Rajasthan cultural: धोतिया, पोतिया वाले राजस्थान की हर परम्परा में मौजूद है राजस्थान सांस्कृतिक खुश्बू।
राजस्थान को एक पारम्परिक राज्य कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजस्थान का हर नागरिक अपने
लेखक परिचय
अरविन्द सुथार पमाना♦वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक
"पश्चिमी भारत में राजस्थान जो लू, गर्मी और रेतीले धोरों के लिए जाना जाता है लेकिन यहां की परम्पराएं में सांस्कृतिक खुशबू मौजूद है। यहां की जनभावनाएं और कण कण का ऐतिहासिक सौन्दर्य पधारो म्हारे देश का आह्वान कर रहा है।"
राजस्थान जहां की हर परंपरा निराली है। राजस्थान को एक पारम्परिक राज्य कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। राजस्थान का हर नागरिक अपने पारम्परिक कौशल से भरपूर है, ऐसा कौशल जिसका आधुनिक वैज्ञानिक युग में बड़ा ही महत्व है। राजस्थान का खान पान, वेशभूषा, रिति रिवाजों में सांस्कृतिक खुश्बू का अहसास किया जा सकता है। यहां की संस्कृति ने विदेशियों को काफी आकर्षित किया है। राजस्थान की संस्कृति अपने आप में पर्यटन का एक मजबूत हिस्सा है़। यहां के पुरातात्विक व ऐतिहासिक स्थान नई पीढ़ी के लिए विरासत हैं। विश्व स्तर पर इन्हीं ऐतिहासिक केन्द्रों ने स्वयं को धरोहर के रूप में साबित किया है। राजस्थान के पारम्परिक जल स्रोत जैसे कुएं, तालाब, बावड़ियां आज के युग में दर्शनीय स्थल हैं। पारम्परिक सिंचाई के साधन जैसे चरस, ढेंकुली आदि तो आज के युग में अध्ययन और अनुसंधान के लिए काम में लिए जाते हैं। राजस्थान के खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण के पारम्परिक तरीके तो देश भर के कई कृषि विश्वविद्यालयों में शिक्षा का हिस्सा बन चुके हैं। यहां का पारम्परिक तरीका सुखाना आज अन्य प्रसंस्करण विधियों से सस्ता व सटीक है।
रहने के लिए घास फूस से बनाए जाने वाले छपरे आज के समय के वातानुकूलित भवनों से बेहतर माने जाते हैं। ये छपरे घास फूस व लकड़ियों के अलावा खींप नामक रेगिस्तानी वनस्पति से बनाए जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान के लोग गर्मियों से अपनी सुरक्षा के लिए इस तरह का छपरा या झौंपा हर साल बनाते हैं। खींप से अच्छी किस्म के झाड़ू भी बनते हैं। पहनावे में यहां का धोतिया, पोतिया, घाघरा, चुनड़ी देशी ठाठ की व्याख्या करते हैं। राजस्थान की परम्पराओं का इतनी सख्ती से पालन होता है कि गांव में कितने ही कॉरपोरेट घराने के पैसों वाले लोग हो, जब वो शादि करते हैं तो पुरूष धोतिया पोतिया व महिलाएं घाघरा चुनड़ी पहनती हैं।
राजस्थान में आज भी खेती में पारंपरिक तरीकों का महत्व है। राजस्थान में बैल आधारित व देशी हल आधारित परम्परागत खेती को देखा जाता है। खेती में गोबर और गोमूत्र का प्रयोग आदि काल से किया जाता रहा है। राजस्थान में अनाज भण्डारण के अपने पारम्परिक तरीके हैं। अनाज भण्डारण के लिए विशेष प्रकार के भण्डारगृह बनाए जाते हैं जिन्हें 'कणारा' कहते हैं। कणारा का निर्माण लकड़ी का ढांचा बनाकर इसपर गोबर व मिट्टी लीप कर किया जाता है। भण्डारण में अनाज के साथ किसी रसायन का प्रयोग नहीं होता बल्कि राख व नीम की पत्तियां अनाज को लगने नाले कीड़ों से बचाती हैं। गांवों में पशु चारे के लिए अभी भी खेजड़ी आदि की पत्तियां काम में ली जाती हैं जिसे 'लूंग' कहते हैं। राजस्थानी गांवों में खाद्य के रूप में बाजरा का खीच व राबड़ी बनती है। यहां छाछ से भी सब्जी बना देते हैं। जहां आज के युग में ठेले से प्राप्त सब्जियों को आधा उपयोग करके अधिकांशत: फेंक देते हैं।
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आधुनिक युग कम्प्यूटर आधारित है। इसका असर गांवों तक देखा जाता है। आज की पीढी देखादेखी अधिक कर रही है। राजस्थानी संस्कृति इतनी सक्षम है कि यह कई लोगों के लिए रोजगार का विकल्प है। परम्पराओं का संरक्षण करना आवश्यक है। ये हमारे इतिहास को बयां करती हैं। परम्पराएं हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। परंपराओं का संरक्षण नहीं करेंगे तो हमारी संस्कृति मजबूत नहीं रहेगी।
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