Special : डिजिटल मृगतृष्णा और प्रेम का बदलता स्वरूप- आँखों से जिस्म तक का सफ़र
शुरुआत एक गहरे और पवित्र रिश्ते के वादे से होती है, लेकिन बहुत जल्द ही लड़कों की मानसिकता इस बात पर आकर टिक जाती है कि इस रिश्ते को सिर्फ 'पवित्रता की सीमा' में क्यों बांधकर रखा जाए? क्यों न इस प्रेम को कोई 'नया आयाम' दिया जाए, कोई 'प्रै
हम आज एक ऐसे अत्याधुनिक और पूरी तरह से डिजिटल हो चुके परिवेश में जी रहे हैं, जहाँ तकनीक ने दूरियों को तो कम किया है, लेकिन दिलों के बीच की गहराई को सोख लिया है। आज की युवा पीढ़ी 'बदलती सोच' और 'आधुनिकता' के आकर्षक स्लोगन्स (नारों) की आड़ में कुछ ऐसे कारनामों को अंजाम देने में जुटी है, जो समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। मामला चाहे किसी दफ्तर या कॉलेज में खुद को सबसे आगे दिखाने का हो, या फिर सोशल मीडिया पर खुद को अत्यधिक 'स्मार्ट' और 'कूल' साबित करने का युवा पीढ़ी येन-केन-प्रकारेण (किसी भी हद तक जाकर) खुद को अव्वल साबित करने की अंधी दौड़ में शामिल है।
इसी आधुनिकता की सबसे बड़ी गाज गिरी है 'प्रेम' जैसे एक अत्यंत पवित्र, निश्छल और शाश्वत बंधन पर। ऐतिहासिक रूप से प्रेम की यात्रा आँखों के रास्ते दिल में उतरने और आत्मा के मिलन पर पूरी होती थी, लेकिन आज के इस प्रोग्रेसिव ज़माने में इसका अंतिम पड़ाव केवल शारीरिक आनंद की चरम सीमा तक ही सीमित होकर रह गया है।
स्थिति यह हो चुकी है कि यदि किसी प्रेम संबंध में शारीरिक सुख या 'कैजुअल रिलेशनशिप' का पहलू शामिल नहीं है, तो आज के युवाओं की नज़र में वह प्रेम 'निठल्ला' और 'बैकवर्ड' मान लिया जाता है। दुनिया की बात तो छोड़िए, आज का युवा अपने ही दोस्तों के बीच तब तक 'स्मार्ट' नहीं समझा जाता, जब तक वह ऐसे अनुभवों का हिस्सा न हो। इसी विकृत सोच को अपना आदर्श मानकर आज की पीढ़ी रिश्तों में केवल छल, कपट और धोखेबाजी का जाल बुन रही है।
कोमल हृदयों का शिकार और 'एक्स' (Ex) संस्कृति का चलन
आज के इस डिजिटल और फास्ट-फॉरवर्ड ज़माने में भी बेटियाँ और लड़कियाँ स्वभाव से भावुक और हृदय से कोमल होती हैं। वे जब किसी से जुड़ती हैं, तो उसमें अपना सर्वस्व और एक सुरक्षित भविष्य देखती हैं। लेकिन आज के आधुनिक और अति-उत्साही लड़के उनकी इसी कोमलता और विश्वास का भरपूर फायदा उठाते हैं।
शुरुआत एक गहरे और पवित्र रिश्ते के वादे से होती है, लेकिन बहुत जल्द ही लड़कों की मानसिकता इस बात पर आकर टिक जाती है कि इस रिश्ते को सिर्फ 'पवित्रता की सीमा' में क्यों बांधकर रखा जाए? क्यों न इस प्रेम को कोई 'नया आयाम' दिया जाए, कोई 'प्रैक्टिकल' किया जाए? इस कुत्सित (घिनौनी) और वासना से भरी सोच के चलते, वे लड़की की आँखों में तैरते सच्चे प्रेम का सहारा लेकर उसे शारीरिक सुख के समुद्र में गोता लगाने के लिए मजबूर या राजी कर लेते हैं।
जैसे ही शारीरिक इच्छा पूरी होती है, वैसे ही प्रेम का वह छलावा गायब हो जाता है। इसके बाद शुरू होता है दोस्तों के बीच उस लड़की को अपनी 'एक्स' (Ex) बताकर डींगें हांकने का सिलसिला। एक का शिकार पूरा होते ही, नई लड़की को जाल में फंसाने का खेल शुरू हो जाता है। विडंबना देखिए कि शादी की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते आज के कई हवशी युवा न जाने कितनी शारीरिक यात्राएँ कर चुके होते हैं और इसे अपनी मर्दानगी या अचीवमेंट समझते हैं।
इस पतन के मुख्य कारण: सिनेमा, अकेलापन और अभिभावकों की व्यस्तता
यदि हम उन तथ्यों पर गहराई से विचार करें जिनके कारण आज समाज में यह भयावह स्थिति पैदा हुई है, तो इसके पीछे हमारी आधुनिक सोसाइटी और आज का सिनेमा (ओटीटी प्लेटफॉर्म्स सहित) सबसे बड़े जिम्मेदार दिखाई देते हैं। युवाओं की अपनी कुंठित सोच तो उन्हें इन अनैतिक कार्यों के लिए उकसाती ही है, रही-सही कसर भारतीय सिनेमा और इंटरनेट पर परोसा जा रहा कंटेंट पूरा कर देता है। उत्तेजक चित्र, अश्लील वेब सीरीज, रील्स और शॉर्ट फिल्म्स देखने की जो लत आज युवाओं को लग चुकी है, वह उन्हें लगातार इसी दिशा में सोचने पर मजबूर करती है।
इसके साथ ही, इस समस्या की एक बड़ी जड़ परिवारों के भीतर भी है। आज के अभिभावक (माता-पिता) अपनी अत्यधिक व्यस्त जीवनशैली और पैसों की दौड़ के कारण अपनी संतानों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। इस संवादहीनता के कारण बच्चे खुद में एक गहरा अकेलापन महसूस करते हैं। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वे मोबाइल का दुरुपयोग करना शुरू करते हैं और अनजाने में ही उस आत्मघाती रास्ते पर चल पड़ते हैं, जहाँ उन्हें कभी नहीं जाना चाहिए था।
इसके बाद शुरू होता है अपने मोबाइल फोन को 'प्राइवेसी' (गोपनीयता) देने का नाटक पासवर्ड, हिडन चैट्स और न जाने क्या-क्या। अभिभावक अक्सर इसे बच्चों की प्राइवेसी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। धीरे-धीरे युवा निचली मानसिकता के उस गहरे दलदल में गिरते चले जाते हैं, जहाँ से वापस सामान्य और नैतिक जीवन में लौट पाना उनके लिए लगभग असंभव हो जाता है।
भविष्य का अंधकार, बेरोजगारी और राक्षसी प्रवृत्तियों का उदय
नतीजा यह होता है कि जिस २० साल की उम्र तक युवाओं को गहन शिक्षा, करियर और चरित्र निर्माण पर ध्यान देना चाहिए, उस उम्र में वे इन तमाम अनैतिक और वासनायुक्त खुराफातों के 'सरताज' बन बैठते हैं। आज जब युवा अपने फ्रेंड सर्किल (मित्र मंडली) में बैठते हैं, तो वहाँ योग्यता की तारीफ नहीं होती, बल्कि जिसने जितनी अधिक लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाए होते हैं, उसे उतना ही होनहार, परिपक्व और 'स्टड' माना जाता है। दुख की बात यह है कि माता-पिता का ध्यान इस भयानक चलन पर बिल्कुल नहीं जाता।
और बात सिर्फ कुंवारे युवाओं तक ही सीमित नहीं है; आज के वयस्क और विवाहित पुरुष भी इस विकृति और एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर्स (विवाहेतर संबंधों) के कुकृत्य से अछूते नहीं हैं। जब बड़े ही ऐसा उदाहरण पेश करेंगे, तो उनकी संतानों से सदाचार की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
आज देश में जो बेरोजगारी और युवाओं में भटकाव दिख रहा है, उसका एक बहुत बड़ा कारण यही है। देश का एक बड़ा युवा वर्ग अपनी पूरी ऊर्जा, समय और भविष्य की चमक को इसी 'अंधेरी कोठरी' (वासना और भटकाव) में झोंक रहा है। जब तक अभिभावक अपनी संतानों की गतिविधियों पर नजर नहीं रखेंगे, उनके साथ भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ेंगे और एक स्वस्थ नियंत्रण नहीं रखेंगे, तब तक इस स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
जो युवा शारीरिक यात्रा को ही प्रेम की पूर्णता और जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं, उनका भविष्य भला कैसे उज्ज्वल हो सकता है? जब तक परिवार और समाज इस विषय पर गंभीरता से आत्मचिंतन नहीं करेगा, तब तक संतानें देश का नाम रोशन नहीं कर पाएँगी।
यदि आज हमारे समाज में नैतिक चिंतन और आत्म-नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो गया, तो हमारा यह देश अंधकार के गर्त में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाएगा। एक समय ऐसा आएगा जब समाज में बौद्धिक और नैतिक प्रतिभाएं जन्म लेना ही बंद कर देंगी और मानवीय संवेदनाओं पर राक्षसी प्रवृत्तियां (वासना, स्वार्थ, और धोखा) हावी हो जाएंगी। यह स्थिति पूरे देश को बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और मानसिक कंगाली की ओर धकेल देगी।
यदि हमें अपनी युवा पीढ़ी और देश के गौरवशाली भविष्य को इस गर्त में गिरने से बचाना है, तो हम सभी को आज और इसी वक्त से गहन चिंतन करने की आवश्यकता है। हमें ऊपरी दिखावे से हटकर जड़ों को सींचना होगा। बच्चों को गैजेट्स (मोबाइल) से पहले अपना समय और संस्कार देने होंगे। क्योंकि यह सनातन सत्य हमेशा अटल रहेगा कि "हम बदलेंगे, युग बदलेगा; और हम सुधरेंगे, तो युग सुधरेगा।"
Also Click : Deoband : देवबंद में बिजली संकट- भीषण गर्मी में 17 घंटे तक आपूर्ति ठप, अधिकारियों की अनदेखी से जनता बेहाल
What's Your Reaction?




