Special story: रेगिस्तान का अपना पर्यावरण, रेतीली विभाओं से सुशोभित थार का मरूस्थल।
भारत का सुदूर पश्चिमी भाग थार का रेगिस्तान, जहां ना तो पानी है और ना ही वनस्पति और जीव जन्तु। एक ऐसा मरूस्थल जहां जीव जन्तु व वनस्पति नहीं होते हुए भी....
| लेखक परिचय |
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अरविन्द सुथार पमाना वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक |
आज हम आपको सीधा लेकर चल रहे हैं जैसलमेर, जी हां बड़े बड़े रेत के टीले, पानी का अभाव, हर तरफ सुखा बंजर, आज हम जानेंगे वहां का पर्यावरण
भारत का सुदूर पश्चिमी भाग थार का रेगिस्तान, जहां ना तो पानी है और ना ही वनस्पति और जीव जन्तु। एक ऐसा मरूस्थल जहां जीव जन्तु व वनस्पति नहीं होते हुए भी विश्व का घनी आबादी व घनी वनस्पति वाला मरूस्थल है। क्योंकि वहां रेगिस्तानी वनस्पति और रेगिस्तानी जीव जन्तु जो हैं। हमने रेगिस्तान विजिट किया और वहां के पर्यावरण के बारे में जानने की कोशिश की। आगे बढकर हमारा मिलना हुआ वहां के ही प्रसिद्ध ऊंटपालक सुमेरसिंह भाटी से, उनकी दी हुई जानकारी से हमारा सफर और भी सार्थक हो गया। आगे चलकर हम सुमेरसिंह भाटी का भी विस्तृत परिचय करवाएंगे। इससे पहले कि हम जिक्र करते हैं जैसलमेर और वहां की सस्कृति की और भौगोलिक विशेषताओं की।
सुदूर पश्चिमी राजस्थान का रेत के घने टीलों वाला जिला है जैसलमेर। जहां वर्षा का वार्षिक औसत मात्र 5 सेमी ही है। आज हम आपको वहीं लेकर चल रहे हैं घने रेगिस्तानी जिले जैसलमेर में। जैसलमेर राजस्थान का सबसे बड़ा जिला है। जहां आबादी का घनत्व बहुत कम है। इतना ही नहीं जैसलमेर की अपनी जलवायु है, अपना पर्यावरण है। गर्म हवाओं के साथ विस्थापित होते बालु के टीले, दूर दूर तक लोगों का नजर न आना वहां की विशेषता है। इस बीच हमने जैसलमेर के पर्यावरण को जाना और पाया कि जैसलमेर में 15-20 किलोमीटर चलने के बाद कोई गांव आता है। वर्षा जल के संचयन हेतु खड़ीन होती हैं, जो 5-7 खेतों में जमा पानी को रोककर बनाई जाती हैं। वर्षाकाल में नीचली जमीन पर प्लाया झीलें बन जाती हैं जो कुछ ही दिनों में सुख जाती हैं। वर्ष भर पानी पीने के लिए लोग अपने घरों पर टांके बनाते हैं।
जैसलमेर में जो मुख्य रूप से वनस्पति पाई जाती हैं इनमें से मुख्य हैं खेजड़ी। खेजड़ी राजस्थान का राज्य पेड़ है। जिसका इंसानी जीवन निर्वाह में बड़ा ही महत्व है। इसकी फलियों को सांगरी कहते हैं जिनसे सब्जी बनती है व इन्हें सुखाने पर आटा बनाया जाता है जिससे ढोकले बनाए जाते हैं, और आजकल बिस्किट भी बनते हैं।।साथ ही पत्तियों को लूंग कहते हैं जिन्हें पशु खाते हैं। इसके अलावा यहां बहुतायत से जाळ होती है जिन पर पीलू नामक फल लगते हैं। पीलू खाने से लू नहीं लगती है। सामान्यत: वहां ऐसी ही जंगली औषधियों से लोग गुजारा कर लेते हैं। इसके अलावा राज्य पुष्प का पेड़ रोहिड़ा, झरबेरी (जिन्हें बोरड़ी कहते हैं) , कंकाड़ी, कुमट, बबूल, कैर, आदि के पेड़ होते हैं। झाड़ियों में आक, खींप, सणिया, बूर, नागफनी, थोर आदि होते हैं। घास कुल में सेवण घास, धामन घास, मोथा, तुंबा, गोखरू, सांठी, दूब आदि होते हैं। ये सारी ऐसी वनस्पतियां हैं जिन्हें ऊंट, बकरी, भेड़ आदि आसानी से खा सकते हैं। रेगिस्तान में आजीविका का एक मात्र स्रोत पशुपालन है। फसलें तो यदाकदा ही होती हैं।।वो भी मोठ बाजरा। वैसे आजकल तो कई स्थानों पर किसानों ने फलोद्यान भी स्थापित करने की सफल कोशिश की है। यह सब बदलती कृषि तकनीकी की ही देन है।
बहरहाल हम बात कर रहे थे रेगिस्तानी वनस्पति की, जिनकी कुछ विशेषताएं होती हैं कि ये बहुत कम पानी से ही अपना जीवन चक्र पूरा कर देती हैं। इनकी जड़े गहरी, तनों पर मजबूत छाल व पत्तियां कांटों के रूप में या घनी कांटेदार वनस्पति होती हैं, इन पौधों को मरूदभिद् पौधे कहते हैं।
यहां पर परिवहन व सवारी का कार्य मुख्य रूप से एक ऐसे जहाज से होता है जिसे रेगिस्तान का जहाज या ऊंट कहते हैं। ऊंट को राजस्थान का राज्य पशु होने का गौरव प्राप्त है। ऊंट के पैर गद्देदार होने से ये बालु रेत पर आसानी से चल सकते हैं। और तो और कई दिनों तक बिना पानी पिए ही रह सकते हैं। रेगिस्तानी झाड़ियों जैसे खींप आदि में गिरगिट, अनेक प्रकार के सरीसृप खासकर पींवणां सांप पाया जाता है। कहते हैं यह सांप सोते हुए लोगों के मुंह के पास आकर जहरीली श्वांस छोड़ता है और जाते वक्त व्यक्ति को जगाकर जाता है। इस भयावहता को देखकर इंसान की मृत्यु तक हो जाती है। हालांकि ऐसा वर्तमान में नहीं होता है।
जैसलमेर में सम के धोरे सैलानियों को खासा आकर्षित करते हैं। विदेशी पर्यटक ऊंटों की सवारी करते देखे जाते हैं, जहां शीतल रातों में रेतीले धोरों पर मध्यम रोशनी व संगीत की ठण्डी धूंनों का आनंद लेते रहते हैं। 'पधारो म्हारे देश' नामक श्लोगन आज रेगिस्तानी संस्कृति की पहचान बन चुका है। जैसलमेर स्थिति सोनार का किला ऐतिहासिक खूबसूरती को बयां करता है, जहां कई फिल्मों का फिल्मांकन भी हो चुका है।
जैसलमेर के सांवता गांव के निवासी सुमेरसिंह भाटी ने बताया कि उनके गांव सांवता स्थित श्री देगराय माता मंदिर का ओरण 610 वर्ष पुराना है, जिसका ताम्रपत्र जैसलमेर के महारावल श्री वैरसी के शासनकाल में उनके द्वारा की गई पुष्कर तीर्थ यात्रा में संकल्प कर विक्रम संवत.1476 वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ओरण के रूप में घोषित किया गया था। जिसकी अनुपालना इस ओरण के आसपास के गाँवों जैसे सांवता, भोपा, रासला, अचला, भीमसर, मुलाना, कराडा, भीखसर आदि द्वारा सदियों से होती आ रही है। इस ओरण में वृक्ष काटना व काश्त करने पर सदियों से रोक भी लगी हुई है। यह ओरण क्षेत्र इन उल्लेखित गांवों के पशुपालकों की आय का मुख्य चारागाह भी है, जिस पर इनका रोजगार आधारित है। वर्तमान में यह ओरण विभिन्न प्रजातियों के पुराने वृक्षों जैसे खेजड़ी, कुम्भट, रोहिड़ा, देसी बबूल, इत्यादि और विभिन्न मरुस्थलीय झाड़ियों, लताओं आदि का एक सुरक्षित क्षेत्र है। यह राजस्थान के राज्यपक्षी गोङावण, तितर, मोर, बंदर, हिरण अत्यादि जीव जन्तु व पशु पक्षियों का भी रहने सुरक्षित क्षेत्र है और ऊंटों के लिये बङा चारागाह यही ओरण है।
जिसमें अपना जीवन यापन करते हैं। कई प्रकार की कम्पनियों द्वारा इस रेगिस्तान मे कार्य किया जा रहा है। इस क्षेत्र में ऊंटों की सख्या 5000 है। भेङ बकरियां 30 हजार से भी अधिक है और धीरे धीरे चारागाह क्षेत्र खत्म होता जा रहा है। इसकी आवाज श्री देगराय ऊष्ट्र संरक्षण एवं दुग्ध विपणन विकास सेवा सस्थान सावता के संयोजक सुमेरसिह भाटी द्वारा कई बार ऊठाई गई। लेकिन उन्होंने बताया कि ये प्रयास राजनेतिक रूकावटों के भेंट चढ गए। सुमेरसिह भाटी का कहना है कि हमारा यह ओरण 60000 बिघा भू भाग में फैला हुआ है। रेगिस्तान का अपना पारिस्थितिक तंत्र है। हां औद्योगिक विकास से यहां आबादी का विस्तार होगा, लेकिन रेगिस्तानी पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ेगा। मेरा विचार है कि यहां से पवन चक्कियों से उत्पन्न बिजली के स्थानांतरण हेतु या अन्य प्रकार की लगाई जाने वाली लाईनों को सरकार द्वारा अन्डरग्राउण्ड भी करवाया जा सकता है। एक तो यहां वनस्पति कम है और दूसरा उसका भी विनाश। सुमेरसिंह भाटी का कहना है कि अगर इस क्षेत्र के पर्यावरण व जैव विविधता पर ध्यान नहीं दिया गया तो यहां से कई वन्यजीव व वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी।
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आपको बता दें कि जैसलमेर के देवीकोट क्षेत्र के गांव सांवता निवासी सुमेरसिंह भाटी देगराय ऊष्ट्र संरक्षण नाम से किसानों को जागरूक करते हुए बड़ी संख्या में ऊंटों का संरक्षण कर रहे हैं। इतना ही नहीं जैसलमेर शहर में ऊंटनी के दूध व इसके कई उत्पाद जैसे आइसक्रीम, कुल्फी आदि बनाकर जैसलमेर कैमल मिल्क डेरी नाम से बेज रहे हैं प्रचार प्रसार कर रहे हैं। सुमेरसिंह का कहना है कि ऊंटनी का दूध बहुत ही पोष्टिक होने के साथ साथ औषधीय गुणों का भंडार है, यह ऑटिज्म जैसी मानसिक बीमारियों का रामबाण इलाज है। साथ ही साथ सुमेरसिंह पर्यावरण संरक्षण का कार्य भी कर रहे हैं। इस कार्य हेतु सुमेरसिंह को राज्य व जिला स्तरीय कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
तो हमने देखा कि किस तरह से लोगों का रेगिस्तानि पर्यावरण के साथ गहरा लगाव है, वहां की जैव विविधता भी निराली है। रेगिस्तान में कई ऐसी वनस्पतियां हैं जिनका उपयोग औषधियों के रूप में किया जा सकता है। वहां पर ऊंटों व बकरियों की सघनता का होना इस बात का द्योतक है कि ये पशु अभाव एवं संघर्ष में जीवन जीने के काबिल है। कहते हैं "ऊंट छोङे आकड़ा, बकरी छोड़े काकरा।" मतलब ऊंट आक को छोड़कर सब कुछ खाता है जबकि बकरी तो कुछ भी नहीं छोड़ती। हम रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के लिए वहां की वनस्पतियों को बचाना होगा, हमारे सिर पर चढ रही औद्योगिक विस्तार की बला कहीं मरूस्थली जैव संतुलन को बिगाड़ ना दे। हम भविष्य में भी इस प्रकार का मंथन करते रहेंगे।
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