'हमें तो अपनों ने लूटा, गै़रों में कहां दम था', दिल्ली मार्च और हिरासत के बाद बोले सोनम वांगचुक
लद्दाख को छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर दिल्ली पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा- 'हमें तो अपनों ने लूटा, गै़रों में कहां दम था'।
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नई दिल्ली: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंचे प्रसिद्ध पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के रुख पर गहरी निराशा व्यक्त की है। दिल्ली मार्च के दौरान सीमाओं पर रोके जाने, हिरासत में लिए जाने और उसके बाद उपजे हालात का जिक्र करते हुए वांगचुक ने प्रसिद्ध शेर 'हमें तो अपनों ने लूटा, गै़रों में कहां दम था' का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्र लद्दाख के देशभक्त नागरिकों को अपनी ही राष्ट्रीय राजधानी में लोकतांत्रिक तरीके से बात रखने के लिए अभूतपूर्व बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
सोनम वांगचुक लेह अपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के संयुक्त आह्वान पर सैकड़ों पदयात्रियों के साथ लगभग एक महीने की पदयात्रा पूरी कर दिल्ली पहुंचे थे। उनका उद्देश्य केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व से मिलकर लद्दाख के पर्यावरण, सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय लोगों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग करना था।
- सीमा पर देश के साथ खड़े रहने वाले नागरिकों की अनदेखी का आरोप
मीडिया संवाद के दौरान वांगचुक ने रेखांकित किया कि लद्दाख के लोगों ने कारगिल युद्ध से लेकर गलवान घाटी तक हर संकट के समय भारतीय सेना और देश की संप्रभुता का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है। 2019 में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो स्थानीय जनता ने इस भरोसे के साथ इसका स्वागत किया था कि उनकी विशिष्ट पहचान को संविधान के तहत संरक्षण दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि चुनावी घोषणा पत्रों में लद्दाख को छठी अनुसूची का सुरक्षा कवच देने का वादा किया गया था, लेकिन समय बीतने के साथ इन आश्वासनों को भुला दिया गया। वांगचुक के अनुसार, निर्णय लेने की शक्तियां स्थानीय जन प्रतिनिधियों और स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों के बजाय नौकरशाही के हाथों में केंद्रित हो गई हैं, जिससे स्थानीय जनता में असुरक्षा की भावना गहरी हुई है।
सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्र के नाजुक पर्यावरण को बचाने का संघर्ष है। लद्दाख एक उच्च पर्वतीय रेगिस्तान है जहां ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और जल संकट गंभीर रूप ले रहा है। बिना किसी स्थानीय नियंत्रण या संवैधानिक सुरक्षा के यदि इस क्षेत्र को अनियंत्रित औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए खोल दिया गया, तो यहां का पारिस्थितिक तंत्र हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा। गृह मंत्रालय द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति के साथ बातचीत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लद्दाख की जनता संवाद के पक्ष में है, लेकिन यह संवाद औपचारिकता न होकर वास्तविक परिणाम देने वाला होना चाहिए।
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