Sambhal : 101 करोड़ की सरकारी जमीन पर 59 साल का खेल खत्म! 38 बीघा पर कब्जा, फर्जी पट्टा, अवैध नामांतरण का भंडाफोड़; कोर्ट के फैसले के बाद FIR के आदेश

जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल ने बताया कि शिकायत मिली थी कि सरकारी जमीन को खोदकर निजी लोगों द्वारा बेचा जा रहा है और उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। जांच में सामने आया कि यह जमीन वर्ष 1954 में नगर पालिका परिषद सम्भल को केवल प्रबंधन के लिए दी गई थी।

Jun 28, 2026 - 20:31
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Sambhal : 101 करोड़ की सरकारी जमीन पर 59 साल का खेल खत्म! 38 बीघा पर कब्जा, फर्जी पट्टा, अवैध नामांतरण का भंडाफोड़; कोर्ट के फैसले के बाद FIR के आदेश
Sambhal : 101 करोड़ की सरकारी जमीन पर 59 साल का खेल खत्म! 38 बीघा पर कब्जा, फर्जी पट्टा, अवैध नामांतरण का भंडाफोड़; कोर्ट के फैसले के बाद FIR के आदेश

Report : उवैस दानिश, सम्भल

1954 में नगर पालिका को मिली जमीन, 1967 में हुआ कथित फर्जी पट्टा, 1991 से 2026 तक चली कानूनी लड़ाई; डीएम अंकित खंडेलवाल की कार्रवाई से राज्य सरकार के नाम हुई जमीन, कई अधिकारियों और लाभार्थियों पर गिरेगी गाज।

सम्भल-मुरादाबाद हाईवे किनारे स्थित करीब 38 बीघा सरकारी जमीन, जिसकी मौजूदा बाजार कीमत ₹101 करोड़ से अधिक आंकी गई है, उस पर दशकों से चले आ रहे कब्जे और कथित फर्जीवाड़े का आखिरकार पर्दाफाश हो गया। उप संचालक चकबंदी न्यायालय के आदेश के बाद विवादित भूमि से निजी खातेदारों के नाम हटाकर फिर से राज्य सरकार/ग्राम सभा (नवीन परती) के नाम दर्ज कर दिए गए हैं।

जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल ने बताया कि शिकायत मिली थी कि सरकारी जमीन को खोदकर निजी लोगों द्वारा बेचा जा रहा है और उसका व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। जांच में सामने आया कि यह जमीन वर्ष 1954 में नगर पालिका परिषद सम्भल को केवल प्रबंधन के लिए दी गई थी, लेकिन 1967 में तत्कालीन नगर पालिका स्तर से कथित रूप से अवैध पट्टा कर कुछ लोगों को आवंटित कर दिया गया। जबकि नगर पालिका को ऐसी जमीन का पट्टा देने का कोई अधिकार ही नहीं था। डीएम के अनुसार, 1991 में अपर तहसीलदार ने सैदुल्ला को अवैध कब्जेदार मानते हुए बेदखली के आदेश दिए। 1992 में अपर जिलाधिकारी ने भी उस आदेश को बरकरार रखा और जमीन को सरकारी माना।

इसके बाद चकबंदी न्यायालय में मामला पहुंचा। 2005 में चकबंदी अधिकारी ने जमीन को ग्राम सभा की भूमि माना, एसओसी ने भी अपील खारिज कर सरकारी जमीन माना, लेकिन 2008 में तत्कालीन डीडीसी प्रेम सिंह खड़क ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर और गलत तथ्यों के आधार पर इसे निजी खातेदारों के नाम दर्ज करने का आदेश दे दिया। नगर पालिका ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 2013 में तत्कालीन अधिशासी अधिकारी राजकुमार गुप्ता ने अदालत में यह कहते हुए पैरवी से हाथ खींच लिया कि नगर पालिका इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। हाल ही में पूरे प्रकरण की 1954 से अब तक की जांच कराई गई।

इसके बाद जिला प्रशासन ने डीडीसी न्यायालय में पुनर्स्थापना (रिस्टोरेशन) प्रार्थना पत्र दाखिल कराया और लगातार सुनवाई कराई। न्यायालय ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 15 फरवरी 2008 का आदेश निरस्त कर दिया और विवादित भूमि को पुनः सरकारी भूमि घोषित करते हुए राज्य सरकार/ग्राम सभा के नाम दर्ज करने का आदेश दिया। सुनवाई के दौरान सहदुल रहमान के उत्तराधिकारी शाकिर, रिजवाना सिद्दीकी, मोहम्मद तौफीक अली, आजम खान, मोहम्मद कासिम, मोहम्मद मुजाहिद, अमीर चंद्र सुधाकर और फुरकान सहित अन्य पक्षकारों ने अपना पक्ष रखा, लेकिन न्यायालय ने उनकी निगरानियां खारिज कर दीं।

डीएम अंकित खंडेलवाल ने बताया कि अब तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता, उस समय नक्शा तैयार करने वाले नगर पालिका कर्मियों, 2008 के तत्कालीन डीडीसी प्रेम सिंह खड़क, कथित पट्टेदारों, बैनामा कराने वालों तथा पूरे फर्जीवाड़े में शामिल सभी लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। विभागीय अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी शुरू की जा रही है। करीब 59 वर्षों तक चले इस बहुचर्चित भूमि विवाद में आया यह फैसला सम्भल के सबसे बड़े सरकारी जमीन घोटालों में से एक माना जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जा करने वालों और फर्जी दस्तावेजों के जरिए नाम दर्ज कराने वालों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

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