कंगना रनौत ने पीएम मोदी को बताया 'नारीवाद का ध्वजवाहक', विपक्ष की आपत्तियों पर तीखा पलटवार।
भारतीय संसदीय इतिहास में अप्रैल 2026 का यह विशेष सत्र एक युगांतरकारी घटना के रूप में दर्ज होने जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा पेश किए
- नारी शक्ति वंदन और परिसीमन का महासंग्राम: संसद के विशेष सत्र में छिड़ी वर्चस्व की जंग
- ऐतिहासिक मोड़ पर महिला आरक्षण: 2029 की चुनावी बिसात और 850 सीटों वाली नई लोकसभा का खाका
भारतीय संसदीय इतिहास में अप्रैल 2026 का यह विशेष सत्र एक युगांतरकारी घटना के रूप में दर्ज होने जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' और उससे जुड़े परिसीमन विधेयक ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। संसद के इस विशेष सत्र का मुख्य उद्देश्य उन बाधाओं को दूर करना है जो 2023 में पारित मूल महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन को रोक रही थीं। सरकार ने अब संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया है, जिसके माध्यम से लोकसभा की सीटों की संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इस विधायी कदम का सीधा उद्देश्य यह है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करते समय पुरुष सदस्यों की मौजूदा सीटों में कोई कटौती न करनी पड़े। हालांकि, इस प्रस्ताव ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक गहरी वैचारिक खाई पैदा कर दी है, जहाँ एक पक्ष इसे 'ऐतिहासिक उपहार' बता रहा है, तो दूसरा इसे 'चुनावी स्टंट' करार दे रहा है। सदन के भीतर चल रही इस तीखी बहस में बॉलीवुड अभिनेत्री और नवनिर्वाचित सांसद कंगना रनौत ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए सरकार का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर सराहना की और उन्हें भारतीय राजनीति में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाला सबसे बड़ा योद्धा बताया। कंगना ने तर्क दिया कि पिछले सात दशकों में जो काम अधूरा रहा, उसे मोदी सरकार ने केवल दस वर्षों में धरातल पर उतारने का साहस दिखाया है। उन्होंने इस विधेयक को प्रधानमंत्री की ओर से देश की करोड़ों महिलाओं के लिए एक ऐसा तोहफा बताया जो आने वाली पीढ़ियों की किस्मत बदल देगा। कंगना ने विपक्ष पर तंज कसते हुए कहा कि जब नियत साफ हो, तभी इस तरह के क्रांतिकारी निर्णय लिए जा सकते हैं। उनके इस भाषण ने सत्ता पक्ष के खेमे में नया उत्साह भर दिया, जबकि विपक्षी सांसदों ने उनकी बातों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया।
विपक्ष की मुख्य आपत्ति महिला आरक्षण के सिद्धांत से नहीं, बल्कि इसके क्रियान्वयन के लिए अपनाई जा रही 'परिसीमन' (Delimitation) की प्रक्रिया से है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक (DMK) जैसे प्रमुख दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार परिसीमन की आड़ में देश के चुनावी भूगोल को अपनी सुविधा के अनुसार बदलना चाहती है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करना उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्य। विपक्ष ने मांग की है कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को अधिकार देना चाहती है, तो इसे बिना किसी शर्त के तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। जनगणना और परिसीमन की पेचीदगियों में इसे उलझाना केवल समय बिताने की एक चाल है ताकि 2029 के चुनावों तक इस मुद्दे को भुनाया जा सके। 850 सीटों वाली प्रस्तावित नई लोकसभा में राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें आरक्षित करने की योजना है। इसमें से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इस संशोधन को पारित करने के लिए सरकार को सदन में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान गठबंधन राजनीति के दौर में एक बड़ी चुनौती है। सदन में गृह मंत्री और कानून मंत्री ने विपक्ष की चिंताओं का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि परिसीमन एक संवैधानिक आवश्यकता है। सरकार का तर्क है कि बिना निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे से निर्धारण के, महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण हो सकता है। सरकार ने आश्वासन दिया कि दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं का पूरा सम्मान किया जाएगा और सीटों के विस्तार में एक ऐसा संतुलन बनाया जाएगा जिससे किसी भी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कम न हो। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि 1971 की जनगणना के आधार पर जो सीटों की संख्या जमी हुई थी, उसे अब आधुनिक भारत की बढ़ती आबादी और आकांक्षाओं के अनुरूप बदलना अनिवार्य है। यह बहस केवल एक कानून के बारे में नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप को तय करने वाली है।
कंगना रनौत ने चर्चा के दौरान विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश और अन्य छोटे राज्यों में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब तक नीति निर्धारण की मेज पर महिलाएं पर्याप्त संख्या में नहीं होंगी, तब तक वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। उन्होंने विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे 'ओबीसी कोटा' के मुद्दे पर भी पलटवार किया और कहा कि प्रधानमंत्री मोदी स्वयं पिछड़े समाज से आते हैं और उन्होंने हमेशा समावेशी विकास की बात की है। कंगना के अनुसार, विपक्ष केवल विभाजनकारी राजनीति कर रहा है ताकि एक महान कार्य में बाधा डाली जा सके। उनके इस आक्रामक रुख ने सोशल मीडिया से लेकर संसद के गलियारों तक एक नई चर्चा छेड़ दी है, जहाँ लोग उनके फिल्मी अंदाज और राजनीतिक परिपक्वता के बीच तुलना कर रहे हैं। इस पूरे विधायी घटनाक्रम के बीच देश की आधी आबादी की नजरें संसद की कार्यवाही पर टिकी हैं। महिला संगठनों और नागरिक समाज ने इस बात का स्वागत किया है कि अंततः महिला आरक्षण पर एक निश्चित समय सीमा तय की जा रही है। हालांकि, परिसीमन के साथ इसे जोड़ने से जो तकनीकी पेचीदगियां पैदा हुई हैं, उन्हें लेकर संशय अभी भी बना हुआ है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में 1950 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव होगा। संसद के विशेष सत्र के शेष दिनों में मतदान की प्रक्रिया संपन्न होनी है, जिसके लिए बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने अपने सांसदों को व्हिप जारी कर दिया है। यह देखना रोमांचक होगा कि क्या सरकार विपक्षी दलों के कुछ धड़ों को अपने पाले में लाने में सफल होती है या यह बिल एक बार फिर राजनीतिक रस्साकशी का शिकार हो जाता है।
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