UPITS 2026: सातवीं सदी की गंगा प्रतिमा से प्रेम मंदिर तक, यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में जीवंत हुआ प्रदेश का समृद्ध इतिहास
ग्रेटर नोएडा यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में संस्कृति विभाग के आउटलेट पर सातवीं से 12वीं सदी की प्राचीन मूर्तियां, डिजिटल पांडुलिपियां और प्रेम मंदिर का मॉडल मुख्य आकर्षण बने हैं।
ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एवं मार्ट में आयोजित 'उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो-2026' (UPITS) में जहां एक ओर अत्याधुनिक उद्योगों, रक्षा विनिर्माण और तकनीकी स्टार्टअप्स की धूम मची है, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग का विशेष आउटलेट राज्य की सदियों पुरानी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक वैभव को वैश्विक पटल पर प्रस्तुत कर रहा है। सातवीं शताब्दी की दुर्लभ गंगा प्रतिमा से लेकर दसवीं सदी की गरुणारूढ़ लक्ष्मी नारायण और बारहवीं सदी की मां सरस्वती की पाषाण प्रतिमाओं तक, यह प्रदर्शनी भारत के स्वर्णिम कालखंडों की जीवंत यात्रा करा रही है। इस आउटलेट को देखने और प्राचीन धरोहरों के साथ अपनी तस्वीरें साझा करने के लिए छात्रों, शोधार्थियों और विदेशी प्रतिनिधियों का तांता लगा हुआ है।
प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण इसका भव्य प्रवेश द्वार है, जिसे मथुरा-वृंदावन के सुप्रसिद्ध 'प्रेम मंदिर' के मुख्य द्वार और 'ब्रह्मांड द्वार' की बारीक नक्काशीदार प्रतिकृति के रूप में तैयार किया गया है। ट्रेड शो में आने वाले आगंतुकों के लिए यह प्रवेश द्वार न केवल भारतीय स्थापत्य कला का दर्शन करा रहा है, बल्कि युवाओं के बीच एक बेहद लोकप्रिय सेल्फी प्वाइंट बन चुका है।
सातवीं से बारहवीं सदी की दुर्लभ प्रतिमाओं का भव्य संग्रह
संस्कृति विभाग के पवेलियन में प्रदेश के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों और जनपदों से प्राप्त ऐसी प्राचीन प्रतिमाओं को सुरक्षित कांच के डिस्प्ले में प्रदर्शित किया गया है, जो सामान्य तौर पर दुर्लभ संग्रहालयों में ही देखने को मिलती हैं:
-
सातवीं सदी की गंगा प्रतिमा: गुप्तोत्तर काल की शिल्पकला का अद्वितीय नमूना, जिसमें मां गंगा को उनके पारंपरिक वाहन मगरमच्छ के साथ अत्यंत सौम्य भाव में उकेरा गया है।
-
दसवीं सदी की गरुणारूढ़ लक्ष्मी नारायण: जनपद मिर्जापुर के पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त यह दुर्लभ मूर्ति भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के गरुड़ पर आरूढ़ रूप को दर्शाती है।
-
दसवीं सदी की महेश्वर प्रतिमा: कानपुर के ऐतिहासिक रानीपुर क्षेत्र से प्राप्त भगवान शिव की यह नक्काशीदार पाषाण प्रतिमा तत्कालीन शैव उपासना पद्धति की गवाही देती है।
-
ग्यारहवीं सदी की भगवान विष्णु की प्रतिमाएं: सुल्तानपुर और पर्वतीय अंचल अल्मोड़ा से प्राप्त ग्यारहवीं सदी की चतुर्भुज विष्णु प्रतिमाएं, जो मध्यकालीन मूर्तिकला के सूक्ष्म अलंकरण को दर्शाती हैं।
-
बारहवीं सदी की देवी सरस्वती की प्रतिमा: जनपद गोरखपुर से प्राप्त ज्ञान की देवी सरस्वती की यह प्रतिमा कलात्मक परिपक्वता और धार्मिक निष्ठा का सुंदर उदाहरण है।
प्रदर्शनी देखने पहुंचीं नई दिल्ली की ग्यारहवीं कक्षा की छात्रा आयुषी ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि अब तक उन्होंने इन ऐतिहासिक धरोहरों को केवल इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में चित्रों के रूप में ही देखा था। इन्हें इतने निकट से प्रत्यक्ष देखना सनातन ज्ञान परंपरा और शिल्पकला की भव्यता का वास्तविक अहसास कराता है।
डिजिटल पांडुलिपियों से प्राचीन ज्ञान परंपरा का समन्वय
संस्कृति विभाग ने प्राचीन ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। प्रदर्शनी में विभिन्न कालखंडों की दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों को हाई-रेजोल्यूशन डिजिटल फ्रेम्स और टच स्क्रीन्स के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। इसके जरिए शोधार्थी और युवा दर्शक उंगलियों के स्पर्श से पन्नों को पलटकर प्राचीन संस्कृत, प्राकृत और अवधी ग्रंथों के मूल पाठ, खगोलशास्त्र, गणित और आयुर्वेद से जुड़े ऐतिहासिक सूत्रों को आसानी से पढ़ और समझ पा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश की ओर से समकालीन और पारंपरिक चित्रकला का जीवंत कोना स्थापित किया गया है। यहां आमंत्रित चित्रकार न केवल अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि मौके पर ही आगंतुकों और विदेशी मेहमानों के लाइव पोर्ट्रेट स्केच तैयार कर रहे हैं, जिससे प्रदर्शनी का वातावरण अत्यंत संवादात्मक और कलात्मक बन गया है।
ब्रज और पूर्वांचल के ऐतिहासिक स्थलों की प्रतिकृतियां
प्रदर्शनी के स्थापत्य खंड में उत्तर प्रदेश के विविध धार्मिक और सांस्कृतिक अंचलों की प्रतिकृतियां सजी हैं:
-
रसखान की समाधि (महावन, मथुरा): कृष्ण भक्ति शाखा के अमर मुस्लिम कवि रसखान के समाधि परिसर की सुंदर मॉडल संरचना।
-
कुसुंबा सरोवर (गोवर्धन): गिरिराज परिक्रमा मार्ग के पावन सरोवर का विहंगम दृश्य।
-
सारनाथ मंदिर व स्तूप (मिर्जापुर-वाराणसी क्षेत्र): बौद्ध संस्कृति और धम्म चक्र प्रवर्तन की ऐतिहासिक स्मृति।
संस्कृति विभाग के प्राविधिक सहायक (संस्कृत) हरिश्चंद्र दुबे ने बताया कि प्राचीन संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को लेकर युवाओं में अप्रत्याशित कौतूहल और उत्साह देखा जा रहा है। आगंतुक मूर्तियों के निर्माण काल, तत्कालीन पाषाण सामग्री और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर लगातार सवाल पूछ रहे हैं। विभाग के विशेषज्ञ मौके पर उपस्थित रहकर आगंतुकों की जिज्ञासाओं का समाधान कर रहे हैं, ताकि आधुनिकता की दौड़ में नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और गौरवशाली इतिहास से निरंतर जुड़ी रहे।
What's Your Reaction?