Lucknow : ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के प्रभाव एवं जल प्रबंधन की चुनौतियां' विषय पर संगोष्ठी का हुआ आयोजन
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आयुक्त ग्राम्य विकास जी. एस. प्रियदर्शी ने कहा कि जल संरक्षण के क्षेत्र में निरंतर और ठोस कार्य किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जलागम क्षेत्र (कैचमें
लखनऊ : उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्देश के क्रम मे विश्व जल दिवस (22 मार्च)के परिपेक्ष्य मे ग्राम्य विकास विभाग द्वारा जवाहर भवन के 10वें तल पर स्थित आयुक्त कार्यालय के सभागार में 'ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के प्रभाव एवं जल प्रबंधन की चुनौतियां' विषय पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में जल पुनर्भरण और संरक्षण पर विस्तृत चर्चा की गई।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आयुक्त ग्राम्य विकास जी. एस. प्रियदर्शी ने कहा कि जल संरक्षण के क्षेत्र में निरंतर और ठोस कार्य किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जलागम क्षेत्र (कैचमेंट) के समुचित आकलन के बिना तालाब निर्माण से बचना चाहिए, अन्यथा अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते। उन्होंने अधिकारियों से अपील की कि वे केवल प्रस्तुतियों तक सीमित न रहकर व्यवहारिक और क्रियान्वयन योग्य कार्ययोजनाएं तैयार करें।
संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने जल संरक्षण एवं जल पुनर्भरण के प्रति आमजन में जागरूकता की कमी को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वर्षा जल के अधिकतम संचयन और उसके प्रभावी उपयोग के लिए व्यापक जनसहभागिता आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक जल स्रोतों, विशेषकर तालाबों की उपेक्षा पर भी चिंता व्यक्त की गई। यह भी रेखांकित किया गया कि बढ़ती जल खपत और आधुनिक साधनों के कारण जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा है।
नीतिगत पक्ष पर चर्चा करते हुए बताया गया कि सीमित गहराई वाले तालाब जल्दी सूख जाते हैं, जिससे उनका दीर्घकालिक लाभ नहीं मिल पाता। साथ ही फसल चक्र का जल स्तर पर प्रभाव भी महत्वपूर्ण है जहां अधिक पानी वाली फसलें जल संकट को बढ़ाती हैं, वहीं कम पानी वाली फसलें संतुलन बनाए रखने में सहायक होती हैं।
मनरेगा के अंतर्गत किए जा रहे जल संरक्षण कार्य जैसे तालाब निर्माण एवं पुनर्जीवन, चेकडैम निर्माण और जल निकासी व्यवस्था में सुधार को ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट कम करने में उपयोगी बताया गया। इन कार्यों से रोजगार सृजन के साथ-साथ कृषि उत्पादन में भी वृद्धि हुई है। हालांकि, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, रखरखाव की कमी तथा स्थानीय भागीदारी के अभाव को प्रमुख समस्याओं के रूप में चिन्हित किया गया।
संगोष्ठी में यह सुझाव दिया गया कि जल संरक्षण को स्थायी बनाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन को सुदृढ़ किया जाए, योजनाओं की नियमित निगरानी हो तथा समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। साथ ही संबंधित कर्मियों को समय-समय पर अद्यतन (अपडेट) करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। कार्यक्रम में ग्राम्य विकास विभाग के अपर आयुक्त अमनदीप डुली समेत केंद्रीय भूजल बोर्ड, भूगर्भ जल विभाग, उत्तर प्रदेश, पंचायती राज विभाग,लघु सिंचाई विभाग आदि के अधिकारी एवं अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।
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