Sambhal : 35 फीट से 10 फीट तक सिमटे ताजिये: महंगाई और गाइडलाइन के बीच कारीगरों की मेहनत, 2027 पर भी दिखी सियासत
धार्मिक नगर नेजा कमेटी के अध्यक्ष शाहिद मसूदी ने कहा कि ताजिया निर्माण और जुलूस पूरी तरह प्रशासन एवं शासन के निर्देशों के अनुरूप किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले 35 से 40 फीट तक के ताजिये बनते थे, लेकिन अब निर्धारित सीमा के भीतर ही ताजिये तैयार किए जा रहे हैं।
सम्भल में मुहर्रम की तैयारियां तेज हो गई हैं और ताजिया कारीगर दिन-रात मेहनत कर आकर्षक ताजियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। ताजिया कारीगर मौहम्मद आसिफ का परिवार पिछले 50 वर्षों से इस पारंपरिक कला से जुड़े हैं।
उनका कहना है कि उन्होंने यह हुनर अपने बाप-दादा से सीखा है और इस वर्ष करीब 30 ताजिये तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी मांग बिजनौर, बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद और अमरोहा समेत कई जिलों से आ रही है।
आसिफ बताते हैं कि एक ताजिया तैयार करने में लगभग आठ दिन का समय लगता है। बांस, पेपर, पन्नी और अन्य सजावटी सामग्री से तैयार होने वाले ताजियों का काम मीठी ईद के बाद ही शुरू कर दिया जाता है। हालांकि इस बार महंगाई ने कारीगरों की कमर तोड़ दी है।
उनका दावा है कि कच्चे माल की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं, जिससे लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। कारीगरों के अनुसार पहले 35 से 40 फीट ऊंचे ताजिये बनाए जाते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं।
शासन और प्रशासन की गाइडलाइन के चलते ताजियों की ऊंचाई काफी कम हो गई है और अब अधिकतर 7 से 10 फीट के ताजिये ही तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही बड़े ताजियों की संख्या भी पहले के मुकाबले काफी घट गई है।
वहीं धार्मिक नगर नेजा कमेटी के अध्यक्ष शाहिद मसूदी ने कहा कि ताजिया निर्माण और जुलूस पूरी तरह प्रशासन एवं शासन के निर्देशों के अनुरूप किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले 35 से 40 फीट तक के ताजिये बनते थे, लेकिन अब निर्धारित सीमा के भीतर ही ताजिये तैयार किए जा रहे हैं।
उन्होंने लोगों से कानून हाथ में न लेने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की। शाहिद मसूदी ने बातचीत के दौरान 2027 के विधानसभा चुनाव का भी जिक्र किया और कहा कि आने वाले समय में हालात बदल सकते हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इमाम हुसैन की शहादत की याद में बनने वाले ताजिये और मुहर्रम की परंपरा कभी खत्म नहीं होगी, क्योंकि यह पूरी दुनिया में मनाया जाने वाला आस्था का पर्व है।
ताजिया कारीगरों का कहना है कि उनकी कारीगरी और बारीक काम की वजह से लोग उनके ताजियों को पसंद करते हैं।
मुहर्रम का पैगाम बताते हुए मोहम्मद आसिफ ने कहा कि यह त्याग, सत्य और इंसाफ के लिए डटे रहने की सीख देता है, जिसे इमाम हुसैन की शहादत ने अमर बना दिया।
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