लखनऊ के बीकेटी में समाधान दिवस की खुली पोल: 10 बार गुहार के बाद भी नहीं हुआ जमीन का सीमांकन, ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से मांगी मदद

लखनऊ के बीकेटी की गोहनाकला ग्राम पंचायत में ग्राम सभा की जमीन हस्तांतरण न होने से विकास ठप। 10 बार शिकायत के बाद भी सुनवाई नहीं, ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से लगाई गुहार।

Jul 10, 2026 - 21:07
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लखनऊ के बीकेटी में समाधान दिवस की खुली पोल: 10 बार गुहार के बाद भी नहीं हुआ जमीन का सीमांकन, ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से मांगी मदद
तहसील समाधान दिवस में 10 बार शिकायत के बाद भी खाली हाथ रहे ग्रामीण, लखनऊ के गोहनाकला में जमीन विवाद से थमा विकास, अब मुख्यमंत्री से न्याय की उम्मीद

राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब (बीकेटी) तहसील क्षेत्र से प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा मामला सामने आया है, जो सरकारी दावों की जमीनी हकीकत को बयां कर रहा है। तहसील समाधान दिवसों में जिला स्तर के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी के बाद भी जनता की बुनियादी समस्याओं का निस्तारण नहीं हो पा रहा है। ऐसा ही एक गंभीर प्रकरण गोहनाकला ग्राम पंचायत से जुड़ा है, जहां ग्राम सभा की बेशकीमती भूमि के हस्तांतरण और दर्ज करने की प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से विभागीय सुस्ती की भेंट चढ़ी हुई है। ग्राम प्रधान और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि दर्जनों बार लिखित शिकायत देने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी केवल कोरा आश्वासन देते रहे, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। स्थानीय प्रशासन के इस ढुलमुल रवैये से दुखी होकर अब ग्रामीणों ने अपनी गुहार सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंचाने का मन बनाया है।

ग्रामीणों द्वारा दी गई तकनीकी जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत की गाटा संख्या 1180 (क्षेत्रफल 13.4050 हेक्टेयर), 1188 (क्षेत्रफल 0.102530 हेक्टेयर), 1189 (क्षेत्रफल 0.07600 हेक्टेयर) और 1190 सहित कई अन्य महत्वपूर्ण जमीनों का आज तक राजस्व सरकारी दस्तावेजों में सही तरीके से नाम दर्ज नहीं हो पाया है। इस वजह से यह भूमि ग्राम सभा के नाम हस्तांतरित होने से रुकी हुई है। आरोप है कि राजस्व विभाग की घोर उदासीनता के कारण इस विवादित भूमि का आधिकारिक सीमांकन (नापजोख) भी नहीं कराया गया, जिसका फायदा उठाकर वन विभाग लगातार इस पर अपना हस्तक्षेप बनाए हुए है। ग्रामीणों का तर्क है कि यदि यह जमीन कानूनी रूप से ग्राम सभा को मिल जाए, तो वहां बच्चों के लिए खेल का मैदान, बेसहारा पशुओं के लिए गौशाला, बारातघर, कब्रिस्तान और अन्य जरूरी सार्वजनिक जनसुविधाओं का निर्माण आसानी से कराया जा सकता है।

इस प्रशासनिक हीलाहवाली का सबसे बुरा असर केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं पर पड़ रहा है। जमीन न मिलने से गांव का चहुंमुखी विकास पिछले कई वर्षों से पूरी तरह ठप पड़ा है। पीड़ितों का कहना है कि वे और उनके ग्राम प्रधान अब तक 10 से अधिक बार संपूर्ण समाधान दिवसों में जिला प्रशासन के सामने अपनी लिखित फरियाद रख चुके हैं। हर बार फाइलों को आगे बढ़ाने का दिलासा तो दिया जाता है, लेकिन न तो जमीन की नापी होती है और न ही हस्तांतरण की प्रक्रिया एक कदम आगे बढ़ती है। इस लगातार हो रही उपेक्षा के कारण अब ग्रामीणों के भीतर स्थानीय प्रशासन के प्रति भारी असंतोष और आक्रोश पनप रहा है।

पीड़िता जनता का साफ कहना है कि जब तहसील और जिला स्तर के चक्कर काटने के बाद भी उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा, तो अब वे अपनी सामूहिक शिकायत मुख्यमंत्री के जनता दरबार में भेज रहे हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद भी स्थानीय अधिकारियों की नींद नहीं खुली, तो वे अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से एक बड़ा जनआंदोलन शुरू करने को बाध्य होंगे। ग्रामीणों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि इन विवादित गाटा संख्याओं का तुरंत संयुक्त टीम बनाकर सीमांकन कराया जाए, वहां खड़े जंगली पेड़ों की नीलामी पूरी कर जमीन गांव को सौंपी जाए और लापरवाही बरतने वाले राजस्व कर्मियों की जवाबदेही तय की जाए। इस संबंध में लखनऊ के प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) सितांशु पाण्डेय ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में आया है और जल्द ही उपजिलाधिकारी (एसडीएम) से समन्वय बनाकर एक संयुक्त विभागीय जांच टीम गठित की जाएगी, जिसके बाद नियमों के तहत आगे की उचित कार्रवाई सुनिश्चित होगी।

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