महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की महिला कल्याण योजनाओं पर मंडराए संकट के बादल, पात्रता और पारदर्शिता को लेकर दोनों राज्यों में घमासान।
भारत के दो प्रमुख और राजनैतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्यों, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण
- बंगाल की 'लक्ष्मी भंडार योजना' में भी अपात्र लोगों ने सेंधमारी कर उठाया वित्तीय लाभ, दोनों प्रदेशों में शुरू हुई कड़े भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया
भारत के दो प्रमुख और राजनैतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्यों, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए चलाई जा रही महत्वाकांक्षी कल्याणकारी योजनाएं इन दिनों गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय जांच के दायरे में आ गई हैं। दोनों ही राज्यों की सरकारों द्वारा महिलाओं को सीधे तौर पर मासिक नकद सहायता प्रदान करने वाली इन प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) योजनाओं में पात्रता के मानदंडों और पारदर्शिता को लेकर बड़े विवाद खड़े हो गए हैं। दोनों प्रदेशों में बड़े पैमाने पर अपात्र और फर्जी लाभार्थियों द्वारा इन योजनाओं का अनुचित लाभ उठाने की शिकायतें मिलने के बाद वित्तीय अनुशासन को बनाए रखने के लिए अब व्यापक स्तर पर जांच और छंटनी का दौर शुरू किया गया है, जिसने राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया है।
इस बड़े प्रशासनिक घटनाक्रम में पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र से एक बेहद चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है, जिसने पूरी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में हलचल तेज कर दी है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुरू की गई 'मुख्यमंत्री माझी लाड़की बहिन योजना' के तहत किए गए एक विस्तृत आंतरिक ऑडिट और तकनीकी डेटा मिलान के बाद 80 लाख से अधिक आवेदकों के नाम लाभार्थी सूची से पूरी तरह से हटा दिए गए हैं। महिला और बाल विकास विभाग द्वारा की गई इस कड़ाई का मुख्य कारण आवेदनों में पाई गई गंभीर विसंगतियां थीं, जिसमें एक ही बैंक खाते का कई अलग-अलग नामों के साथ लिंक होना, गलत आय प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना और टैक्स भरने वाले परिवारों की महिलाओं द्वारा भी इस सहायता राशि के लिए आवेदन करना शामिल था।
इस योजना के तहत सरकार द्वारा पात्र महिलाओं को प्रत्येक महीने 1500 रुपये की वित्तीय सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है, जिसके कारण राज्य भर से करोड़ों महिलाओं ने इसके लिए पंजीकरण कराया था। प्रारंभिक उत्साह के बाद जब वित्त विभाग ने बजट पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ की समीक्षा की, तो केंद्रीयकृत डेटाबेस प्रणाली के माध्यम से सभी आवेदनों की गहन स्क्रूटनी करने का निर्णय लिया गया। इस डिजिटल जांच के दौरान यह पाया गया कि लाखों आवेदनों में आधार विवरण और बैंक खातों की जानकारी मेल नहीं खा रही थी, वहीं कई मामलों में तो पुरुषों के नाम पर भी फर्जी तरीके से इस महिला-केंद्रित योजना का लाभ लेने का प्रयास किया जा रहा था, जिसे समय रहते रोक दिया गया।
जांच का दायरा: दोनों ही राज्यों के प्रशासनिक विंग ने इस वित्तीय हेरफेर को रोकने के लिए ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर विशेष टीमों का गठन किया है। ये टीमें अब संदेहास्पद पाए गए सभी खातों का मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कर रही हैं, और दोषी पाए जाने वाले बिचौलियों तथा फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले कंप्यूटर केंद्रों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने की तैयारी की जा रही है।
महाराष्ट्र के इस बड़े संकट के समानांतर, पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में भी महिलाओं के लिए चलाई जा रही अत्यंत लोकप्रिय 'लक्ष्मी भंडार योजना' को लेकर भी इसी तरह की गंभीर प्रशासनिक खामियां और अनियमितताएं सामने आई हैं। बंगाल सरकार की इस फ्लैगशिप योजना के तहत सामान्य श्रेणी की महिलाओं को 1000 रुपये और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को 1200 रुपये प्रति माह की दर से आर्थिक सहायता दी जाती है। हाल ही में जिलाधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सचिवालय को यह जानकारी मिली कि हजारों ऐसी महिलाएं भी इस योजना का निरंतर लाभ उठा रही हैं जो इसके तय पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करती हैं या जिनके परिवारों में पहले से ही सरकारी नौकरी मौजूद है।
इस योजना में हुई सेंधमारी के पीछे मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर फॉर्म जमा करने और उनके ऑनलाइन डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में बरती गई ढिलाई को जिम्मेदार माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल के कई जिलों से ऐसी रिपोर्टें प्राप्त हुई हैं जहां एक ही परिवार की कई महिलाओं ने अलग-अलग पहचान पत्रों का उपयोग कर इस योजना के तहत कई बार लाभ प्राप्त किया, जिससे वास्तविक रूप से जरूरतमंद और गरीब महिलाएं इस कल्याणकारी लाभ से पूरी तरह से वंचित रह गईं। इस विसंगति के सामने आने के बाद अब राज्य के वित्त और समाज कल्याण विभाग ने सभी मौजूदा लाभार्थियों के बैंक खातों को दोबारा से सत्यापित करने और अपात्र लोगों को सूची से बाहर करने की एक बड़ी मुहिम को हरी झंडी दे दी है।
कल्याणकारी योजनाओं में इस तरह की बड़ी गड़बड़ियों के सामने आने के बाद दोनों ही राज्यों में राजनैतिक मोर्चे पर भी तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है, क्योंकि ये दोनों ही योजनाएं सरकारों के लिए चुनाव जिताने वाले सबसे बड़े केंद्रीय स्तंभ के रूप में जानी जाती रही हैं। जहां विपक्षी दलों ने इस भारी प्रशासनिक लापरवाही को सरकारी खजाने की खुली लूट और चुनावी लाभ के लिए जनता के पैसे का दुरुपयोग करार दिया है, वहीं सत्ताधारी दलों का तर्क है कि इतनी बड़ी आबादी वाले राज्यों में तकनीकी त्रुटियों के कारण कुछ विसंगतियां होना स्वाभाविक है और सरकार पूरी ईमानदारी के साथ इन कमियों को सुधारने के काम में जुटी हुई है ताकि केवल वास्तविक लाभार्थियों को ही हक मिल सके।
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