New Delhi: डॉ. बीरबल झा: शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन की कहानी
डॉ. झा सिर्फ मंचों तक सीमित नहीं हैं। वे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी बेहद सक्रिय हैं। अपने पोस्ट्स के जरिए वे शिक्षा, सामाजिक न्याय और सांस्कृति...
By INA News New Delhi.
नई दिल्ली: भीड़ से अलग चलने वालों की पहचान समय खुद करता है। बिहार के मधुबनी जिले से निकलकर राष्ट्रीय फलक पर चमके डॉ. बीरबल झा आज शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम बन चुके हैं। ब्रिटिश लिंगुआ के संस्थापक, 'पागमैन ऑफ इंडिया' और "यंगेस्ट लिविंग लीजेंड ऑफ मिथिला" जैसे उपाधियों से सम्मानित डॉ. झा का जीवन संघर्ष, समर्पण और सेवा की मिसाल है।
- शुरुआत एक सपने से सन् 1993, पटना से
अधिकांश युवा रोजगार के लिए दिल्ली और मुंबई का रुख कर रहे थे, वहीं डॉ. झा ने तय किया कि वे बिहार में रहकर ही कुछ नया करेंगे। अंग्रेजी भाषा, जिसे आमतौर पर उच्च वर्ग की भाषा माना जाती था, उसे गरीब और वंचित तबकों तक पहुँचाने का उन्होंने संकल्प लिया। इसी संकल्प से जन्म हुआ ‘ब्रिटिश लिंगुआ’ का — एक संस्थान जो आज चार लाख से अधिक युवाओं को भाषा और जीवन कौशल की ट्रेनिंग दे चुका है। "अगर भाषा सुलभ होगी तो अवसर भी सुलभ होंगे," यह डॉ. झा का मूलमंत्र रहा है।
- मिथिला के गौरव 'पाग' को दी नई पहचान
सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, डॉ. झा ने सांस्कृतिक संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मिथिला की पहचान, सम्मान और आत्मगौरव का प्रतीक 'पाग' जब धीरे-धीरे विस्मृत हो रहा था, तब डॉ. झा ने "मिथिला पाग अभियान" की शुरुआत की।
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उनके अथक प्रयासों का नतीजा रहा कि उनके 'बचाओ अभियान' के फलस्वरूप 2017 में भारतीय डाक विभाग ने 'मिथिला पाग' पर विशेष डाक टिकट जारी किया। आज मिथिला पाग सिर्फ एक पारंपरिक पहनावा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका है। इस उपलब्धि ने उन्हें 'पागमैन ऑफ इंडिया' का दर्जा दिलाया।
- साहित्य से समाज को दिशा
डॉ. बीरबल झा ने अब तक 30 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। उनकी चर्चित किताबें "सेलिब्रेट योर लाइफ " और "स्पोकेन इंग्लिश किट " युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी लेखनी में सहजता है, जीवन के व्यावहारिक पक्षों को छूने की शक्ति है।उनकी किताबें महज़ भाषा सिखाने का जरिया नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच विकसित करने का साधन हैं। एक शिक्षक के रूप में वे न केवल भाषा का ज्ञान देते हैं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।
- सम्मानों की लंबी श्रृंखला
डॉ. झा के कार्यों को व्यापक स्तर पर सराहा गया है। उन्हें मिथिला विभूति पुरस्कार (2022), शिक्षा शिखर सम्मान (2023), ग्लोबल स्किल्स ट्रेनर अवार्ड (2022) और कवि कोकिल विद्यापति पुरस्कार (2022) जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2025 में उन्हें अंग्रेजी साहित्य रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया जाना है। लेकिन इन सभी पुरस्कारों से अधिक उनके लिए मायने रखता है — लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना।
- 'विकसित भारत, विकसित बिहार' की पहल
डॉ. झा आज "विकसित भारत, विकसित बिहार" अभियान के जरिये युवाओं को एकजुट कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर बिहार को विकसित बनाना है तो शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास को गाँव-गाँव तक पहुँचाना होगा। इस अभियान के माध्यम से वे बिहार के युवाओं में नई ऊर्जा, आशा और जिम्मेदारी का संचार कर रहे हैं। "बिहार बदल सकता है, अगर बिहार का युवा बदलने को तैयार हो," वे अक्सर अपने संबोधनों में कहते हैं।
- सोशल मीडिया से भी जुड़ी जनता की नब्ज
डॉ. झा सिर्फ मंचों तक सीमित नहीं हैं। वे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी बेहद सक्रिय हैं। अपने पोस्ट्स के जरिए वे शिक्षा, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े मुद्दों को उठाते हैं और युवाओं को संवाद के लिए प्रेरित करते हैं।
- दिल्ली में रहते हुए भी दिल बिहार में
आज भले ही डॉ. झा दिल्ली में रह रहे हों, लेकिन उनका दिल बिहार और मिथिला में ही धड़कता है। वे मानते हैं कि उनकी पहचान मिथिला की माटी से ही है। वे आज भी हर बड़े फैसले में अपनी जड़ों से सलाह लेते हैं — अपनी मिट्टी से जुड़ी संवेदनाओं को कभी पीछे नहीं छोड़ते।
- अंतिम शब्द
डॉ. बीरबल झा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छा प्रबल हो, लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो, तो कोई भी व्यक्ति समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उनकी कहानी प्रेरित करती है, सिखाती है और एक बेहतर भारत की कल्पना को वास्तविकता में बदलने का सपना दिखाती है। "जहाँ शिक्षा का उजाला है, वहाँ भविष्य का उजाला है," — डॉ. बीरबल झा के जीवन से यही संदेश गूंजता है।
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