'थलापति' की 'विजय' का राजतिलक: तमिलनाडु में विजय की आंधी, टीवीके बनी सबसे बड़ी शक्ति।
तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में 4 मई 2026 की तारीख एक युगांतरकारी बदलाव के रूप में दर्ज हो गई है। दक्षिण भारतीय
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तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में 4 मई 2026 की तारीख एक युगांतरकारी बदलाव के रूप में दर्ज हो गई है। दक्षिण भारतीय सिनेमा के दिग्गज सुपरस्टार थलापति विजय की नवनिर्मित पार्टी 'तमिलगा वेट्री कझगम' (TVK) ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में वह करिश्मा कर दिखाया है, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों ने नहीं की थी। चुनाव आयोग द्वारा घोषित परिणामों के अनुसार, टीवीके ने राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में 108 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव प्राप्त किया है। यह जीत केवल सीटों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तमिलनाडु की उस पारंपरिक राजनीति के अंत की शुरुआत है जो दशकों से डीएमके और एआईएडीएमके के इर्द-गिर्द घूमती रही है। विजय की इस प्रचंड लहर ने सत्ताधारी दल के किलों को ढहाते हुए उन्हें मुख्यमंत्री पद का सबसे मजबूत दावेदार बना दिया है। इस चुनाव के सबसे चौंकाने वाले नतीजे चेन्नई और उत्तरी तमिलनाडु से सामने आए हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से डीएमके का अभेद्य किला माना जाता था। खुद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को अपनी पारंपरिक सीट कोलाथुर से टीवीके उम्मीदवार के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा है, जो राज्य की राजनीति में आए बड़े बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक है। दूसरी ओर, थलापति विजय ने अपनी दोनों सीटों पेराम्बूर और तिरुचिरापल्ली ईस्ट से रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की है। मतदाताओं ने विजय की 'साफ-सुथरी राजनीति' और 'युवा विजन' पर भरोसा जताते हुए उन्हें 35 प्रतिशत से अधिक का वोट शेयर दिया है। यह प्रदर्शन एमजीआर और जयललिता जैसे दिग्गजों की याद दिलाता है, जिन्होंने सिनेमा के पर्दे से निकलकर राजनीति के फलक पर अपनी अमिट छाप छोड़ी थी।
टीवीके की इस सफलता का मुख्य श्रेय विजय द्वारा जमीन पर किए गए माइक्रो-मैनेजमेंट और उनके द्वारा चुने गए उम्मीदवारों को दिया जा रहा है। विजय ने अपनी पार्टी में युवाओं, महिलाओं और सामान्य पृष्ठभूमि के लोगों को प्राथमिकता दी। विरूगमबक्कम सीट से विजय के ड्राइवर के बेटे आर. सबरिनाथन की 27,000 से अधिक मतों से जीत यह दर्शाती है कि जनता ने वंशवाद की राजनीति के खिलाफ एक नए विकल्प को स्वीकार किया है। चुनाव प्रचार के दौरान विजय ने भ्रष्टाचार, नशाखोरी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों को उठाकर राज्य के मध्यम वर्ग और युवा वोट बैंक को अपने पक्ष में लामबंद कर लिया। उनकी सभाओं में उमड़ी लाखों की भीड़ अब वोटों में तब्दील हो चुकी है, जिसने उन्हें तमिलनाडु की सत्ता की चाबी सौंप दी है। भले ही टीवीके बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से 10 सीटें दूर रह गई है, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते राज्यपाल द्वारा उन्हें सरकार बनाने का पहला न्यौता मिलना लगभग तय है। कांग्रेस और अन्य छोटे दलों ने पहले ही विजय के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करने के संकेत दे दिए हैं। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार द्वारा दी गई बधाई इस ओर इशारा करती है कि पर्दे के पीछे गठबंधन की बातचीत शुरू हो चुकी है और तमिलनाडु जल्द ही एक नए और युवा मुख्यमंत्री का स्वागत करने वाला है।
विपक्ष के लिए ये नतीजे किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। डीएमके, जो 2021 में 133 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत में थी, वह अब 60 सीटों के आसपास सिमट गई है। भ्रष्टाचार के आरोप और सत्ता विरोधी लहर ने स्टालिन सरकार की नींव हिला दी। वहीं एआईएडीएमके का प्रदर्शन भी काफी निराशाजनक रहा और वह तीसरे स्थान पर खिसक गई है। भाजपा, जो तमिलनाडु में अपना पैर जमाने की पुरजोर कोशिश कर रही थी, वह भी टीवीके की आंधी में केवल एक सीट पर सिमट कर रह गई। इन परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तमिलनाडु की जनता अब राष्ट्रीय दलों या पुराने द्रविड़ समीकरणों के बजाय एक ऐसे क्षेत्रीय नेतृत्व की ओर देख रही है जो उनकी संस्कृति और पहचान को आधुनिक विजन के साथ आगे ले जा सके। विजय के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं ने पूरे दक्षिण भारत की राजनीति में एक नया उत्साह भर दिया है। उनके समर्थकों ने राज्य भर में जश्न मनाना शुरू कर दिया है और इसे 'मक्कल इयक्कम' (जन आंदोलन) की जीत बताया जा रहा है। विजय की पार्टी ने अपने घोषणापत्र में 'धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय' और 'पारदर्शी शासन' का जो वादा किया था, उसे पूरा करना अब उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी। एक अभिनेता के रूप में करोड़ों दिलों पर राज करने वाले विजय के लिए यह एक नई और कठिन पारी है, जहाँ उन्हें पर्दे की स्क्रिप्ट के बजाय प्रशासनिक जटिलताओं और जनता की उम्मीदों के बीच संतुलन बनाना होगा। हालांकि, उनके अब तक के राजनीतिक संयम ने यह साबित किया है कि वे लंबी रेस के खिलाड़ी हैं।
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