Lucknow: प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की  नियुक्ति के खिलाफ याचिका सुनने से न्यायालय ने खड़े किए हाथ 

यूपी विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे पर भ्रष्टाचार व उनके लंबे समय से अवैधानिक रूप से पद पर बने रहने के मामले

Jun 5, 2026 - 16:40
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Lucknow: प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की  नियुक्ति के खिलाफ याचिका सुनने से न्यायालय ने खड़े किए हाथ 
प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की  नियुक्ति के खिलाफ याचिका सुनने से न्यायालय ने खड़े किए हाथ 

लखनऊ। यूपी विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे पर भ्रष्टाचार व उनके लंबे समय से अवैधानिक रूप से पद पर बने रहने के मामले में  लखनऊ हाईकोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई करने से पहले ही डिवीजन बेंच ने खुद को अलग कर लिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा में सूचना अधिकारी रह चुके याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से छुट्टी के दौरान चल रही कोर्ट में जब सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह जैसे ही पेश हुई तभी न्यायाधीश जसप्रीत सिंह और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला ने अपने आप को प्रदीप दुबे का पूर्व परिचित होने के नाते मामले से अलग कर लिया।

  • क्या है मामला!

उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि विधानसभा का प्रमुख सचिव अपने पद पर नियुक्ति को लेकर विवादों में है।सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह ने बताया कि उप्र विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में पद पर बने रहने की वैधता को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका के माध्यम से चुनौती देने के पहले उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,राज्यपाल प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और कई अन्य उचित मंचों पर इस मामले की शिकायत की थी बाद में इस मामले पर लखनऊ हाई कोर्ट में दायर की गई ।

रीना एन सिंह ने याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से आरोप लगाया गया है कि दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है। वह बिना किसी वैध अधिकार के पद पर बने हुए हैं।  रीना एन सिंह  का कहना है कि वर्ष 2009 में दुबे की नियुक्ति विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें)नियमावली, 1974 की अनदेखीकरते हुए की गई थी। नियमावली के अनुसार चयन श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय उनकी आयु इससे अधिक थी। दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उप्र न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली थी।
 उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किया गया और छह दिन बाद, 19 जनवरी 2009 को विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार भी सौंप दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद-187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई। याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित पांचवें संशोधन पर भी सवाल उठाए गए हैं।

 दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर रखा ही नहीं गया और इन्हीं के आधार पर दुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया गई जाता रहा। वर्ष 2011 में लागू की 'सर्विस ट्रांसफर' व्यवस्था को भी नियमों के विपरीत बताते हुए कहा गया है कि इसी के माध्यम से उनकी स्थिति नियमित करने का प्रयास किया गया। दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे। बाद में 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है। दुबे को प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार सिद्ध करने का निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट से क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है।

  • क्या बोली कर्मेश प्रताप सिंह की अधिवक्ता रीना एन सिंह!

 रीना एन सिंह ने बताया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत प्रस्तुत  रिट याचिका में अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाये गये है।  उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव  जैसे उच्च सार्वजनिक पद पर कथित रूप से अवैध कब्जे और निरंतर बने रहने से संबंधित है। उन्होंने बताया कि याचिका में प्रतिवादी संख्या-3  प्रदीप कुमार दुबे के विरुद्ध क्वो वारंटो  रिट जारी करने की मांग की गई है। अर्थात वह किस अधिकार के तहत अपने पद पर बने हुए हैं। रीना एन सिंह का  आरोप है कि वे बिना किसी वैध कानूनी अधिकार के प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर बने हुए हैं तथा संविधान, वैधानिक सेवा नियमों, मूलभूत सेवा नियमों और न्यायालयों के बाध्यकारी आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं। याचिका में अधिवक्ता रीना एन सिंह ने प्रश्न उठाया है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो नियुक्ति के समय पात्र नहीं था,जो वर्षों पहले सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुका है,जिसके पक्ष में कोई वैध नियुक्ति, सेवा-विस्तार, पुनर्नियुक्ति या संविदा आदेश उपलब्ध नहीं है,
फिर भी अभिलेखों को दबाकर और संस्था पर नियंत्रण रखकर संवैधानिक पद पर बना रह सकता है।

याचिका के अनुसार प्रदीप कुमार दुबे का जन्म 15 अप्रैल 1957 को हुआ।
वे वर्ष 1987 में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में नियुक्त हुए।
1994 से 2006 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के विधिक सलाहकार रहे।
2007 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्य किया।
जुलाई 2007 में प्रतिनियुक्ति पर संसदीय कार्य विभाग में सचिव बनाए गए।जनवरी 2009 में प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किए गए। आरोप है कि 13 जनवरी 2009 को उन्होंने न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर उसी दिन प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) के रूप में नियुक्ति प्राप्त की और 19 जनवरी 2009 को उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव पद का अतिरिक्त प्रभार भी ग्रहण कर लिया। यह सब बिना विज्ञापन, चयन प्रक्रिया और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की अनुशंसा के किया गया। 

  • आयु संबंधी आपत्ति-

याचिका के अनुसार, 1974 के सेवा नियमों में प्रमुख सचिव जैसे चयन श्रेणी के पदों के लिए अधिकतम आयु 52 वर्ष निर्धारित है। आरोप है कि प्रदीप दुबे इस सीमा से अधिक आयु के होने के बावजूद पद पर नियुक्त किए गए।जो अवैधानिक है।
रीना एन सिंह ने कहा कि याचिका में प्रदीप दुबे नियुक्ति को अवैध बताने के पर्याप्त आधार बताये गए हैं क्योंकि 
कोई रिक्ति घोषित नहीं की गई।
UPPSC को कोई अधियाचन नहीं भेजा गया।कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ।कोई प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया नहीं हुई।नियुक्ति नियमों के विपरीत की गई।
इस कारण याचिकाकर्ता की अधिवक्ता रीना एन सिंह ने  दावा किया है कि नियुक्ति प्रारंभ से ही शून्य  है।

  • सेवानिवृत्ति के बाद पद पर बने रहने का आरोप-

 रीना एन सिंह ने बताया कि प्रदीप कुमार दुबे  30 अप्रैल 2017 को सेवानिवृत्त हो गए थे।
बाद में 65 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा लागू होने के बावजूद वे उससे भी आगे पद पर बने रहे।
वर्तमान में वे लगभग 68-69 वर्ष की आयु में भी बिना किसी वैध आदेश के कार्यरत बताए गए।

  • याचिका की मुख्य मांग-

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से प्रार्थना की है कि प्रदीप कुमार दुबे से पूछा जाए कि वे किस वैधानिक अधिकार से प्रमुख सचिव के पद पर बने हुए हैं।
उनकी नियुक्ति और पद पर बने रहने को अवैध घोषित किया जाए।
उन्हें पद से हटाया जाए।प्रमुख सचिव विधानसभा पद को विधिसम्मत चयन प्रक्रिया द्वारा भरा जाए।कथित अनियमितताओं की जांच कराई जाए।

  • क्या होता है क्यों वारंटों!

 क्वो वारंटी एक ऐसी रिट है जो किसी व्यक्ति को ऐसे सार्वजनिक पद पर कार्य करने से रोकने के लिए जारी की जाती है जिसके लिए वह हकदार नहीं है। इसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जारी कर सकती है इसमें व्यक्ति से पूछा जाता है कि आप किस अधिकार के तहत इस पद पर बने हुए हैं।

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