Agriculture News: महिलाओं के बिना ना खेती, ना बाड़ी।
पुरुष प्रधान इस देश में 60% से अधिक हिस्सा ग्रामीण भारत के रूप में जाना जाता है। ग्रामीण कृषि....
लेखक परिचय
अरविन्द सुथार पमाना♦वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक।
पुरुष प्रधान इस देश में 60% से अधिक हिस्सा ग्रामीण भारत के रूप में जाना जाता है। ग्रामीण कृषि विकास में महिला नीव की ईंट कहलाती है। महिलाओं की सहभागिता के बिना ग्रामीण विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बात हो कृषि विकास की तो महिला के योगदान के बिना खेती-किसानी की परिभाषा भी सुझाई नहीं जा सकती। भारतीय कृषि ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी देखा जाए तो वर्तमान समय में महिलाओं ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी पूरी भूमिका निभाई है। भारतीय हरित क्रांति के जनक डॉ स्वामीनाथन ने कहा कि विश्व में खेती का सूत्रपात और वैज्ञानिक विकास का प्रारंभ महिलाओं ने ही किया था। 60 के दशक में जब हरित क्रांति की शुरुआत हुई तब से महिलाओं की भूमिका सराहनीय रही है। श्वेत क्रांति में महिलाओं का योगदान प्रत्यक्ष रूप से रहा। आज भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म निर्भर है तो दुग्ध उत्पादन में विश्व में अग्रणी देश माना जाता है इन सब के पीछे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं का हाथ है।
हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। और कृषि में महिलाओं के योगदान को देखते हुए 15 अक्टूबर को देशभर के समस्त कृषि विश्वविद्यालयों, संस्थानों एवं कृषि विज्ञान केंद्रों में ‘राष्ट्रीय महिला किसान दिवस’ मनाया गया। इस दिवस का उद्देश्य कृषि में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ाना है। वर्ष 2016 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रतिवर्ष ‘15 अक्टूबर’ को इस दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था।
वर्तमान में ग्रामीण विकास में महिलाएं अपना सक्रिय योगदान देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। एशिया के अनेक देश जो विकास की ओर अग्रसर हैं उन देशों में कृषि कार्य में महिलाओं का अनुपात अधिक है। ग्रामीण व शहरी कोई भी क्षेत्र हो, महिलाएं आबादी का लगभग आधा अंश होती हैं। वे परिवार, समाज व समुदाय का एक बड़ा ही सार्थक अंग हैं। जो समाज के स्वरूप को सशक्त रूप से प्रभावित करती हैं। ग्रामीण महिलाएं गृह कार्य तथा बच्चों को संभालने के साथ-साथ खेती-किसानी को भी प्राथमिकता से समय देती हैं। महिलाओं के प्रत्यक्ष योगदान एवं सक्रिय भागीदारी के परिणामस्वरूप भारत अनेक प्रकार के फल, सब्जी और अनाज के मामले में महत्वपूर्ण उत्पादक के रूप में विश्व में अपना स्थान बनाए हुए हैं। मछलीपालन, पशुपालन, खाद्य परिरक्षण, हथकरघा और दस्तकारी जैसे कामों में ग्रामीण महिलाएं पीछे नहीं हैं। वह खेतों में कार्य करने के अलावा कृषि संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय भी लेती हैं। मुख्यतः फसलों के उत्पादन, प्रबंधन व पशुपालन कार्य में महिलाओं की सहभागिता आधे से अधिक है तथा इनकी विपणन प्रक्रिया में भी भूमिका पाई जाती है। अतः कृषि में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है। इसके अलावा कृषि संसाधनों के प्रबंधन व फार्म उत्पादों का विपणन इनके द्वारा ही सफलतापूर्वक हो रहा है।
महिलाओं की उपादेयता का मुख्य कारण यह भी रहा है कि कृषि भूमि पर उनका मालिकाना हक न के बराबर है। इसीलिए कृषि क्षेत्र में उनकी निर्णायक भूमिका कमतर है। कृषि भूमि पर मालिकाना हक महज एक प्रशासनिक हक नहीं है बल्कि इसका सामाजिक, आर्थिक प्रभाव भी है। इससे व्यक्ति की पहचान, निर्णय क्षमता और आत्मविश्वास जुड़ा हुआ है। कृषि जनगणना 2015 के अनुसार लगभग 86% महिला किसान इस संपत्ति से शायद इसलिए वंचित है क्योंकि हमारे समाज में पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्थापित है। विशेष रूप से भूमि पर स्वामित्व की कमी महिला किसानों को संस्थागत ऋण के लिए बैंकों से संपर्क करने की अनुमति नहीं देती क्योंकि बैंक आमतौर पर जमीन के आधार पर ही ऋण स्वीकृत करते हैं। इसके अलावा महिला किसान ना तो उत्पादन पर कोई दावा कर सकती है और ना ही कुछ मजदूरी दर की मांग। खेत पर काम करने के अलावा उसके पास घर और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी है। महिलाएं ऐसी अदृश्य श्रमिक हैं जिनके बिना कृषि अर्थव्यवस्था में वृद्धि की संकल्पना निरर्थक है। इतना होते हुए भी इस श्रमशील महिला शक्ति ने भारतीय कृषि को अथक प्रयासों से मजबूत किया है। भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान 32% से भी अधिक है। खाद्य उत्पादन के लिए 60 से 80% तथा डेयरी उत्पादन के लिए लगभग 90% महिलाएं जिम्मेदार हैं। राजस्थान में फसल उत्पादन, पशुपालन, संसाधनों का प्रबंधन, विपणन आदि कार्यों में महिलाओं का योगदान सराहनीय है।
कृषि के अंतर्गत फसल उत्पादन में एकमात्र कार्य जुताई को छोड़कर अन्य सभी कार्य जैसे झाड़ियों की सफाई, निराई-गुड़ाई, सिंचाई, फसल कटाई आदि में प्रत्यक्ष रूप से महिलाओं का योगदान रहा है। इनमें से फसल कटाई व निराई गुड़ाई में महिलाएं 70 से 80% जिम्मेदारी लिए हुए हैं। पशुपालन में महिलाओं की सहभागिता 60% से अधिक पाई जाती है। जिसमें पशुओं को चराना, देखभाल करना, दूध निकालना, दूध का विपणन करना, प्रजनन संबंधित कार्य शामिल है। इसके अलावा महिलाएं खेत में खाद डालने, खाद एकत्रीकरण, हरे चारे की कटाई व एकत्रीकरण आदि कई कार्यो को बखूबी से पूरा कर रही है।
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बागवानी में अधिकांश कार्य महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। फल सब्जियों की तुड़ाई, उनका श्रेणीकरण, पैकिंग और विपणन महिलाएं ही कर रही है। खाद्य परिरक्षण के अधिकांश कार्य महिलाओं की सहभागिता के बिना संभव ही नहीं हैं। फसल उत्पादन व उनका चयन, विपणन आदि में महिलाएं सार्थक निर्णय लेकर परिवार को मुखिया के रूप में चला रही हैं। इतना ही नहीं कृषि क्षेत्र में कुछ ऐसी महिलाएं भी है जो अपनी खेती-किसानी व कृषि से जुड़े व्यवसायों में नाम कमा रही हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने कृषि अर्थव्यवस्था को रीढ़ की हड्डी बन कर मजबूत किया है।
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