अभिषेक बनर्जी ने मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की दी खुली चुनौती
इस कूटनीतिक घमासान के बीच चुनावी प्रक्रिया के संचालन पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। राष्ट्रीय महासचिव ने देश के चुनाव प्रबंधन तंत्र पर बेहद संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि मतदान के दौरान और उसके बाद की प्रक्रियाओं में निष्पक्षता का पूरी तरह से अभाव देखा ग
- केंद्रीय जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर विपक्षी दल के राष्ट्रीय महासचिव का बड़ा हमला: कूटनीतिक दबाव की राजनीति को लोकतंत्र के लिए बताया गंभीर खतरा
- संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता दांव पर: सत्ता पक्ष के इशारे पर विपक्षी नेताओं को भयभीत करने और चुनाव प्रभावित करने के प्रयासों का पुरजोर विरोध
राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर संवैधानिक संस्थाओं और जांच एजेंसियों के कार्यक्षेत्र को लेकर एक बार फिर तीखा टकराव देखने को मिल रहा है। क्षेत्रीय दल के प्रमुख रणनीतिकार और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी शीर्ष संस्थाओं के कामकाज के तरीकों पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। उन्होंने अपने बयानों में यह साफ किया कि देश के भीतर वर्तमान में ऐसा माहौल बना दिया गया है जहाँ स्वतंत्र रूप से काम करने वाले तंत्र का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अभिषेक बनर्जी का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयां केवल चुनिंदा लोगों और विपक्षी दलों के नेताओं को डराने तथा उनकी राजनीतिक सक्रियता को बाधित करने के उद्देश्य से की जा रही हैं। उन्होंने सत्तासीन तंत्र को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि दबाव बनाने की ऐसी कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए उनका संघर्ष लगातार जारी रहेगा।
इस कूटनीतिक घमासान के बीच चुनावी प्रक्रिया के संचालन पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अभिषेक बनर्जी ने देश के चुनाव प्रबंधन तंत्र पर बेहद संगीन आरोप बढ़ाते हुए कहा कि मतदान के दौरान और उसके बाद की प्रक्रियाओं में निष्पक्षता का पूरी तरह से अभाव देखा गया। उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र में मतों की गिनती और मशीनों के प्रबंधन को लेकर संदेह व्यक्त किया है। उनका दावा है कि जिस प्रकार मतदान के आधिकारिक आंकड़ों और गणना के समय सामने आए आंकड़ों में अंतर देखने को मिला है, वह जनता के भरोसे को तोड़ने वाला है। अपनी बात को मजबूती से रखने के लिए अभिषेक बनर्जी ने चुनौती दी कि अगर चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह से साफ-सुथरी थी, तो संबंधित केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों हो रही है। चुनावी प्रक्रिया के दौरान लगभग तीस लाख वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से जानबूझकर हटाने का आरोप लगाया गया है, जिसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन माना जा रहा है।
राजनीतिक परिदृश्य में यह भी देखा गया है कि मतदान और मतगणना के महत्वपूर्ण दिनों में विपक्षी दलों के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं और एजेंटों को केंद्रीय बलों तथा जांच संस्थाओं के माध्यम से नोटिस भेजे गए। इस रणनीति के पीछे का मुख्य उद्देश्य कार्यकर्ताओं को भयभीत करना था ताकि वे मतगणना केंद्रों पर अपनी उपस्थिति दर्ज न करा सकें। इस तरह के कदमों को सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार बताते हुए अभिषेक बनर्जी ने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र में चुनावी संस्थाओं का मुख्य काम निष्पक्षता का माहौल बनाना होता है, न कि किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुँचाना। जब संस्थाएं अपना मूल चरित्र खोने लगती हैं, तो आम नागरिकों का पूरी व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है।
जांच एजेंसियों द्वारा लगातार की जा रही पूछताछ और छापों के सिलसिले पर कड़ा रुख अपनाते हुए अभिषेक बनर्जी ने कहा कि कूटनीतिक रूप से प्रेरित होकर की जाने वाली इन लंबी पूछताछ सत्रों से वे डरने वाले नहीं हैं। कानून का सम्मान करने वाले नागरिकों के रूप में वे हर जांच में पूरा सहयोग करने को तैयार हैं, बशर्ते वह जांच पूरी तरह से भेदभाव रहित हो। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष से जुड़े नेताओं के खिलाफ आने वाली शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, जबकि विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए हर संभव कानूनी और गैर-कानूनी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। संस्थाओं का यह एकतरफा रवैया देश के विरासत में मिले संघीय ढांचे के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है। चुनावी प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर स्थानीय अधिकारियों और कर्मचारियों पर बनाए जा रहे दबाव के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया गया है। एक तरफ जहां प्रशासनिक स्तर पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने के निर्देश दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अभिषेक बनर्जी का आरोप है कि वास्तविक धरातल पर सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं को खुली छूट दी गई है, जबकि उनके अपने समर्थकों को प्रताड़ित किया जा रहा है। चुनाव के बाद हुई हिंसा और कार्यकर्ताओं के पलायन की घटनाओं का जिक्र करते हुए यह संदेश दिया गया कि लोकतंत्र में राजनीतिक विचारधारा अलग होने के कारण किसी भी नागरिक को असुरक्षित महसूस करने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम पर कानूनी मोर्चे पर भी लड़ाई लड़ने की तैयारी पूरी कर ली गई है। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का स्वागत करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि देश का संविधान और न्यायिक प्रणाली अभी भी आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे बड़ा संबल हैं। कूटनीतिक स्तर पर इस मुद्दे को अभिषेक बनर्जी संसद के आगामी सत्रों में भी पूरी प्रखरता के साथ उठाने की रणनीति बना रहे हैं। उनका मानना है कि राजनीतिक दलों का अस्तित्व जनता के समर्थन से होता है और जब तक जनता का विश्वास उनके साथ है, तब तक किसी भी केंद्रीय एजेंसी के माध्यम से उनकी राजनीतिक जमीन को कमजोर नहीं किया जा सकता।
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