'मैं तो कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहता था, लेकिन... अशोक गहलोत ने दिया सनसनीखेज बयान
राजस्थान की राजनीति के सबसे अनुभवी चेहरों में शुमार और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने हालिया सार्वजनिक
- पार्टी आलाकमान की इच्छा के बाद भी राष्ट्रीय अध्यक्ष न बन पाने के पीछे छिपी थी एक सुनियोजित और गहरी कूटनीति
- वर्ष 2022 के राजनीतिक घटनाक्रम पर पूर्व मुख्यमंत्री ने तोड़ी चुप्पी, पर्यवेक्षकों के अचानक आगमन और घटनाक्रम को बताया बड़ी साजिश
- छवि खराब करने के प्रयासों और अंदरूनी बगावत के पुराने समीकरणों को लेकर राजस्थान कांग्रेस के दिग्गज ने शुरू की नई राजनीतिक बहस
राजस्थान की राजनीति के सबसे अनुभवी चेहरों में शुमार और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने हालिया सार्वजनिक संबोधन में एक ऐसा बड़ा राजनीतिक दावा किया है, जिसने देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के भीतर एक अभूतपूर्व वैचारिक और संगठनात्मक भूचाल ला दिया है। प्रादेशिक राजधानी जयपुर में पत्रकारों और वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों से सीधी बातचीत के दौरान उन्होंने सितंबर 2022 में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान उपजे गंभीर संकट को याद करते हुए भावुक और बेहद आक्रामक अंदाज में अपनी बात रखी। पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि उस समय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी सोनिया गांधी और पूरे केंद्रीय संगठन की मंशा उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सर्वोच्च अध्यक्ष बनाने की थी, तो वे इस महान और ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करने से कभी पीछे नहीं हटते। उन्होंने अपने इस महत्वपूर्ण और दूरगामी बयान के जरिए यह साफ संकेत दिया है कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष न बन पाने के पीछे एक बहुत बड़ी और सोची-समझी अंदरूनी राजनीतिक साजिश काम कर रही थी।
इस पूरे घटनाक्रम की परतों को खोलते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने सितंबर 2022 की उस ऐतिहासिक तारीख का विशेष रूप से उल्लेख किया, जब जयपुर में मुख्यमंत्री आवास पर कांग्रेस विधायक दल की एक बेहद महत्वपूर्ण और औपचारिक बैठक बुलाई गई थी। उन्होंने उस दौर की कड़वी यादों को साझा करते हुए कहा कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के केंद्रीय पर्यवेक्षकों का अचानक बिना किसी पूर्व सूचना या स्थानीय तालमेल के जयपुर पहुंचना और उसके तुरंत बाद पैदा हुए अत्यधिक तनावपूर्ण हालात सामान्य नहीं थे। उनके अनुसार, पूरे घटनाक्रम को इस तरह से मीडिया और राजनीतिक गलियारों में प्रस्तुत किया गया जिससे ऐसा प्रतीत हो कि वे पार्टी आलाकमान के आदेशों के खिलाफ कोई बगावत या समानांतर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। इस कृत्रिम रूप से तैयार किए गए नैरेटिव का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर उनकी दशकों पुरानी बेदाग राजनीतिक छवि को धूमिल करना और उनके राजनीतिक प्रभाव को सीमित करना था, जिसमें कुछ अंदरूनी तत्व पूरी तरह से शामिल थे।
गहलोत ने उस समय विधायक दल की बैठक में विधायकों के न पहुंचने और विधानसभा अध्यक्ष के आवास पर जाकर सामूहिक इस्तीफे सौंपने की घटना का पुरजोर शब्दों में बचाव किया। उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए तर्क दिया कि वह अभूतपूर्व कदम किसी भी स्तर पर पार्टी आलाकमान या गांधी परिवार के प्रति किसी विद्रोह या असंतोष का प्रदर्शन नहीं था। असल में, वह राज्य के उन सौ से अधिक निष्ठावान और वफादार विधायकों का एक स्वाभाविक और तीव्र आक्रोश था, जो किसी भी कीमत पर वर्ष 2020 में अपनी ही चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश करने वाले बगावती गुट के नेता को राज्य का नया मुख्यमंत्री स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। विधायकों की यह मांग पूरी तरह से व्यावहारिक थी कि जिसने संकट के समय पार्टी की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया, उसे इतनी बड़ी और गरिमामयी कुर्सी सौंपना उन लोगों के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा जिन्होंने सरकार को बचाने के लिए महीनों तक रिसॉर्ट में रहकर संघर्ष किया था। राजनीतिक बैठकों और संगठनात्मक बदलावों के पारंपरिक तौर-तरीकों पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ नेता ने कहा कि सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत जब भी पार्टी आलाकमान किसी राज्य के मुख्यमंत्री को बदलने का फैसला करता है, तो लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक विधायक तुरंत नए नेता की तरफ अपना झुकाव प्रदर्शित करने लगते हैं। हालांकि, जयपुर के उस घटनाक्रम के दौरान यह स्थिति बिल्कुल विपरीत थी; जब नए मुख्यमंत्री के रूप में एक विशिष्ट नाम की चर्चाएं शुरू हुईं, तो एक भी वफादार विधायक उनके आवास या उनके खेमे में जाने को तैयार नहीं हुआ, जो इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण है कि उस चेहरे के प्रति विधायकों के भीतर कितना गहरा अविश्वास और असंतोष व्याप्त था।
अपनी इस लंबी और विस्तृत बातचीत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ने बिना किसी संकोच के अपने धुर विरोधी गुट के नेता को पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर हकीकत का सामना करने की एक बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर नसीहत भी दे डाली। उन्होंने कहा कि मानव जीवन में गलतियां होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन राजनीति और सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक टिके रहने के लिए अपनी भूलों को स्वीकार करने का साहस होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2020 में हरियाणा के मानेसर में जिस प्रकार का बगावती घटनाक्रम हुआ था, वह पूरी तरह से गलत कदम था। यदि उस गुट के नेता और उनके सहयोगियों ने अपनी उस बड़ी भूल को खुले दिल से स्वीकार कर लिया होता, तो पार्टी के भीतर यह आंतरिक गतिरोध और अविश्वास का माहौल आज तक कभी भी कायम नहीं रहता।
सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों की चर्चा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी एक और पुरानी शिकायत को मीडिया के सामने बेहद मुखर होकर रखा, जिसका संबंध उनके और उनके सहयोगियों के आपसी अतीत से जुड़ा हुआ है। उन्होंने साझा किया कि अतीत में जब केंद्र सरकार के गठन के समय एक युवा चेहरे को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल कराने की बात चल रही थी, तब उन्होंने स्वयं दिल्ली जाकर उनके नाम की पुरजोर वकालत की थी और उन्हें केंद्रीय मंत्री बनाने में एक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई थी। उन्हें इस बात का गहरा मलाल है कि जिस व्यक्ति की उन्होंने राजनीतिक उन्नति के लिए इतनी बड़ी पैरवी की, उसने कभी भी सार्वजनिक रूप से इस सच को स्वीकार नहीं किया और न ही इसके लिए कभी कोई कृतज्ञता प्रकट की। इस प्रकार के आचरण और व्यवहार के कारण ही दोनों पक्षों के बीच समय के साथ संवादहीनता और दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं, जिसका खामियाजा पूरे राज्य संगठन को उठाना पड़ा।
इस पूरे विवाद और राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर होने के बाद पार्टी के भीतर उनकी स्थिति को लेकर लगाए जा रहे विभिन्न कयासों पर भी उन्होंने बेहद दार्शनिक और कड़ा रुख अख्तियार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वे वास्तव में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ किसी विद्रोह का हिस्सा होते या उनकी मंशा आलाकमान को चुनौती देने की होती, तो केंद्रीय आलाकमान उन्हें उस संकट के बाद भी पूरे कार्यकाल के लिए राज्य के मुख्यमंत्री के पद पर कभी भी बनाए रखने का फैसला नहीं करता। उन्होंने कहा कि उनके और शीर्ष नेतृत्व के बीच के रिश्ते किसी भी कृत्रिम नैरेटिव या साजिश से कहीं अधिक मजबूत और गहरे हैं। जब उन्होंने स्वयं दिल्ली जाकर तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात की थी, तो उन्होंने पूरे घटनाक्रम पर गहरा खेद व्यक्त करते हुए लिखित रूप से माफी भी मांगी थी, क्योंकि वे अपनी मर्जी से कभी भी संगठन की प्राथमिकताओं में व्यवधान नहीं डालना चाहते थे।
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