विशेष लेख : गांवों और किसानों की 'आत्मनिर्भरता' ही होगी भारत के 'नवसृजन' की नींव 

आखिर समस्या कहां है? खेती को क्यों अंधी बेरोजगारी मान लिया गया है, क्या इसमें बदलाव के प्रयास मिथ्या साबित हो रहे हैं?

Oct 10, 2024 - 22:48
Oct 11, 2024 - 10:43
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विशेष लेख : गांवों और किसानों की 'आत्मनिर्भरता' ही होगी भारत के 'नवसृजन' की नींव 

लेखक परिचय

अरविन्द सुथार पमाना वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, मोटीवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक, तालाबों व पारम्परिक जल स्रोतों के संरक्षक हैं। कृषि सेवा पुरस्कार-2019 एवं ग्लॉबल अचीवर्स अवॉर्ड-2019 पर्यावरण सेवा पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। 

आज के समय में खेती व किसान का आर्थिक विश्लेषण किया जाए तो यह पाएंगे कि आजीविका के लिए निश्चित रूप से खेती सबसे अच्छा कार्य नहीं रह गया है। इस वजह से बहुत सारे किसान ऐसे हैं जो खेती छोड़ देना चाहते हैं।

आखिर समस्या कहां है? खेती को क्यों अंधी बेरोजगारी मान लिया गया है, क्या इसमें बदलाव के प्रयास मिथ्या साबित हो रहे हैं? कृषि के कई सारे सेक्टर हैं, क्या हर सेक्टर पर मार झेलनी पड़ती है? यह मान लिया कि "खेती एक क्रिकेट का मैदान है।" जहां कौनसी गेंद पर कब खेल बदल जाए कुछ कह नहीं सकते। फिर भी किसान की आय बढाने का देशव्यापी आह्वान होने के बावजूद भी किसान का रूतबा फिका सा क्यों है? 

उत्पादक से उपभोक्ता का अधिक फासला, फसल मूल्य, उत्पादन लागत, प्राकृतिक आपदा, जोतों का आकार आदि कृषि की मुख्य समस्याएं हैं। आजकल किसान इतने महंगे बीजों, उर्वरकों और अन्य आदानों  की खरीद से लागत बढाने की ओर बढ रहा है। जैविक आदानों के नाम पर बाजार में होड़ है। हर कोई किसान की तलाश में है। उच्च गुणवत्तायुक्त बीज सही दामों में किसान को उपलब्ध हो पाना एक बड़ी चुनौती रहती है। जैविक या प्राकृतिक खेती की अपेक्षा ये रासायनिक खेती किसान का खर्चा बढ़ाने के साथ मिट्टी की उर्वरक क्षमता, पर्यावरण, विलुप्त होती प्रजाति , किसान व उपभोक्ता के स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत घातक सिद्ध होते हैं। इन सब के लिए किसानों की बाजार पर निर्भरता खेती की लागत को बहुत ज्यादा बढ़ा रही है। देश के लगभग 86.4% किसान परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। इससे भी प्रति एकड़ खेती की लागत बढ़ जाती है। मौसम की मार से किसान को बहुत भारी नुकसान होता है। किसान का खेत क्रिकेट के मैदान की की होती है, कब, कौनसी गेंद पर खेल बदल जाए कुछ कह नहीं सकते। बेमौसमी बारिश, ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा, चक्रवात, टिड्डी आक्रमण आदि ऐसी कई प्राकृतिक आपदाएं हैं जिससे किसान दब जाता है। किसान को फसल मूल्य के रूप में अपनी वास्तविक लागत का आधा या चौथाई भी वसूल नहीं हो पाता है।

लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि उपभोक्ता को फसल उत्पाद सस्ते में मिल जाते हैं। असल में किसान के खेत से लेकर उपभोक्ता तक आने तक की प्रक्रिया में फसल उत्पाद कई बिचौलियों और व्यापारियों के हाथो में से होकर आती है। किसी फसल उत्पाद के लिए उपभोक्ता जो मूल्य देता है, उसका बहुत ही कम हिस्सा किसान को मिल पाता है। बाजार मूल्य का कभी कभी तो 20 से 30% तक का हिस्सा ही किसान तक पहुंचता है। यह स्थिति सर्वविदित है कि अधिकांश किसान अभी भी झोलाछाप व्यापारियों पर निर्भर है। देखा जाए तो देश में कुछ किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ ले पाते और बाकी किसान बिना किसी न्यूनतम समर्थन मूल्य के ही फसल उत्पाद बेचते हैं।

किसान की आत्मनिर्भरता ही देश के नवसृजन की नींव होगी, किसान की आमदनी दुगुनी से भी अधिक होगी और कृषि के लिए युवाओं की होड़ लगेगी, आइए हम ऐसे ही कुछ प्रयोसों पर विचार करते हैं- 

  •  बाजारोन्मुखी कृषि और युवाओं का रूझान

बदलते परिवेश में किसान की अवधारणाओं को बदलना होगा। किसान की हमेशा से धारणा रही है कि वह केवल उत्पादक है। अन्न उपजाना उसका कार्य है, व्यापार विपणन तो व्यापारियों व पूंजीपतियों का काम है। किसान की आत्मनिर्भरता की अवधारणा निश्चित ही ग्रामीण भारत को प्रोत्साहन देगी।

  • डेयरी में आत्मनिर्भरता 

गांवों में डेयरी विकास की संभावनाएं प्रबल है। यदि हर 5-7 गांवों के समूह में एक डेयरी उत्पाद प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना हो। अभी वर्तमान में गांवों को केवल दूध संकलन का जरिया माना जा रहा है। गांवों से दूध संकलित करके नजदीकी बाजारों में पहुंचा दिया जाता है। परिवहन में समय लग जाने से दूध की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसके लिए गांवों में ही दूध की प्रोसेसिंग की यूनिट्स लगवाकर कृषकों को इसका अधिक लाभ दिया जा सकता है। डेयरी प्रोसेसिंग से दूध के पाउच पैकिंग, छाछ, दही पैकिंग, मिठाई, पनीर या घी बनाना व पैकिंग करने संबंधित कार्य छोटे स्तर पर शुरू हो सकते हैं व नजदीकी बाजारों में आउटलेट बनाकर बेच सकते हैं। बशर्ते ये सभी कार्य दूध के प्रोक्यॉरमेन्ट से लेकर मार्केटिंग तक ग्रामीण किसान के द्वारा ही किए जाएं, इनकी सांस्कृतिक कार्यकुशलता बहुत फायदेमंद रहेगी। 

  • प्रोसेसिंग और कृषि उद्यमिता 

फलों की प्रोसेसिंग, जैम,  जेली, अचार, मुरब्बा और अन्य सभी उत्पाद जो फलों द्वारा तैयार होते हैं। फूलों की खेती जिन गांवों में होती है। वहां पर इत्र व प्राकृतिक रंग व गुलाल बनाने का कार्य हो सकता है। ग्रामीण महिलाएं नियमित क्रम में निर्धारित समय के अनुसार इस प्रकार के प्रोसेसिंग प्लांट में सेवाएं दे सकती हैं। जिससे ग्रामीण रोजगार का स्थाई ढांचा तैयार कर सकते हैं। गांवों में पशुआहार निर्माण की छोटी छोटी इकाइयां शुरू की जा सकती हैं। इसके लिए युवाओं को मौका दिया जाए। देश का अधिकांश हिस्सा ग्रामीण भारत के रूप में जाना जाता है।

गांवों में बायोगैस प्लांट, गोबर से लकड़ी व गत्ते बनाना, कंपोस्ट निर्माण व अन्य जैविक कीटनाशकों का निर्माण भी करवाया जा सकता है। प्रत्येक जिले के जिला उद्योग केन्द्र व कृषि एवं उद्यान विभाग और कृषि विज्ञान केंद्रों के सांझा प्रयासों की आवश्यकता होगी। सबसे पहला कार्य तो महिलाओं व युवाओं को प्रशिक्षण देने का होगा। जैविक खेती जिन गांवों में होती है, उन किसानों को फसल विविधीकरण पर कार्य करवाया जाए, जैविक दूध, जैविक शहद से लेकर फल फूल व खाद्यान्न तक के पूरे उत्पादन को खेत पर ही उपभोक्ता योग्य बनाया जाए। कृषि को व्यावसायिक रूप देकर भी गांवों में कृषिगत रोजगार बढा सकते हैं। जिसमें मधुमक्खी पालन, रेशम कीटपालन, और पशुपालन, मछली पालन, मुर्गीपालन आदि को संरक्षित खेती के विषयों से जोड़ना होगा।   

  • जहां किसान वहीं बाजार 

एक ऐसा कौशल किसान को आजमाना है, जिससे किसान अपने कृषिगत उत्पादों को बेचने हेतु ऑनलाइन मार्केटिंग डायरेक्ट सेलिंग आदि कई प्रकार की लुभावनी व आकर्षक योजनाएं लेकर बाजार में उतरे। किसान स्वयं अपने खेत से उपजे गेहूँ से देशी आटा व सरसों से देशी सरसों तेल डायरेक्ट सेलिंग के माध्यम से बेच सकता है। किसान सब्सीडी, सरकारी सहयोग की लालचा किए बिना बाजार पर राज करना सिखे। किसानों की सेवाएं फैमिली फार्मर के तौर पर भी ली जा सकती हैं। 

  • कृषि पर्यटन, स्मार्ट खेती व मॉडल गांवों की परिकल्पना 

कृषि पर्यटन एक नवीन अवधारणा है। शहरों के लोग महिने में एक दो दिन नजदीकी गांवों में भ्रमण को जाना चाहते हैं। गांवों की गोबर मिट्टी की संस्कृति में रहकर खुले में निवास करना चाहते हैं। यही एक ऐसा मोड़ है जहां से ग्रामीण कृषि एवं पर्यावरण पर्यटन को बढावा मिल सकेगा। कृषि पर्यटन के लिए हर जिले के एक दो गांवों को चयनित करके विकसित किया जा सकता है। ग्रामीण किसानों की फसल बुवाई व उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग तक का हर एक पहलु कृषि पर्यटन का मजबूत स्तम्भ है।

खेती में दर्शनीयता का विकास करना होगा। इससे गांवों में रोजगार बढेगा व ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर हो सकेगा। गांवों को बाजार व एग्रो टूरिज्म के साथ साथ एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के रूप में भी विकसित करने होंगे। गांवों में हाट बाजारों व साप्ताहिक बिक्री मेलों का आयोजन व अच्छे प्रचार प्रसार से शहरों के लोगों को भी आकर्षित करना होगा। प्रायोगिक तौर पर कुछ मॉडल गांव विकसित किए जा सकते हैं। जहां जल संरक्षण के अच्छे तरीके देखने लायक हो, फार्मिंग सिस्टम, समन्वित कृषि प्रणाली, आधुनिक, स्मार्ट व संरक्षित खेती के स्थल मौजूद हो, उस गांव में उपजी हर उपज की प्रोसेसिंग उसी गांव में होती हो। वहां के किसान केवल गांव पर ही निर्भर हो, तो निश्चित ही ऐसे गांव एक नई अवधारणा एग्रो मार्केटिंग टूरिज्म के लिए पहचान बनाते हुए आत्मनिर्भर बन सकेंगे। जब तक किसान आत्मनिर्भर नहीं होगा, देश के आत्मनिर्भर बनने में समस्याएं आएगी। गांवों को कृषि रोजगार की दृष्टि से हाईटेक करना होगा। 

  •  कृषि विकास मंथन हेतु हर राज्य में बने कमिटी

कृषि विकास के लिए हर राज्य में स्पेशियल कमिटी गठित करनी होगी, जिसमें आइसीएआर, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, कृषि की उपशाखाओं के विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केन्द्रों, प्रगतिशील नवाचारी किसानों, कृषि के दायरे को स्पर्श करने वाले अन्य विभागों के विचारकों, देश के खोजी कृषि पत्रकारों, खासकर कृषि विपणन व कृषि अर्थव्यवस्था के जानकारों आदि को शामिल करके हर राज्य में कृषि विस्तार व विमर्श हेतु कमिटी गठित करके राज्यस्तरीय वितीय सहायता करके उन्हें कृषि मामलों में गांवों को विकसित करने, गांवों को उन्नत बाजार से जोड़ने, कृषि लागत एवं आमदनी के अनुपातों का सही विश्लेषण करने, आपदा प्रतिरोधी गतिविधियों का प्रसार करने के लिए कार्ययोजना बनाने के लिए प्रयास करने चाहिए। 

  •  कृषि बाजार की गतिविधियों पर क्षेत्रीय अनुसंधान

कार्यरत क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्रों को विकसित करना होगा, उन्हें ग्रामीण व कृषि विकास पर कार्य करने के नए लक्ष्य देने होंगे। तथा अनुसंधान लक्ष्यों को स्वैच्छिक रखना होगा। क्योंकि अनुसंधानकर्ता जिस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उस क्षेत्र को कैसे विकसित किया जाए, उस क्षेत्र में किस प्रकार का परिवर्तन आवश्यक है यह ग्राउण्ड लेवल पर तय करने की स्वैच्छिकता देनी होगी। खासकर किसान कौशल विकास और बाजारी कौशल का विकास हेतु गतिविधियों को सम्पन्न करने की सुविधाएं मुहैया करानी होगी।

जो किसान अच्छा कार्य कर रहे हैं उन्हें भी कुछ जिम्मेदारी दी जा सकती है। ताकि अन्य किसानों तक उनकी मानसिकता पहुंचे। कृषि में परिवर्तन शिक्षा के अलावा अनुभव से अधिक अच्छा हो सकता है। अत: किसानों को छोटे छोटे समूह बनाकर अनुभव विस्तार का मौका दिया जाना चाहिए। समन्वित कृषि प्रणाली को और मजबूत करना होगा, किसान के पास फसल उत्पादन के अलावा बहुत सारे सेक्टर हो, जैसे पशुपालन, फलोत्पादन, सब्जी उत्पादन, फसलोत्पादन आदि।

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