीम, हेरोइन और अन्य सिंथेटिक नशीले पदार्थों की लत से जूझ रही है। जेल के भीतर ऐसे बंदियों को चिकित्सा सहायता देने के लिए बनाए गए ओओएटी क्लीनिक में आधे से कहीं अधिक बंदी इलाजरत पाए गए।

हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट के आधार पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कारागार) को विस्तृत हलफनामा पेश करने का आदेश दिया। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता तनु बेदी को इस मामले में एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया है ताकि व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा की जा सके। खंडपीठ ने यह भी जानना चाहा है कि जेल परिसरों में ओओएटी केंद्रों पर पंजीकरण की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) क्या है और कैदियों को दी जाने वाली प्रतिस्थापन दवाओं जैसे ब्यूप्रेनॉर्फिन और नालोक्सोन के वितरण व निगरानी का क्या तंत्र है।

इसके साथ ही अदालत ने यह सवाल भी उठाया है कि जेलों में तैनात मनोचिकित्सकों, परामर्शदाताओं और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की वास्तविक संख्या कितनी है। अदालत का मुख्य जोर इस बात पर है कि केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय बंदियों को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संबल दिया जा रहा है या नहीं।

अदालत की इस तल्ख टिप्पणी और नोटिस के बाद प्रशासनिक और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। जेल विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पुलिस द्वारा चलाए जा रहे नशा विरोधी अभियानों (एंटी-ड्रग ड्राइव) के तहत बड़ी संख्या में नशा तस्करों और उपभोग करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, जिससे जेलों में आने वाले बंदियों में नशा पीड़ितों की संख्या स्वाभाविक रूप से अधिक दिख रही है। विभाग का दावा है कि जेलों के भीतर ओओएटी क्लीनिक के जरिए वैज्ञानिक तरीके से कैदियों का उपचार किया जा रहा है।

दूसरी ओर, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि जेलों को केवल हिरासत केंद्र बनाने के बजाय सुधार और पुनर्वास केंद्रों में तब्दील करने की सख्त जरूरत है। विश्लेषकों का तर्क है कि यदि जेल के भीतर नशा मुक्ति की प्रभावी नीति लागू नहीं होगी, तो जेल से छूटने के बाद यही लोग दोबारा अपराध और तस्करी के नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे राज्य में अपराध का चक्रव्यूह कभी समाप्त नहीं हो पाता।

मानसा जेल का यह खुलासा पंजाब की कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के बीच मौजूद अंतर को उजागर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) कानून के तहत जेल भेजे जाने वाले अधिकांश युवा प्राथमिक तौर पर मरीज हैं, जिन्हें सख्त सजा से ज्यादा चिकित्सकीय और मानसिक उपचार की आवश्यकता है।

इस अदालती हस्तक्षेप का सीधा असर पंजाब सरकार की जेल प्रबंधन नीति पर पड़ेगा। अब राज्य सरकार को न केवल मानसा बल्कि अमृतसर, लुधियाना, बठिंडा, पटियाला और फिरोजपुर जैसी बड़ी सेंट्रल जेलों में नशा पीड़ितों की पहचान, अलग बैरकों की व्यवस्था और मेडिकल स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए तत्काल संसाधन जुटाने होंगे।

पंजाब सरकार को अब हाईकोर्ट के समक्ष निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी जेलों का विस्तृत डेटा, मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर की स्थिति और पुनर्वास का रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। अदालत ने विशेष रूप से यह योजना मांगी है कि जब कोई सजायाफ्ता या विचाराधीन बंदी जेल से रिहा होकर समाज में लौटता है, तो उसे दोबारा नशे की गिरफ्त में जाने से रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर क्या फॉलो-अप सिस्टम तैयार किया गया है।

आगामी सुनवाई में हाईकोर्ट जेलों में बुनियादी सुधारों, विशेष नशामुक्ति वार्डों के गठन और स्वतंत्र सामाजिक कार्यकर्ताओं की निगरानी को लेकर कड़े दिशानिर्देश जारी कर सकता है। राज्य सरकार को यह साबित करना होगा कि जेलें केवल बंदियों की संख्या बढ़ाने का साधन नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक स्वस्थ नागरिक बनाकर समाज में वापस भेजने की दिशा में काम कर रही हैं।

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