UCC पर अबू आज़मी का कड़ा प्रहार: कहा- 'धर्म एक स्वतंत्र संविधान है, इसमें दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं'।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अबू आसिम आज़मी ने मुंबई में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रति
- समान नागरिक संहिता को समाजवादी पार्टी ने बताया 'अन्याय', महाराष्ट्र में कानून के विरोध की दी चेतावनी
- विविधतापूर्ण भारत में एक कानून का विरोध: अबू आज़मी बोले- "अहंकार के बल पर थोपा जा रहा है फैसला"
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता अबू आसिम आज़मी ने मुंबई में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रति अपनी तीव्र नापसंदगी व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि देश में पहले से ही आपराधिक कानून (Criminal Law) सभी के लिए समान हैं, चाहे वह किसी भी धर्म का अनुयायी क्यों न हो। आज़मी के अनुसार, शादी, तलाक और संपत्ति के बंटवारे जैसे निजी मामले पूरी तरह से धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जब दक्षिण भारत में विवाह की अलग परंपराएं हैं और आदिवासियों के अपने नियम हैं, तो केवल एक समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों को निशाना बनाना या उन पर एक नया ढांचा थोपना तर्कसंगत नहीं है।
आज़मी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि इस्लाम में संपत्ति का बंटवारा कुरान शरीफ के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जाता है, जो सदियों से चली आ रही एक व्यवस्था है। उन्होंने सत्ता पक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि बहुमत के अहंकार में आकर सरकार कोई भी बिल ला सकती है, लेकिन वह देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए नाइंसाफी होगी। उनके अनुसार, संविधान में समय-समय पर बदलाव होते हैं, लेकिन धर्म की बुनियादी शिक्षाओं और उसके 'निजी संविधान' में बदलाव करने का अधिकार किसी भी विधायी संस्था को नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि ऐसे कानून देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर कर सकते हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य सरकार ने भी समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। हाल ही में महाराष्ट्र विधान परिषद में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और सरकार ने विभिन्न विभागों से इस पर रिपोर्ट मांगी है। अबू आज़मी ने इस पूरी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि वे और उनकी पार्टी इस कानून को बिल्कुल पसंद नहीं करेंगे और इसे लागू होने से रोकने के लिए हर संभव संवैधानिक रास्ता अपनाएंगे। आज़मी का मानना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाना अनिवार्य है, न कि इसे जबरन थोपना। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं, अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत सरकार को देश भर में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश देता है। वर्तमान विवाद इन्हीं दो अनुच्छेदों के बीच के संतुलन को लेकर है, जहाँ एक पक्ष इसे राष्ट्र की एकता के लिए जरूरी मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचान के लिए खतरा बताता है।
अबू आज़मी ने उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी आदिवासियों और कुछ विशिष्ट समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, जो खुद इस कानून की एकरूपता पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक देश-एक कानून का नारा दिया जा रहा है, तो इसमें चयनात्मक छूट क्यों दी जा रही है? उन्होंने इसे राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम बताया और कहा कि इससे समाज में ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा होती है। उनके अनुसार, सरकार को बुनियादी मुद्दों जैसे शिक्षा, बेरोजगारी और महंगाई पर ध्यान देना चाहिए, न कि लोगों की निजी आस्थाओं के बीच दीवार खड़ी करनी चाहिए।
सपा नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय ने कभी भी अन्य समुदायों की परंपराओं या जुलूसों पर आपत्ति नहीं जताई है, तो फिर उनके व्यक्तिगत कानूनों को ही बहस का केंद्र क्यों बनाया जाता है। उन्होंने कुरला में एक हालिया सभा का जिक्र करते हुए मुसलमानों से अपील की कि वे शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहें। आज़मी का कहना है कि मजहब में दखलअंदाजी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है और यह केवल एक समुदाय का नहीं बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक विविधता का मामला है जिसे संविधान निर्माताओं ने संरक्षित करने का वादा किया था।
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