By INA News Hardoi.
जिले में एक और ऐतिहासिक स्थल(किले) को विकसित करने की ओर नया रास्ता खुल गया। बिलग्राम तहसील में स्थित राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) किले का अब पुरातात्विक विकास किया जाएगा। शासन द्वारा इस किले को संरक्षित करने का आदेश जारी कर दिया गया है। बता दें कि INA News द्वारा पूर्व प्रकाशित इंद्रधनुष व हरदोई (Hardoi) यात्रा नामक पत्रिकाओं में जिले के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों की महत्ता के बारे में बताते हुए इनके संरक्षण व विकास की पहल की जाती रही है। अब शासन द्वारा जारी अधिसूचना के बाद यह उम्मीद जगी है कि जिले के कई ऐतिहासिक स्थल विकास के नए आयामों को गढ़ेंगे। जिनमें से एक यह किला भी है।
इस बारे में जानकारी देते हुए जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने बताया कि शासन की ओर से तहसील बिलग्राम के माधोगंज विकास खण्ड के रुईयागढ़ी स्थित राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) के किले को पुरातत्विक स्थल घोषित किया गया है इससे जनपद में ऐतिहासिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और किले का नियमित रखरखाव सुनिश्चित होगा। इस आशय की अधिसूचना शासन द्वारा जारी की गयी है। विकास हेतु तीन भूमि गाटों को लिया गया है। राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) जनपद के एक प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। शासन की ओर से जारी अधिसूचना से जनपद वासियों की एक बहुप्रतीक्षित माँग पूरी हो गयी है।
- यह है राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) के जीवन का इतिहास...
माधौगंज कस्बे से उत्तर दिशा में करीब दो किलोमीटर के फासले पर एक छोटा से गांव है रूइया गढ़ी। देश के दूसरे तमाम सामान्य गांवों की तरह यहां भी बदहाली मुंह बाये खड़ी है, लेकिन आजादी की लड़ाई में रूइया गढ़ी का नाम सुनकर गोरी हुकूमत कांपती थी। उस दौर में रूइया गढ़ी एक रियासत हुआ करती थी। राजा थे नरपत सिंह।
अवध के ज्यादातर इलाकों में काबिज होने के बाद अंग्रेज फौज हरदोई (Hardoi) में भी कब्जा करने की फिराक में थी, लेकिन नरपत सिंह की अदम्य बहादुरी और रणनीति के कारण अंग्रेजों को चार मर्तबा करारी हार का सामना करना पड़ा। पांचवे युद्ध में अंग्रेजों ने बड़ी संख्या में सैनिकों और तोप के साथ हमला बोला। इस जंग में भी नरपति सिंह और रूइया गढ़ी के सैनिकों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। अंग्रेजों के पैर उखडऩे लगे थे, इसी दौरान अचानक राजा शहीद हो गए।
- इस गांव का नाम सुनकर अंग्रेज थरथर कांपते थे...
अंग्रेजों ने अवध क्षेत्र में कब्जा करने के बाद में गंगा किनारे के क्षेत्र में कब्जा करने की रणनीति बनाई थी। अंग्रेज सेना अपनी तोपों के साथ गंगा की तलहटी में आगे बढ़ रही थी। इस दौरान राजा नरपति सिंह के नेतृत्व में रूइया गढ़ी की सेना ने अंग्रेजों पर जोरदार तरीके से हमला बोल दिया था। इस लड़ाई में अंग्रेजी सेना को राजा नरपति सिंह के सैनिकों ने भारी क्षति पहुंचाई थी।
जिला मुख्यालय से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रुइया गढ़ी अंग्रेजी शिकस्त की कहानी आज भी कह रही है। यहां का दुर्ग देश के लिए गौरव का विषय है। हरदोई (Hardoi) की जमीन पर अंग्रेजों की शिकस्त की कहानी यहीं से शुरू हुई थी। इस दौरान राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) और कानपुर के पेशवा ने अंग्रेजों को घुटनों पर ला दिया था। राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) ने कहा था कि उनके जिंदा रहते अंग्रेजी हुकूमत हरदोई (Hardoi) का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं। राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) ने अंग्रेजों को हरदोई (Hardoi) में डेढ़ वर्ष तक घुसने नहीं दिया था। रुइया गढ़ी के सैनिकों ने 4 वर्षों में अंग्रेजों को करारी शिकस्त दी थी। 8 जून 1987 को छापेमार युद्ध के दौरान राजा और उनके सैनिकों ने अंग्रेजी फौज की एक बड़ी टुकड़ी को मल्लावां में मौत के घाट उतार दिया था।
इस दौरान जिले का डिप्टी कमिश्नर डब्लूसी चैपर हरदोई (Hardoi) छोड़कर महफूज ठिकाने की तरफ भाग निकला था। उसके जाते ही अंग्रेजी फौज ने फिर से राजा नरपत सिंह (Raja Narpat Singh) पर हमला बोल दिया था और इस बार अंग्रेजों को फिर शिकस्त खानी पड़ी थी। पहला युद्ध 15 अप्रैल 1858 को दुर्ग पर हुआ था। वहीं दूसरा युद्ध 22 अप्रैल 1858 को सिरसा गांव में हुआ था। 28 अक्टूबर 1858 में रुइया दुर्ग पर तीसरा युद्ध हुआ था और फिर आखिरी युद्ध 9 नवंबर 1858 को मिनौली में हुआ था। इसके बाद में जिले के नवाब और राजाओं ने अंग्रेजों की दासता स्वीकार कर ली थी, लेकिन इसके बाद भी नरपति सिंह के साथ में करीब डेढ़ साल तक युद्ध जारी रहा था। इसके बाद नरपति सिंह शहीद हो गए थे।