MP Rice Scam: मध्य प्रदेश में एथेनॉल के नाम पर 1160 करोड़ रुपये का चावल घोटाला, SIT जांच शुरू, विपक्ष हमलावर
MP Ethanol Rice Scam: मध्य प्रदेश में एथेनॉल उत्पादन के नाम पर 1160 करोड़ रुपये के कथित चावल घोटाले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है। विपक्ष सरकार पर हमलावर है।
- MP Ethanol Rice Scam: एमपी में एथेनॉल उत्पादन के नाम पर बड़ा खेल, 1160 करोड़ के चावल घोटाले की जांच करेगी एसआईटी
- मध्य प्रदेश में 1160 करोड़ रुपये का चावल घोटाला: एथेनॉल प्लांट के नाम पर हुआ बड़ा खेल, सरकार ने बिठाई SIT, विपक्ष ने घेरा
- मध्य प्रदेश प्रशासनिक गलियारे से बड़ी खबर: एथेनॉल नीति के तहत 1160 करोड़ रुपये के कथित चावल घोटाले पर मुख्यमंत्री का कड़ा एक्शन, एसआईटी का गठन
INTRODUCTION मध्य प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में एथेनॉल (Ethanol) उत्पादन की आड़ में एक बहुत बड़े वित्तीय घालमेल का मामला गरमा गया है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी वैकल्पिक ईंधन नीति के तहत एथेनॉल बनाने के नाम पर करीब 1160 करोड़ रुपये के कथित चावल घोटाले (Rice Scam) का पर्दाफाश हुआ है। सोमवार, 13 जुलाई 2026 को सामने आई प्रशासनिक जानकारियों के अनुसार, मुख्य विपक्षी दल द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों और प्राथमिक विभागीय ऑडिट के बाद राज्य सरकार ने इस पूरे मामले की गहराई से विधिक तफ्तीश करने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया है। कथित रूप से यह गड़बड़ी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) और सार्वजनिक उपभोग के लिए आरक्षित चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए अनधिकृत रूप से डायवर्ट करने से जुड़ी है। इस खुलासे के बाद से ही विपक्षी दलों ने विधानसभा से लेकर सड़कों तक प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे आने वाले दिनों में प्रशासनिक फेरबदल और विधिक कार्रवाइयों का दौर तेज होने की संभावना है।
यह पूरा विधिक और राजनीतिक मामला मध्य प्रदेश के खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग तथा उद्योग विभाग के समन्वय से लागू की गई एथेनॉल संवर्धन नीति से संबंधित है। केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों के तहत पर्यावरण अनुकूल वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने के लिए एथेनॉल संयंत्रों (Ethanol Plants) को रियायती दरों पर या अधिशेष (Surplus) खाद्यान्न उपलब्ध कराने का प्रावधान है। आरोप है कि इसी नीति की आड़ में कुछ रसूखदार राइस मिलर्स, विभागीय अधिकारियों और बिचौलियों के गठजोड़ ने एक बड़ा खेल कर दिया। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, करीब 1160 करोड़ रुपये मूल्य का वह चावल जो गरीबों के राशन या केंद्रीय पूल के लिए सुरक्षित रखा जाना था, उसे कागजों पर हेराफेरी करके एथेनॉल निर्माण के लिए निजी रिफाइनरियों और संयंत्रों को भेज दिया गया।
इस कथित घोटाले का घटनाक्रम पिछले कई महीनों के दौरान अलग-अलग जिलों के सरकारी अनाज गोदामों से जारी स्टॉक के मिलान के दौरान सामने आया। विभागीय ऑडिट टीम ने पाया कि भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य विपणन संघ के रिकॉर्ड्स में दर्ज चावल की भौतिक उपलब्धता और वास्तविक स्टॉक में भारी विसंगतियां थीं।
इंटरनेट और मीडिया में जब यह मामला उछला, तो मुख्यमंत्री कार्यालय ने सतर्कता विभाग से प्रारंभिक रिपोर्ट तलब की। जांच में सामने आया कि एथेनॉल बनाने वाली कुछ कंपनियों को उनकी निर्धारित क्षमता से कई गुना अधिक चावल का आवंटन कर दिया गया, जबकि धरातल पर एथेनॉल का उतना उत्पादन ही दर्ज नहीं था। कई मामलों में तो बिना परिवहन के ही केवल फर्जी कागजी बिलों (Fake Invoices) के आधार पर अनाज का उठाव दिखा दिया गया। मामले की गंभीरता और वित्तीय घाटे के विशाल आकार को देखते हुए सरकार ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में पांच सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जिसने विभिन्न जिलों के राज्य खाद्य भंडारों के डिजिटल लॉग्स और फिजिकल रजिस्टरों को जब्त कर अपनी विधिक विवेचना शुरू कर दी है।
इस संवेदनशील मुद्दे पर मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में पूरी तरह से संतुलित लेकिन तीखी बयानबाजी का दौर जारी है। मुख्य विपक्षी दल के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए एक संयुक्त बयान में कहा, "यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि एक संगठित सांठगांठ है, जिसने राज्य के गरीब नागरिकों के मुंह का निवाला छीनकर निजी एथेनॉल कंपनियों की तिजोरियां भरी हैं। 1160 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा तो सिर्फ एक बानगी है, यदि उच्च न्यायालय की निगरानी में निष्पक्ष जांच हो तो यह देश का सबसे बड़ा खाद्यान्न घोटाला साबित हो सकता है।" विपक्ष ने इस मामले में विभागीय मंत्री के इस्तीफे की भी पुरजोर मांग की है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता और गृह मंत्री ने विपक्ष के आरोपों पर संतुलित विधिक स्टैंड लेते हुए कहा, "हमारी सरकार किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति पर चलती है। जैसे ही विसंगतियों की प्राथमिक जानकारी मिली, मुख्यमंत्री जी ने तुरंत एसआईटी जांच के आदेश दे दिए हैं। कानून के स्थापित नियमों के तहत जांच चल रही है और इसमें चाहे कोई भी बड़ा अधिकारी या रसूखदार व्यक्ति शामिल हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। विपक्ष केवल राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।"
इस 1160 करोड़ रुपये के कथित खाद्यान्न घोटाले और उसके बाद शुरू हुई एसआईटी जांच का मध्य प्रदेश के प्रशासनिक और आर्थिक मोर्चे पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। सबसे बड़ा असर राज्य की खाद्य सुरक्षा और राशन वितरण प्रणाली पर देखा जा रहा है क्योंकि गोदामों में स्टॉक की विसंगतियों के कारण कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत बांटे जाने वाले अनाज की आपूर्ति में अस्थायी कमी आई है।
इसके अलावा, राज्य की एथेनॉल उत्पादन नीति से जुड़े विधिक नियमों को और अधिक कड़ा कर दिया गया है, जिससे नए निवेशों और संयंत्रों के संचालन की प्रशासनिक प्रक्रियाएं कुछ समय के लिए धीमी हो सकती हैं। शासन स्तर पर इस कार्रवाई से नौकरशाही (Bureaucracy) के भीतर हड़कंप मचा हुआ है और खाद्य विभाग के कई जिला प्रबंधकों व लेखाधिकारियों के वित्तीय अधिकारों पर रोक लगा दी गई है। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम केंद्र सरकार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसमें इस तरह की राज्य स्तरीय गड़बड़ी पूरी नीति के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान खड़े करती है।
आगामी दिनों में एसआईटी की तकनीकी और फॉरेंसिक टीमें मध्य प्रदेश के प्रमुख राइस मिलों और चिन्हित एथेनॉल संयंत्रों के बैंक खातों तथा स्टॉक मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर की सघन तलाशी लेंगी। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, एसआईटी शुरुआती जांच के आधार पर दोषी पाई जाने वाली फर्मों के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और सरकारी धन के गबन से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत केस डायरी तैयार कर प्राथमिक चार्जशीट माननीय अदालत के समक्ष पेश करेगी। विपक्ष इस मुद्दे को मानसून सत्र में पूरी ताकत से उठाने की रणनीति बना रहा है, जिसके चलते सदन में भारी हंगामे के आसार हैं। सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर बहुत जल्द कई बड़े चेहरों पर निलंबन और विधिक गिरफ्तारी की गाज गिर सकती है।
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