जलियांवाला बाग के अनदेखे घाव: पीड़ितों के परिवारों की जुबानी, 1919 के उस खूनी मंजर की दास्तां।
जब अमृतसर के जलियांवाला बाग में गोलियां गूंजीं, तो वह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि हजारों परिवारों के
- इतिहास के दबे हुए पन्ने: प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभव और उन मासूमों की कहानियां जिन्हें सरकारी आंकड़ों ने भुला दिया
- रक्त रंजित बैसाखी की अनसुनी विरासत: जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों के वंशजों का दर्द और ऐतिहासिक साक्ष्य
13 अप्रैल 1919 की शाम जब अमृतसर के जलियांवाला बाग में गोलियां गूंजीं, तो वह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि हजारों परिवारों के सपनों का अंत था। उस दिन बाग में मौजूद हर व्यक्ति की अपनी एक कहानी थी, जो समय की धूल में कहीं दब गई। ऐतिहासिक दस्तावेजों और जीवित बचे लोगों के संस्मरणों से पता चलता है कि वहां केवल राजनीतिक आंदोलनकारी ही नहीं, बल्कि बैसाखी के मेले में आए निर्दोष ग्रामीण, महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में मौजूद थे। उस दौर के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कैसे लोग अपनी जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन जनरल डायर के सैनिकों ने विशेष रूप से निकास द्वारों और उन दीवारों की ओर निशाना साधा जहाँ भीड़ सबसे अधिक थी।
शहीदों की अनसुनी कहानियों में एक प्रमुख नाम मदन मोहन का आता है, जो उस समय केवल 13 वर्ष के थे। उनके परिवार के पास मौजूद साक्ष्यों के अनुसार, वह अपने दोस्तों के साथ बैसाखी देखने निकले थे और फिर कभी वापस नहीं लौटे। उनके पिता ने कई दिनों तक लाशों के ढेर में अपने बेटे को तलाशा, लेकिन मासूम का शरीर गोलियों से इतना छलनी हो चुका था कि उसे पहचानना मुश्किल था। ऐसी ही एक कहानी रतन देवी की है, जिन्होंने पूरी रात बाग में अपने मृत पति के शव के पास बैठकर गुजारी। उस समय अमृतसर में कर्फ्यू लगा हुआ था और बाहर निकलने पर गोली मारने के आदेश थे। रतन देवी ने अपने अनुभवों में लिखा है कि कैसे उन्होंने लाठी लेकर रात भर कुत्तों और गिद्धों से अपने पति के शव की रक्षा की, जबकि चारों ओर से कराहने और पानी मांगने की आवाजें आ रही थीं।
उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज, विशेष रूप से 'हंटर कमीशन' की रिपोर्ट और कांग्रेस की अपनी जांच समिति की रिपोर्ट, उस क्रूरता का विस्तृत विवरण प्रदान करती हैं। दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि डायर ने बिना किसी चेतावनी के 1650 राउंड गोलियां चलवाई थीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब गोलियां खत्म होने वाली थीं, तभी फायरिंग रुकी। एक प्रत्यक्षदर्शी नानक सिंह, जो बाद में एक प्रसिद्ध लेखक बने, ने बताया कि कैसे वे लाशों के नीचे दबने के कारण बच गए थे। उनके अनुसार, बाग की वह संकरी गली मौत के जाल में बदल गई थी जहाँ से निकलना नामुमकिन था। लोगों ने जान बचाने के लिए जिस कुएं में छलांग लगाई, वह मिनटों में इंसानी शरीरों से भर गया था, जिसे आज 'शहीदी कुआं' कहा जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने प्रेस पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया था, ताकि यह खबर देश के बाकी हिस्सों तक न पहुँचे। हालांकि, उस समय के कुछ साहसी पत्रकारों और चश्मदीदों ने गुप्त रूप से चिट्ठियां और डायरियां लिखीं, जो आज राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित हैं। इन दस्तावेजों में दर्ज है कि कैसे घायलों को इलाज तक नहीं मिलने दिया गया और तड़पते हुए लोगों को प्यासा छोड़ दिया गया।
पीड़ितों के परिवारों की व्यथा केवल उस दिन तक सीमित नहीं रही, बल्कि दशकों तक उन्हें न्याय और पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। कई परिवार ऐसे थे जिनके घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य की उस दिन मृत्यु हो गई थी, जिससे वे दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। अमृतसर के पुराने मोहल्लों में रहने वाले कुछ बुजुर्ग आज भी अपने दादा-परदादाओं से सुनी उन बातों को याद करते हैं, जब घर के लोग शाम को वापस नहीं आए और पूरे शहर में सन्नाटा पसर गया था। इन परिवारों के लिए 'प्रेरणा स्थल' और नई गैलरी एक सांत्वना की तरह हैं, जहाँ उनके पूर्वजों के नाम और बलिदान को आधिकारिक रूप से दर्ज किया गया है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुभवों में एक और दर्दनाक पहलू यह था कि डायर के सैनिकों में भारतीय मूल के गोरखा और बलूच रेजिमेंट के जवान भी शामिल थे। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि कैसे उन जवानों के चेहरों पर भी झिझक थी, लेकिन कड़े सैन्य आदेशों के आगे वे मजबूर थे। कुछ चश्मदीदों ने बताया कि गलियों में भागते हुए लोगों को भी निशाना बनाया गया था। उस समय के अस्पताल रिकॉर्ड बताते हैं कि गोलियां पीठ पर अधिक लगी थीं, जो यह साबित करता है कि लोग भाग रहे थे न कि हमला कर रहे थे। इन प्रत्यक्ष अनुभवों ने बाद में उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के मन में प्रतिशोध की भावना को जन्म दिया, जिन्होंने इस अपमान का बदला लेने की कसम खाई थी।
इतिहासकारों ने हाल ही में कुछ ऐसे पत्रों को संकलित किया है जो उस समय के स्थानीय लोगों ने अपने रिश्तेदारों को लिखे थे। इन पत्रों में उस दहशत का वर्णन है जो कांड के बाद कई महीनों तक अमृतसर में बनी रही। मार्शल लॉ के दौरान लोगों को सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे जाते थे और उसी गली से पेट के बल रेंगकर गुजरने पर मजबूर किया जाता था जहाँ एक महिला मिशनरी पर हमला हुआ था। प्रत्यक्षदर्शियों ने इन अपमानजनक सजाओं का विवरण देते हुए बताया कि कैसे ब्रिटिश हुकूमत ने पूरे शहर को एक खुली जेल में तब्दील कर दिया था। ये अनसुनी कहानियां बताती हैं कि जलियांवाला बाग केवल एक दिन की घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय स्वाभिमान को कुचलने की एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत थी।
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