छिंदवाड़ा में विकास के दावों की खुली पोल: प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला तक नहीं पहुंची एंबुलेंस, ग्रामीणों ने खटिया पर नदी पार कराई!
Chhindwara News: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण एक गर्भवती महिला को खटिया पर लिटाकर नदी पार करानी पड़ी। पढ़िए पूरी खबर।
- Chhindwara Health System Failure: छिंदवाड़ा में सिस्टम लाचार, गर्भवती महिला को खटिया पर नदी पार कराकर पहुंचाया अस्पताल
- Chhindwara Pregnant Woman News: न सड़क, न पुल और न आई एंबुलेंस, छिंदवाड़ा में गर्भवती को खाट पर नदी पार कराने को मजबूर हुए लोग
- मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से विचलित करने वाली तस्वीर: बुनियादी सुविधाओं के अभाव में गर्भवती महिला को खटिया के सहारे नदी पार करानी पड़ी
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से बुनियादी विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों को कटघरे में खड़ी करने वाली एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहाँ एक सुदूर ग्रामीण इलाके में प्रसव पीड़ा से जूझ रही एक गर्भवती महिला तक आपातकालीन स्थिति में न तो एंबुलेंस पहुँच सकी और न ही वहाँ तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क या पुल उपलब्ध था। विवश होकर ग्रामीणों और परिजनों ने महिला को एक खटिया (खाट) पर लिटाया और उफनती नदी को जान जोखिम में डालकर पार कराया। नदी पार करने के बाद भी स्वास्थ्य केंद्र दूर होने के कारण महिला को मोटरसाइकिल (बाइक) पर बैठाकर जैसे-तैसे अस्पताल पहुँचाया गया। यह घटना स्थानीय प्रशासन के दावों और सुदूर अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत को पूरी तरह बयां करती है।
यह पूरा मामला छिंदवाड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले एक सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र का है, जहाँ आज भी आधुनिक विकास की किरण नहीं पहुँच पाई है। क्षेत्र में रहने वाली एक स्थानीय गर्भवती महिला को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिजनों ने तुरंत सरकारी आपातकालीन एंबुलेंस सेवा (108) को संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन गांव तक पक्की सड़क संपर्क न होने और बीच में बहने वाली नदी पर पुल न होने के कारण वाहन वहाँ तक पहुँचने में असमर्थ रहा। चिकित्सा सहायता समय पर न मिलती देख, गाँव के लोगों ने पारंपरिक और जोखिम भरा तरीका अपनाया। उन्होंने महिला को खाट पर लेटाया और उफनते जलस्तर के बीच पैदल ही नदी पार की, ताकि समय रहते माँ और होने वाले बच्चे की जान बचाई जा सके।
विस्तृत विवरण के अनुसार, मानसून के इस मौसम में स्थानीय नदी-नाले उफान पर हैं। पीड़ित महिला के गाँव और मुख्य सड़क के बीच एक बरसाती नदी बहती है, जिस पर दशकों से पुल निर्माण की मांग लंबित है। जब महिला को प्रसव पीड़ा हुई, तो पूरा परिवार संकट में आ गया। एंबुलेंस चालक ने सड़क की जर्जर स्थिति और नदी पार करने का कोई रास्ता न होने के कारण गाँव के मुहाने पर आने से असमर्थता जताई।
समय तेजी से बीत रहा था और महिला की स्थिति बिगड़ती जा रही थी। ऐसे में गाँव के युवाओं और बुजुर्गों ने एकजुट होकर साहस दिखाया। महिला को एक घरेलू लकड़ी की खटिया पर लेटाया गया। चार से पांच मजबूत पुरुषों ने खाट को अपने कंधों पर उठाया और गर्दन तक गहरे पानी वाली नदी में उतर गए। पैर फिसलने के भारी जोखिम के बावजूद उन्होंने संतुलन बनाए रखा और सुरक्षित रूप से नदी के दूसरे छोर पर पहुँचे। इसके बाद, वहाँ कोई अन्य चार पहिया वाहन न होने के कारण, महिला को एक बाइक पर बीच में बैठाकर किसी तरह संभाला गया और कई किलोमीटर दूर स्थित नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।
इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद स्थानीय स्तर पर लोगों में काफी आक्रोश देखा जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे हर साल बारिश के दिनों में इसी तरह नरकीय जीवन जीने को मजबूर होते हैं। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर न तो सड़क बनती है और न ही नदी पर पुलिया का निर्माण होता है।
दूसरी तरफ, मीडिया के माध्यम से मामला संज्ञान में आने के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने मामले की जांच करने की बात कही है। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सुदूर अंचलों में भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं, फिर भी विभाग की कोशिश रहती है कि हर नागरिक तक सुविधाएं पहुँचें। इस विशेष मामले में सड़क और पुल के अभाव को लेकर संबंधित निर्माण विभाग को अवगत कराया जाएगा ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति न हो।
यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि डिजिटल इंडिया और तीव्र विकास के दौर में भी देश के ग्रामीण इलाकों की बुनियादी हकीकत क्या है। एक तरफ जहाँ बड़े शहरों में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी एक गर्भवती महिला को प्रसव जैसे संवेदनशील समय पर खटिया और मोटरसाइकिल का सहारा लेना पड़ रहा है। यह स्थिति संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) को बढ़ावा देने वाली सरकारी योजनाओं की सफलता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। इस प्रकार के जोखिम भरे सफर के दौरान संक्रमण, दुर्घटना या प्रसव संबंधी गंभीर जटिलताओं के कारण जच्चा-बच्चा दोनों की जान को गंभीर खतरा हो सकता है।
इस विचलित करने वाली तस्वीर के सामने आने के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि सो रहा प्रशासन जागेगा। सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि उक्त नदी पर तुरंत एक पक्के पुल का निर्माण सुनिश्चित किया जाए और गाँव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली बारहमासी पक्की सड़क बनाई जाए। इसके साथ ही, जब तक स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक के लिए स्वास्थ्य विभाग को इन संवेदनशील और कटे हुए इलाकों में 'पालकी एंबुलेंस' या स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (ANM/आशा कार्यकर्ता) की विशेष तैनाती करनी चाहिए, ताकि आपातकाल में किसी को अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े।
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