'मैं देश का सबसे संतुष्ट राजनेता हूँ, अब मुझे किसी पद या सत्ता की लालसा नहीं' - पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर में दिया बड़ा बयान
राजस्थान की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से जारी अंदरूनी सियासी घमासान एक बार फिर पूरी तरह से सतह पर आ गया है।
- राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर गरमाया अंदरूनी कलह, अशोक गहलोत के बयान ने कांग्रेस आलाकमान और विरोधियों को किया हैरान
- सचिन पायलट गुट की पुरानी बगावत को लेकर गहलोत ने फिर साधा निशाना, गलतियां स्वीकार करने और सच्चाई का सामना करने की दी नसीहत
राजस्थान की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से जारी अंदरूनी सियासी घमासान एक बार फिर पूरी तरह से सतह पर आ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत ने प्रादेशिक राजधानी जयपुर में पत्रकारों से संवाद करते हुए एक ऐसा बयान दिया है, जिसने न केवल उनके विरोधियों बल्कि खुद उनकी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भी हैरत में डाल दिया है। राज्य सरकार के कार्यकाल के बीच अचानक मीडिया के सामने आए पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी वर्तमान राजनीतिक स्थिति और महत्वाकांक्षाओं को लेकर बेहद बेबाक टिप्पणी की है। उन्होंने खुद को देश का एक बेहद संतुष्ट और परिपक्व नेता बताते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि वे अब सत्ता की किसी अंधी दौड़ का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि, इस बयान के राजनीतिक निहितार्थ बेहद गहरे माने जा रहे हैं, क्योंकि राज्य में आगामी संगठनात्मक बदलावों और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लंबे समय से कयासों का बाजार गर्म है।
अशोक गहलोत ने अपने लंबे और उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक जीवन का हवाला देते हुए कहा कि ईश्वर और पार्टी आलाकमान ने उन्हें वह सब कुछ दिया है, जिसकी कामना कोई भी राजनेता अपने जीवन में करता है। तीन बार राज्य की कमान संभालना और देश के सर्वोच्च नीति-निर्माता निकायों में शामिल रहना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। उन्होंने कहा कि "आज मेरे पास सब कुछ है और मैं इस देश का एक अत्यंत संतुष्ट राजनीतिज्ञ हूँ।" इस कड़े और गंभीर बयान के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश की है कि वे अब किसी भी पद को हासिल करने के लिए लालायित नहीं हैं और न ही किसी आंतरिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि भविष्य में उन पर संगठन द्वारा कोई जिम्मेदारी जबरन थोपी जाती है, तो वह एक अलग विषय होगा, लेकिन व्यक्तिगत रूप से वे अब किसी राजनीतिक कुर्सी के पीछे नहीं भाग रहे हैं।
इस पूरी बातचीत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री ने बिना किसी हिचकिचाहट के पार्टी के भीतर अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले सचिन पायलट के नेतृत्व में वर्ष 2020 में हुई ऐतिहासिक बगावत का मुद्दा एक बार फिर से छेड़ दिया। उन्होंने उस दौर के राजनीतिक संकट का जिक्र करते हुए कहा कि जो लोग उस समय पार्टी लाइन से अलग जाकर बगावत का नेतृत्व कर रहे थे, उन्हें आज अपनी उन पुरानी भूलों को खुले दिल से स्वीकार कर लेना चाहिए। उन्होंने नसीहत देते हुए कहा कि राजनीति में लंबे समय तक टिके रहने के लिए सच को स्वीकार करने की आदत डालनी बेहद जरूरी होती है। जब तक कोई नेता अपनी गलतियों को नहीं मानता, तब तक अंदरूनी गतिरोध को पूरी तरह से समाप्त करना मुमकिन नहीं होता। उनके इस रुख से साफ है कि दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक मंचों पर दिखने वाली कथित शिष्टता के बावजूद जमीनी स्तर पर कड़वाहट अभी भी पूरी तरह बरकरार है।
पुरानी बगावत और अंदरूनी समीकरण
वर्ष 2020 में राजस्थान कांग्रेस के भीतर आए बड़े भूचाल के दौरान लगभग उन्नीस विधायकों के साथ मानेसर के एक रिसॉर्ट में डेरा डालने की घटना को याद करते हुए गहलोत ने कहा कि उस समय पार्टी आलाकमान के खिलाफ नहीं, बल्कि एक विशेष चेहरे को मुख्यमंत्री के रूप में थोपने की कोशिश के खिलाफ विधायकों में भारी गुस्सा था। यही कारण था कि बाद में हुए संकट के दौरान भी सौ से अधिक विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व के प्रति अपनी वफादारी बनाए रखी थी।
गहलोत ने सितंबर 2022 में जयपुर में बुलाई गई कांग्रेस विधायक दल की बैठक के ऐतिहासिक बहिष्कार का भी खुलकर बचाव किया, जिसे उस समय केंद्रीय नेतृत्व के आदेशों की अवहेलना के रूप में देखा गया था। उन्होंने इस घटनाक्रम को अपने खिलाफ रची गई एक बड़ी साजिश करार देते हुए कहा कि वह बहिष्कार किसी भी तरह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व या आलाकमान के खिलाफ कोई विद्रोह नहीं था। असल में, वह राज्य के उन सौ से अधिक वफादार विधायकों का सामूहिक और स्वाभाविक आक्रोश था, जो किसी भी कीमत पर बगावत करने वाले गुट के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने दलील दी कि यदि वह वास्तव में आलाकमान के खिलाफ कोई बगावत होती, तो केंद्रीय नेतृत्व उन्हें बाद में भी मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखने का फैसला कभी नहीं करता, जिससे यह साबित होता है कि उनकी वफादारी पर कभी कोई शक नहीं था।
पूर्व मुख्यमंत्री ने सचिन पायलट के शुरुआती राजनीतिक सफर और उनके साथ अपने पारिवारिक संबंधों को याद करते हुए एक बेहद भावुक लेकिन तीखा दृष्टिकोण भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि वे पायलट को बचपन के दिनों से जानते हैं और उनके पूरे परिवार के साथ उनके बेहद आत्मीय संबंध रहे हैं, इसलिए उनके मन में किसी के प्रति कोई व्यक्तिगत शत्रुता या दुर्भावना नहीं है। उन्होंने मीडिया में चल रही उन खबरों को पूरी तरह से काल्पनिक और प्रायोजित बताया, जिनमें समय-समय पर पायलट को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष या राज्य इकाई का मुख्य चेहरा बनाए जाने के कयास लगाए जाते हैं। गहलोत ने यह भी दावा किया कि अतीत में जब पायलट को केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री बनाया गया था, तब उन्होंने खुद उनके नाम की पुरजोर पैरवी की थी, लेकिन अफसोस इस बात का है कि इस सच को कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच अशोक गहलोत ने अपने राजनीतिक विरोधियों और पार्टी के भीतर मौजूद आलोचकों को एक बेहद अनूठी और दार्शनिक चुनौती भी दे डाली। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी नेता के कद को छोटा करने का प्रयास करना एक गलत परंपरा है। उन्होंने एक मुहावरे का प्रयोग करते हुए कहा कि "मेरी खींची हुई लकीर को मिटाने का प्रयास करने के बजाय, मेरे विरोधियों को चाहिए कि वे खुद मेहनत करके मुझसे बड़ी लकीर खींचकर दिखाएं।" तीन बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनके द्वारा शुरू की गई जनकल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा के मॉडलों को देश भर में सराहा गया है, इसलिए उनके राजनीतिक योगदान को इतिहास से मिटाना किसी के लिए भी संभव नहीं होगा।
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