स्वरचित लेख - हमारा अस्तित्व।
Edited By- Vijay Laxmi Singh
हमारा अस्तित्व
मौलिक व स्वरचित- कुछ लोग अपने व्यक्तिगत व राजनीतिक स्वार्थ हेतु देश व समाज को तोड़ने के उद्देश्य से "ठाकुर का कुआं" कविता को अपने-अपने अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्तमान में तो कुएं का कोई अस्तित्व नहीं है। परंतु प्राचीन काल में था। तब इसी ठाकुर के कुएं से पूरे गांव की प्यास बुझती थी। यही ठाकुर जब एक क्षत्रिय राजा- महाराजा थे, तो अपनी संपूर्ण प्रजा का पालन किया करते थे। तब तो कोई छूत- अछूत का भेद नहीं बताता था। तब रणभूमि में युद्ध करने वाला योद्धा केवल क्षत्रिय ही होता था।
प्राचीन समय में भी सबको बराबर काम दिए जाते थे। तब प्रजा के सुख-दुख की सारी जिम्मेदारी को ठाकुर (क्षत्रिय) पूरी ईमानदारी से निभाते थे। फिर सब यह क्यों भूल जाते हैं, कि वह राजा भी एक क्षत्रिय (ठाकुर) होता था। किसी एक व्यक्ति ने कहीं कुछ देखा या अपने व्यक्तिगत भावनाओं को व्यक्त करने के लिए ठाकुर का कुआँ नामक एक कहानी लिखी और लोगों ने अपने ख्यालों में एक कृर्व निर्दय ठाकुर की छवि बना ली। ये भारतवर्ष है' जो केवल और केवल हम क्षत्रियों के त्याग और तप से बना' हमारा अखंड भारत है।
रहने के लिए जगह ठाकुर की, भोजन के लिए अन्न ठाकुर के खेत का, पहनने के लिए कपड़े ठाकुर की मिल के और फिर लिखा जाता है, कि वह सभी बेचारे थे और इस धरती पर केवल एक ठाकुर ही निर्दय है। जो सत्य है, उसे मिटाया नहीं जा सकता और जो हमारा है, उसे कोई छीन नहीं सकता। खेत ठाकुर का, बैल ठाकुर के, खाद -बीज ठाकुर के, यहां तक की पानी भी ठाकुर के कुएं का, फिर आपने उसमें खेती की और आपको उसका हिस्सा भी मिल गया। फिर भी आप बेचारे! यह कहां का न्याय है?
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इस सृष्टि के प्रारंभ से ही क्षत्रिय एक महान दानदाता रहा है। अपने देश और अपनी प्रजा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने की हिम्मत और हौसला हम क्षत्रियों के खून में हैं। आज भी सरहद पर मिटने वालों में 70% क्षत्रिय ही होते हैं ,और कभी-कभी यह आंकड़ा 90% या उससे भी ऊपर चला जाता है।
हम क्षत्रियों ने अपनी इस धरा को अखंड भारत का रूप देने के लिए अपनी 565 रियासतें, 43 गढ़ और 18,700 किले व 40 लाख एकड़ जमीन दान कर दी थी। हम क्षत्रियों के इस महान त्याग को वह लोग कभी नहीं समझ पाएंगे जो हमारी दान दी हुई जमीन पर रह रहे हैं। और अब कुछ गज जमीन के लिए अपनों का खून बहा रहे हैं। इस सूखे मरुस्थल में गंगा लाने वाले भागीरथी को भी वे लोग भूल गए, क्योंकि वह एक क्षत्रिय थे? जब छपनिया अकाल पड़ा था तो हम क्षत्रियों (ठाकुरो) ने अपने भंडार गृह आम जनता के लिए खोल दिए थे।
वर्तमान में क्षत्रियों के उपकार को चाहे सभी जाति वर्ग के लोग भूल जाए पर ईश्वर ने हमेशा हम पर अपना आशीर्वाद रखा है। तभी इस धरा की रक्षा करने वालों का सिर कटने के बाद भी धड़ अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ता रहा है। इंसान रूप में अपनी आखिरी सांस तक मातृभूमि व गौ माता की रक्षा करते रहे और मृत्यु के बाद भोमिया व झुंझार बनकर अपने वचन निभाने वाले भी ठाकुर ही है।
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अब ना हम भूलेंगे और न ही अपने आने वाली पीढियां को यह भूलने देंगे कि, "जब इनको लोकतंत्र चाहिए था, तो हम क्षत्रियों ने अपना राजतंत्र छोड़ दिया था। जब इन्हें संसद की जरूरत हुई तो हमने अपने राजमहल छोड़ दिए थे। हमने अपने देश को बचाने के लिए अपने महलों के खजाने खोल दिए थे। समस्त जनता को शिक्षित करने के लिए विद्यालय व महाविद्यालय बनवा दिए थे। वर्तमान में हर सरकारी ओहदे पर वही लोग रह रहे हैं, जो अपने बयानों में ठाकुर को निर्दय बताते हैं। हमसे हमारा ही अस्तित्व छीना जा रहा है।
केवल शिक्षा ही शायद वह आखरी हथियार है, जिससे हम अपना खोया हुआ वर्चस्व वापस पा सकते हैं। उद्देश्य को समझने के लिए एक छोटा सा उदाहरण है- "जयपुर रियासत में ही एक ठिकाना है, जोबनेर। यहां के रावल नरेंद्र सिंह खंगारोत ने शिक्षा की अलख जगाने के उद्देश्य से स्वयं की हिस्सेदारी में से 3,000 बीघा जमीन दान कर दी थी। वह एक महान भामाशाह थे। इस महाविद्यालय के प्रारंभ में यहां पर क्षत्रियों के लिए प्रत्येक विभाग (बीएससी ,एमएससी, पी एच डी) में सिटे आरक्षित थी। तो यहां पढ़ाने वाले व पढ़ने वाले भी अधिकतर क्षत्रिय ही थे। परंतु वर्तमान में यहां की स्थिति दयनीय हैं। आरक्षित सीटों को सरकार के हस्तक्षेप से न के बराबर कर दिया गया है।
अब यहां कोई क्षत्रिय प्रोफेसर नहीं रहा और पढ़ने वालों में भी क्षत्रियों की संख्या बहुत कम है। जो लोग ठाकुर का कुआं गा- गाकर लोगों को भ्रमित कर रहे हैं, उनका ही एकाधिकार रह गया है। ऐसी अनेक घटनाओं को मामूली समझकर नजअंदाज करना ही हमारी एकमात्र भूल थी। इस भूल को सुधारने के लिए हमें शिक्षा को महत्व देना है।
दूसरा महत्व हमारे संस्कार और रीति-रिवाजों का है। जो हमारे लिए कवच का कार्य करते हैं। जिसने हमें अन्य लोगों से भिन्न बनाकर रखा है। तभी तो हर कोई अपने नाम के साथ "सिंह व ठाकुर" लगाकर राजपूत बनना चाहता है। क्षत्रिय बनने के लिए त्याग व तप की आवश्यकता होती है। अपने देश व मातृभूमि की रक्षार्थ, अपना सर्वस्व न्योछावर करने का जुनून चाहिए होता है।
तुम लाख कविता बनाकर चलो,
चाहे हिम्मत हमारी आजमा के चलो। 1
यह देश ,यह मातृभूमि हमारी है,
इसके कण-कण में महक हमारी है। 2
इसके एकीकरण के लिए सब त्याग दिया,
इसकी रक्षार्थ, जीवन से मोह छोड़ दिया। 3
अब लग रहा है, कि यह भारी भूल हमारी थी,
दयावान बनना भी जैसे एक बीमारी थी।4
शिक्षा की अहमियत समझ कर बनना एक योद्धा है,
उन गढ़ों को अब भरना, जिन्हें हमने ही खोदा है।5
जीवन में सफलता का लक्ष्य बनाकर चले,
अर्जुन की तरह तीर निशाने पर लगा कर चले। 6
हजारों रुकावटें आए चाहे राहों में,
अटल लक्ष्य बना रहे निगाहों में। 7
नजरे अपने मुकाम पर रहे गज की तरह,
आंधी आए राह में चाहे स्वान की तरह।
गन्तव्य से पहले नहीं रुकना, गजराज की तरह।।8
लेखक- रतन खंगारोत - मौलिक व स्वरचित
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