Special Article- मुफ्त की योजनाओं के प्रति आर्थिक चिंता.... ?
दिल्ली में नए मुख्यमंत्री (Chief Minister) के शपथ ग्रहण के साथ ही भाजपा सरकार (BJP government) ने कामकाज संभाल लिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव का आरंभ....
लेखक- विक्रांत निर्मला सिंह
शोधार्थी, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राउरकेला
दिल्ली में नए मुख्यमंत्री (Chief Minister) के शपथ ग्रहण के साथ ही भाजपा सरकार ने कामकाज संभाल लिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Elections) का आरंभ दो महत्वपूर्ण प्रश्नों के साथ हुआ था। पहला, सरकार कौन सी पार्टी बनाएगी और दूसरा, मुफ्त योजनाओं (फ्रीबीज) की राजनीति का अंत कब और कैसे होगा? भाजपा की सरकार बनने के साथ ही पहले प्रश्न का उत्तर तो मिल गया, परंतु दूसरे प्रश्न का उत्तर मिलना अभी शेष है। वैसे किसी भी राजनीतिक दल के लिए फिलहाल मुफ्त योजनाओं को समाप्त करना आसान नहीं होगा, फिर भी इसके आर्थिक पहलुओं के प्रति चिंता जरूरी की जानी चाहिए।
देश की राजधानी दिल्ली में रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है। इस माह संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र में एक नई प्रवृत्ति का गवाह बना, जहां लगभग सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं करते रहे। हालांकि, चुनाव परिणाम ने इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया है, क्योंकि भाजपा ने भी दिल्ली में कई ऐसे वादे किए हैं जो मुफ्त योजनाओं की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में यह बहस और व्यापक हो गई है कि क्या राजनीतिक दल इस प्रवृत्ति से बाहर निकलने को तैयार हैं? हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजनाओं की इस राजनीति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नकद हस्तांतरण योजनाओं और मुफ्त राशन जैसी सुविधाओं के कारण लोग बहुत सारे लोग काम करने के इच्छुक नहीं दिखते हैं। न्यायालय ने इसे एक गंभीर समस्या मानते हुए सवाल उठाया कि क्या हम इस तरह एक परजीवी वर्ग का निर्माण नहीं कर रहे हैं?
क्या अब सर्वोच्च संस्थाओं को इस प्रवृत्ति पर रोक लगानी चाहिए? इस विषय पर अलग-अलग मत हो सकते हैं। कुछ लोगों का मत हो सकता है कि सरकारों को जनता ने चुना है, इसलिए उन्हें उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए और फ्रीबीज को सामाजिक उत्थान के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमें किन जरूरतों को प्राथमिकता देनी चाहिए और किन्हें वास्तव में सहायता की आवश्यकता है? क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त राशन देने की तुलना सभी महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा या सभी युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने से की जा सकती है? क्या यह सच में तर्कसंगत है? वास्तविकता यह है कि आज मुफ्त योजनाएं सत्ता तक पहुंचने का सबसे आसान साधन बन गई हैं, और राज्य सरकारें यह समझने में असफल हैं कि इसकी भारी कीमत अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ रही है। अधिकांश राज्य इसे अपनाने की होड़ में हैं। दिल्ली, पंजाब, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
राज्यों में वित्तीय संकट : आज राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त योजनाओं की बढ़ती प्रवृत्ति राज्यों की वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर देश के कुल कर्ज पर चर्चा होती है, लेकिन राज्यों के बढ़ते ऋण पर वैसी गहन बहस नहीं होती। क्या राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में उनके कर्ज के अनुपात पर ध्यान दिया जा रहा है? इस बहस को समझने के लिए कुछ राज्यों का अध्ययन पर्याप्त है। कर्नाटक, जो आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में गिना जाता है, मुफ्त योजनाओं के भारी बोझ तले दबता जा रहा है। राज्य सरकार अब तक ₹63,382 करोड़ पांच गारंटी योजनाओं पर खर्च कर चुकी है, लेकिन राजस्व के स्रोत सीमित हो रहे हैं। सरकार को अब बस किराया बढ़ाने, ईंधन की कीमतें बढ़ाने एवं बेंगलुरु के पास लगभग 25 हजार एकड़ भूमि को कामर्शियल बनाने जैसे विकल्पों पर विचार करना पड़ रहा है।
दूसरा राज्य है हिमाचल प्रदेश, इसकी भी स्थिति चिंताजनक है। पहले से ही ₹87 हजार करोड़ रुपये के कर्ज से जूझ रहे इस राज्य ने पिछले 20 महीनों के दौरान ₹21,366 करोड़ का अतिरिक्त ऋण लिया है। प्रति व्यक्ति कर्ज के मामले में हिमाचल प्रदेश देश का दूसरा सबसे कर्जग्रस्त राज्य बन चुका है, जहां हर व्यक्ति पर ₹1.17 लाख रुपये का कर्ज है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सरकार को कर्मचारियों की भविष्य निधि से ₹2,810 करोड़ का ऋण लेना पड़ा है। वर्तमान में राज्य की कुल आय का 70 प्रतिशत हिस्सा भत्तों, ब्याज और सब्सिडी में खर्च हो रहा है, जिससे विकास कार्यों के लिए संसाधन सीमित होते जा रहे हैं। तीसरा, केरल, जिसे सामाजिक सुरक्षा के माडल राज्य के रूप में देखा जाता था, अब गंभीर वित्तीय संकट में फंस चुका है।
स्थिति इतनी खराब हो गई कि राज्य सरकार को केंद्र से मदद की गुहार लगानी पड़ी। केंद्र सरकार ने केरल को दिसंबर 2024 तक ₹21,253 करोड़ का ऋण लेने की अनुमति दी। राज्य के पास कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान के लिए भी पर्याप्त धन नहीं बचा था। वहीं पंजाब, कभी कृषि क्रांति का अग्रणी राज्य आज गंभीर वित्तीय परेशानी में हैं। तीन सौ यूनिट मुफ्त बिजली देने की योजना से राज्य की सब्सिडी लागत ₹20 हजार करोड़ तक पहुंच गई है। राज्य सरकार 2024-25 के वित्तीय वर्ष की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में ₹21,119 करोड़ ऋण ले चुकी है और चालू वित्तीय वर्ष में ₹30,465 करोड़ का ऋण लेने का अनुमान है। इसके परिणामस्वरूप, 2024-25 के अंत तक पंजाब का कुल कर्ज ₹3.74 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। इससे राज्य का ऋण स्तर उसकी जीडीपी के 48 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जो वित्तीय संतुलन के लिए गंभीर खतरा है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो राज्य की अधिकांश आय ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगी, जिससे विकास कार्यों के लिए धन जुटाना असंभव हो जाएगा।
केंद्र व आरबीआइ करें पहल : आरबीआइ के अनुसार, मार्च 2020 से मार्च 2023 के बीच 28 राज्यों की बकाया देनदारियां 43 प्रतिशत बढ़कर कुल राज्य ऋण ₹76.09 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी हैं। फ्रीबीज के लिए प्रसिद्ध पंजाब (44.1 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (42.5 प्रतिशत) सबसे अधिक ऋण-से-जीडीपी अनुपात वाले राज्य हैं, जबकि आदर्श अनुपात 20 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटे की अधिकतम सीमा 3.5 प्रतिशत तय की गई है, लेकिन राज्यों को चार प्रतिशत की छूट मिली है। यदि राज्यों ने मुफ्त योजनाओं पर अत्यधिक खर्च किया, तो इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर निवेश मुश्किल हो जाएगा। दिल्ली सरकार ने इस वर्ष इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए सात हजार करोड़ रुपये की कमी महसूस की है, जिससे सड़कों और पुलों के निर्माण में देरी हो रही है। इसलिए केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्यों को गैर-जरूरी मुफ्त योजनाओं के लिए अत्यधिक कर्ज लेने की अनुमति न दी जाए।
परिस्थितियों को देखते हुए आज फ्रीबीज की सीमा तय करना करना जरूरी है, क्योंकि राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए कर्ज के बोझ को अनियंत्रित रूप से बढ़ा सकते हैं, जिससे राज्यों की अर्थव्यवस्था संकट में फंस सकती है। दिल्ली इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां 31 वर्षों में पहली बार सरकार घाटे में जा रही है। अनुमान है कि दिल्ली की आय ₹62 हजार करोड़ रुपये होगी, जबकि खर्च ₹64 हजार करोड़ तक पहुंचेगा। आज दिल्ली में सभी मुफ्त वादों को पूरा करने के लिए अनुमानित रूप से ₹25 हजार करोड़ की आवश्यकता होगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह धन कहां से आएगा? क्या इसकी भरपाई किसी इलाके की सड़क, अस्पताल या अन्य बुनियादी सुविधाओं की लागत पर होगी? इसलिए आज राज्यों और केंद्र सरकार को आपसी समन्वय स्थापित करके स्वास्थ्य, शिक्षा और जनकल्याण जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। सरकारों का लक्ष्य सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करके नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारना होना चाहिए, न कि लोगों के हाथों में नकद राशि देकर दीर्घकालिक आर्थिक संकट को आमंत्रित करना।
- फ्रीबीज और बुनियादी जरूरतों में अंतर ही समाधान
मुफ्त योजनाओं पर हो रही बहस का अर्थ यह नहीं है कि सभी प्रकार की निश्शुल्क सुविधाएं समाप्त कर दी जाएं। बल्कि इसका उद्देश्य यह समझना है कि कौन-सी योजनाएं नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं और कौन-सी केवल तात्कालिक लाभ देकर दीर्घकालिक संकट उत्पन्न कर सकती हैं। राशन, आवास और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं प्रत्येक नागरिक का अधिकार हैं, जिन्हें सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए। लेकिन नकद प्रोत्साहन, मुफ्त यात्राएं या बिना किसी वर्गीकरण के सभी नागरिकों को आर्थिक सहायता देना ऐसी योजनाएं हैं, जो राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सरकारें इन योजनाओं को निरंतर जारी रखने के दबाव में आ जाती हैं और इन्हें बंद करने का साहस नहीं कर पातीं। इसका सीधा प्रभाव राज्यों के पूंजीगत व्यय पर पड़ता है। आज हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती है। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में यह अन्य राज्यों में भी दिखाई पड़ेगा।
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आज राज्यों को पूंजी निर्माण और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। इसके लिए डाटा मैपिंग की अत्यंत आवश्यकता है। राज्य सरकारों को उन परिवारों की पहचान करनी होगी, जिन्हें वास्तव में आर्थिक सहायता या मुफ्त योजनाओं की जरूरत है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने आवश्यक हैं। सबसे पहले, एक स्पष्ट कट-आफ तय किया जाए, जिससे यह सुनिश्चित हो कि केवल जरूरतमंदों को ही योजनाओं का लाभ मिले। लक्षित लाभार्थी पहचान प्रणाली के माध्यम से वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहचान कर उन्हें ही सरकारी सहायता दी जाए।
मुफ्त योजनाओं का उचित प्रबंधन और क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सरकारों को नीतिगत सुधारों की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि ये योजनाएं किसी भी राज्य की वित्तीय स्थिरता को कमजोर न करें। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण की सराहना की जानी चाहिए, जिन्होंने मुफ्त योजनाओं की बहस को एक नई दिशा देने का प्रयास किया है। पीएम सूर्य घर योजना इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इस योजना के तहत सरकार भारी निवेश करके लोगों के घरों में सौर ऊर्जा पैनल लगवा रही है, जिससे ऊर्जा की बचत होगी और बिजली बिल में भी कमी आएगी। यह पहल लाभार्थी को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ पर्यावरण हितैषी भी है। हमें ऐसी सतत विकासशील योजनाओं की ओर बढ़ना होगा, जो अर्थव्यवस्था पर बोझ डाले बिना आम जनता को सशक्त बनाएं।
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