केरल में सत्ता का महासंग्राम, मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर कांग्रेस के भीतर रस्साकशी तेज
इन दो दिग्गजों के बीच पूर्व प्रतिपक्ष नेता रमेश चेन्निथला भी अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर रहे हैं। चेन्निथला के पास गृह मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में लंबा प्रशासनिक अनुभव है। उनके समर्थकों का मानना है कि गठबंधन सरका
- यूडीएफ की प्रचंड जीत के बाद भी नेतृत्व पर सस्पेंस, तीन दिग्गज चेहरों के बीच फंसा पेच
- हाईकमान की चौखट पर पहुंची तिरुवनंतपुरम की जंग, शक्ति प्रदर्शन और गुटबाजी ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें
केरल के राजनीतिक इतिहास में एक दशक के लंबे अंतराल के बाद संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) ने सत्ता में शानदार वापसी की है, लेकिन जीत के इस जश्न के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर गहरा सस्पेंस बना हुआ है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 140 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटों पर कब्जा जमाकर वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका है। हालांकि, चुनावी परिणाम आने के कई दिन बीत जाने के बाद भी कांग्रेस आलाकमान यह तय नहीं कर पाया है कि केरल की कमान किसे सौंपी जाए। वर्तमान में निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कामकाज देख रहे हैं, जबकि कांग्रेस के भीतर तीन अलग-अलग गुटों ने अपने-अपने नेताओं के लिए किलेबंदी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री पद की इस दौड़ में सबसे मजबूत नाम वी.डी. सतीशन का उभरकर सामने आया है, जिन्होंने पिछले पांच वर्षों के दौरान प्रतिपक्ष के नेता के रूप में संगठन को नई जान दी है। सतीशन को पार्टी के भीतर एक युवा और आक्रामक चेहरे के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के मुद्दों पर एलडीएफ सरकार को लगातार घेरा। उनके समर्थकों का तर्क है कि इस जीत की पटकथा सतीशन ने ही लिखी है, इसलिए उन्हें स्वाभाविक रूप से नेतृत्व मिलना चाहिए। हालांकि, पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा ऐसा भी है जो अनुभव को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है, जिससे मामला और अधिक पेचीदा हो गया है।
सतीशन के साथ ही अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव के.सी. वेणुगोपाल का नाम भी रेस में काफी आगे चल रहा है। वेणुगोपाल को कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उनकी मजबूत पकड़ और सांगठनिक अनुभव उनके पक्ष में जाता है। खबर है कि नवनिर्वाचित विधायकों के एक बड़े वर्ग ने वेणुगोपाल के नाम पर अपनी सहमति जताई है। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे वर्तमान में लोकसभा सांसद हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में अपनी सीट छोड़नी होगी और छह महीने के भीतर विधानसभा चुनाव जीतना होगा, जिसे लेकर पार्टी का एक वर्ग संशय में है। इन दो दिग्गजों के बीच पूर्व प्रतिपक्ष नेता रमेश चेन्निथला भी अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर रहे हैं। चेन्निथला के पास गृह मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में लंबा प्रशासनिक अनुभव है। उनके समर्थकों का मानना है कि गठबंधन सरकार चलाने के लिए जिस परिपक्वता और वरिष्ठता की आवश्यकता है, वह चेन्निथला में कूट-कूट कर भरी है। चेन्निथला ने इस बार हरिपाद सीट से भारी मतों से जीत दर्ज की है और वे पार्टी के पुराने वफादारों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। चेन्निथला और उनके समर्थक लगातार दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं, जिससे शक्ति संतुलन की स्थिति और अधिक नाजुक हो गई है।
शक्ति प्रदर्शन और दिल्ली की दौड़
पिछले तीन दिनों से तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक बैठकों का दौर जारी है। मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई उच्चस्तरीय बैठक में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की मौजूदगी ने इस सस्पेंस को और गहरा दिया है। पर्यवेक्षकों ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट आलाकमान को सौंप दी है, जिसमें विधायकों की राय को प्रमुखता दी गई है। इस बीच, केरल की सड़कों पर विभिन्न नेताओं के समर्थन में लगे पोस्टर और फ्लेक्स बोर्ड कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को सरेआम कर रहे हैं।
कांग्रेस के सहयोगी दल, विशेषकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। सहयोगियों का मानना है कि नेतृत्व के चयन में हो रही देरी से सरकार के गठन में बाधा आ रही है, जो जनता के बीच एक गलत संदेश भेज सकती है। मुस्लिम लीग ने स्पष्ट किया है कि वे कांग्रेस के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन वे चाहते हैं कि एक ऐसा चेहरा सामने आए जो गठबंधन के सभी घटकों को साथ लेकर चल सके। सहयोगियों का दबाव भी आलाकमान पर जल्द निर्णय लेने के लिए एक बड़ा कारक बना हुआ है, क्योंकि प्रशासन को पटरी पर लाने के लिए पूर्णकालिक मुख्यमंत्री की तत्काल आवश्यकता है।
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