'फर्जी' वेब सीरीज से प्रेरित होकर बना जाली नोटों का सौदागर: 12वीं पास राजवर्धन ने मेरठ को बनाया अपना अड्डा।
उत्तर प्रदेश के रामपुर और आसपास के जिलों में जाली नोटों के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ होने के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी फिल्मी
- यूपी से दिल्ली तक फैला जाली नोटों का काला साम्राज्य: राजवर्धन गिरोह ने बाजार में खपाए करोड़ों के नकली नोट
- पैथोलॉजी लैब की आड़ में रची गई बड़ी साजिश: एटा के मास्टरमाइंड का संभल और मुरादाबाद कनेक्शन खंगाल रही पुलिस
उत्तर प्रदेश के रामपुर और आसपास के जिलों में जाली नोटों के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ होने के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं हैं। इस पूरे रैकेट का मुख्य चेहरा एटा का रहने वाला राजवर्धन है, जिसने महज 12वीं पास होने के बावजूद अपनी शातिर बुद्धि से सुरक्षा एजेंसियों को लंबे समय तक छकाए रखा। पुलिस जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि राजवर्धन का नेटवर्क केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश की राजधानी दिल्ली तक जुड़े हुए थे। पुलिस को यह प्रबल आशंका है कि मेरठ में गुप्त रूप से संचालित अपनी यूनिट के जरिए उसने अब तक एक करोड़ रुपये से अधिक के जाली नोट छापकर उत्तर प्रदेश और दिल्ली के विभिन्न बाजारों में सफलतापूर्वक खपा दिए हैं। इस गिरोह की सक्रियता ने आर्थिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था के समक्ष एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है।
राजवर्धन की पृष्ठभूमि और उसके अपराध की ओर झुकाव की कहानी काफी चौंकाने वाली है। एटा के कोतवाली द्वारिकापुरी, आगरा रोड का निवासी राजवर्धन इतना चतुर था कि वह स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर अवैध रूप से एक पैथोलॉजी लैब का संचालन कर रहा था। चिकित्सा क्षेत्र से कोई वास्तविक संबंध न होने के बावजूद उसने लैब को अपनी संदिग्ध गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित आवरण के रूप में इस्तेमाल किया। पुलिस पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि अपराध की इस दुनिया में आने की प्रेरणा उसे 'फर्जी' नामक एक प्रसिद्ध वेब सीरीज से मिली। शाहिद कपूर अभिनीत इस सीरीज में दिखाए गए जाली नोटों के निर्माण और वितरण के तरीकों से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने इसे कई बार देखा और अपराध के बारीक गुर सीखे।
दिल्ली के एक बड़े जाली नोट तस्कर से राजवर्धन की मुलाकात उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। शुरुआत में उसने दिल्ली स्थित इस मास्टरमाइंड से तैयार जाली नोट खरीदे और उन्हें स्थानीय बाजारों में छोटे-छोटे लेन-देन के जरिए खपाना शुरू किया। जब इसमें उसे भारी मुनाफा होने लगा और जोखिम कम लगा, तो उसका लालच बढ़ता गया। उसने केवल वितरक बने रहने के बजाय खुद निर्माता बनने का फैसला किया। इसके बाद दिल्ली का मास्टरमाइंड उसे ट्रेनिंग दिलाने के लिए अपने साथ ले गया, जहाँ राजवर्धन ने हाई-क्वालिटी जाली नोट तैयार करने की तकनीकी बारीकियां सीखीं। इस प्रशिक्षण के बाद उसने बहुत ही चालाकी से अपने गृह जनपद एटा को छोड़कर मेरठ को अपना विनिर्माण केंद्र चुना, ताकि वह स्थानीय पुलिस की रडार से बच सके। पुलिस को संदेह है कि राजवर्धन केवल एक प्यादा है और इसके पीछे दिल्ली में बैठा कोई बहुत बड़ा गिरोह काम कर रहा है। वर्तमान में पुलिस की टीमें राजवर्धन के गुरु और इस पूरे खेल के असली मास्टरमाइंड की तलाश में दिल्ली और एनसीआर के कई इलाकों में छापेमारी कर रही हैं। यह गिरोह खासकर उन क्षेत्रों को निशाना बनाता था जहाँ नकद लेनदेन अधिक होता है और लोग नोटों की बारीकी से जांच नहीं करते।
राजवर्धन का काम करने का तरीका भी काफी संगठित था। वह इन जाली नोटों को बाजार में उतारने के लिए सीधे तौर पर सामने नहीं आता था, बल्कि उसने बेरोजगार युवाओं और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की एक फौज तैयार कर रखी थी। वह इन लोगों को कम समय में मोटी कमाई और लग्जरी जीवन का लालच देकर अपने चंगुल में फंसाता था। मेरठ की यूनिट में छपने वाले इन नोटों को एजेंटों के माध्यम से संभल, मुरादाबाद, रामपुर और दिल्ली के भीड़भाड़ वाले बाजारों में पहुंचाया जाता था। हालांकि, गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में उसने केवल 25 लाख रुपये के नोट छापने की बात कबूल की है, लेकिन बरामद दस्तावेजों और उसके ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस का अनुमान है कि यह आंकड़ा एक करोड़ के पार है।
इस मामले के तार पूर्व में हुई अन्य गिरफ्तारियों से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। 10 अप्रैल को संभल के हयातनगर क्षेत्र से शराफत हुसैन की गिरफ्तारी हुई थी, जिससे 20 हजार के जाली नोट मिले थे। वहीं, 10 फरवरी को मुरादाबाद के मैनाठेर इलाके में पुलिस ने एक बड़े ऑपरेशन के दौरान 28 लाख 50 हजार रुपये के जाली नोटों के साथ 10 लोगों को पकड़ा था। इन दोनों घटनाओं में बरामद नोटों की छपाई और कागज की गुणवत्ता राजवर्धन द्वारा तैयार नोटों से मेल खाती है। पुलिस अब इन सभी कड़ियों को जोड़कर एक विस्तृत चार्ट तैयार कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस गिरोह ने अब तक कितनी मात्रा में जाली मुद्रा भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवाहित की है। मेरठ में जिस स्थान पर राजवर्धन ने अपनी प्रिंटिंग मशीनें लगा रखी थीं, वह एक बहुत ही घनी आबादी वाला क्षेत्र था, जहाँ किसी को शक न हो। वह अत्याधुनिक स्कैनर और प्रिंटर का उपयोग करता था ताकि नोटों की नकल असली के बिल्कुल करीब लगे। पुलिस राजवर्धन के उन साथियों की भी सरगर्मी से तलाश कर रही है जो लॉजिस्टिक और कच्चे माल जैसे विशेष कागज और स्याही की आपूर्ति में उसकी मदद करते थे। उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS) और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीमें अब इस सिंडिकेट के वित्तीय स्रोतों पर चोट करने की तैयारी में हैं। राजवर्धन की गिरफ्तारी को पुलिस एक बड़ी कामयाबी मान रही है, क्योंकि वह भविष्य में और भी बड़े पैमाने पर इस अवैध धंधे को फैलाने की योजना बना रहा था।
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