Sitapur News: आठ साल पहले हुआ सर्वे, आज भी तिरपाल के नीचे कट रही जिंदगी; पीएम आवास की बाट जोह रहा परिवार

सीतापुर के खैराबाद ब्लॉक स्थित अकबरपुर कलां में 2017 में सर्वे के बावजूद सकीना के परिवार को पीएम आवास नहीं मिला। कलेक्ट्रेट जनसुनवाई के बाद भी परिवार तिरपाल तले रहने को मजबूर है।

By INA News Desk
Sep 20, 2026 - 22:51
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Sitapur News: आठ साल पहले हुआ सर्वे, आज भी तिरपाल के नीचे कट रही जिंदगी; पीएम आवास की बाट जोह रहा परिवार
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Report : संदीप चौरसिया INA NEWS सीतापुर

सीतापुर। हर बेघर और कच्चे मकान में रहने वाले गरीब परिवार को पक्की छत उपलब्ध कराने के प्रशासनिक दावों के बीच सीतापुर जनपद से एक ऐसी जमीनी तस्वीर सामने आई है, जो जमीनी क्रियान्वयन की रफ्तार पर गंभीर सवाल उठाती है। जनपद के विकास खंड खैराबाद अंतर्गत ग्राम पंचायत मालवी सरिया के मजरा अकबरपुर कलां में एक अत्यंत निर्धन परिवार करीब आठ वर्षों से प्रधानमंत्री आवास योजना की स्वीकृति का इंतजार कर रहा है। वर्ष 2017 में बकायदा सर्वे होने, दस्तावेजों का सत्यापन किए जाने और मौके पर फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी संपन्न होने के बावजूद आज तक इस परिवार को आवास का लाभ नहीं मिल सका है। नतीजा यह है कि परिवार मौसम की हर मार झेलते हुए जर्जर झोपड़ी पर तिरपाल तानकर गुजारा करने को मजबूर है।

2017 में हुआ था स्थलीय सत्यापन और सर्वे

पीड़ित परिवार की मुखिया सकीना (पत्नी कल्लन) के अनुसार, उन्होंने पक्के मकान की आस में वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आवेदन प्रक्रिया में भाग लिया था। उस समय विभागीय निर्देशों के तहत ब्लॉक स्तरीय जांच दल गांव पहुंचा था। सर्वे टीम ने उनके कच्चे और जर्जर मकान का स्थलीय निरीक्षण किया था, पात्रता से जुड़े आवश्यक प्रपत्र भरवाए थे और तकनीकी प्रक्रिया के तहत मौके पर फोटो व वीडियो भी दर्ज किए गए थे।

स्थानीय स्तर पर औपचारिकताएं पूरी होने के बाद परिवार को पूरा भरोसा दिलाया गया था कि उनका नाम प्राथमिकता सूची में शामिल कर जल्द ही आवास निर्माण हेतु प्रथम किस्त जारी कर दी जाएगी। हालांकि, दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में तब्दील होते चले गए, लेकिन ब्लॉक मुख्यालय से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक फाइल किस दराज में दबकर रह गई, इसका कोई स्पष्ट उत्तर परिवार को आज तक नहीं मिल सका।

आर्थिक तंगी के बीच मौसम की मार, तिरपाल बना एकमात्र सहारा

अकबरपुर कलां निवासी कल्लन पेशे से दैनिक मजदूर हैं। दिनभर की कड़ी मशक्कत के बाद जो मजदूरी मिलती है, उससे परिवार का दो वक्त का भरण-पोषण बमुश्किल हो पाता है। सीमित आमदनी और महंगाई के इस दौर में स्वयं के खर्च पर पक्का मकान खड़ा करना अथवा मरम्मत कराना इस परिवार के सामर्थ्य से पूरी तरह बाहर है।

वर्तमान में मकान की स्थिति बेहद दयनीय और खतरनाक बनी हुई है। मिट्टी की दीवारें जगह-जगह से दरक चुकी हैं और कच्ची छत किसी भी समय भारी दबाव के चलते ढहने के कगार पर पहुंच चुकी है। बरसात के मौसम में छत से लगातार पानी टपकता है, जिससे घर के भीतर रखा अनाज और रोजमर्रा का सामान भी भीग जाता है। तेज आंधी और बारिश से बचने के लिए परिवार ने छत के ऊपर प्लास्टिक का तिरपाल बांध रखा है। हर साल बदलते मौसम के साथ यह तिरपाल भी फट जाता है और परिवार को दोबारा जोड़-तोड़ कर किसी तरह सिर छिपाने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

कलेक्ट्रेट जनसुनवाई में लगाई गुहार, पर ढाक के तीन पात

स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों और ब्लॉक कर्मचारियों के चक्कर काटकर थक चुकी सकीना ने न्याय की उम्मीद में जिला प्रशासन की चौखट पर भी दस्तक दी। उन्होंने कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित होने वाली नियमित जनसुनवाई के दौरान लिखित शिकायती पत्र देकर अपनी आपबीती सुनाई और निष्पक्ष जांच कराने की मांग रखी।

प्रशासनिक अधिकारियों ने आवेदन प्राप्त कर संबंधित विकास खंड अधिकारी को मामले के निस्तारण के निर्देश तो दिए, लेकिन धरातल पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पीड़िता का कहना है कि जनसुनवाई के मंच से आदेश जारी होने के बाद भी न तो कोई नया सर्वे दल दोबारा उनके दरवाजे पहुंचा और न ही यह स्पष्ट किया गया कि पूर्व में किए गए सर्वे के आधार पर उनका नाम किस वजह से रोका गया है।

जवाबदेही के अभाव में खड़े होते नीतिगत सवाल

यह मामला केवल एक परिवार की पक्की छत के अभाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं की अंतिम छोर तक निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। सवाल यह उठता है कि यदि वर्ष 2017 के सर्वे में परिवार पात्र पाया गया था, तो पिछले आठ वर्षों में योजना की विभिन्न सूचियों में उसका नाम क्यों शामिल नहीं हुआ?

यदि किसी तकनीकी या कागजी त्रुटि के कारण आवेदन निरस्त हुआ, तो इसकी आधिकारिक सूचना लाभार्थी को क्यों नहीं दी गई? क्या विभागीय कर्मचारियों ने पुराने अभिलेखों का सत्यापन ठीक से नहीं किया अथवा सूची तैयार करते समय वास्तविक जरूरतमंदों की अनदेखी हुई? इन सभी सवालों का सटीक और प्रामाणिक उत्तर तभी सामने आ सकेगा जब जिला प्रशासन संबंधित ब्लॉक के पुराने आवास सर्वे रिकॉर्ड्स की स्वतंत्र जांच कराए।

परिवार की निष्पक्ष जांच और त्वरित आवास की मांग

पीड़िता सकीना और उनके परिजनों ने अब जिलाधिकारी से मामले को व्यक्तिगत संज्ञान में लेने की गुहार लगाई है। परिवार की मांग है कि वर्ष 2017 में हुए सर्वे के दस्तावेजों की पड़ताल कराई जाए, स्थलीय स्थिति का पुनः स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए और पात्रता के सभी मानक पूरे होने की दशा में उन्हें शीघ्र अति शीघ्र प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ प्रदान किया जाए, ताकि वे अपने बच्चों के साथ सुरक्षित और पक्की छत के नीचे सम्मानजनक जीवन जी सकें।

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