Lakhimpur Kheri: यूपी के जंगलों में लौटी रौनक: इको-टूरिज्म बनी वन्यजीवों की सहेली, 161 करोड़ का मेगा प्लान। 

विश्व वन्यजीव संरक्षण दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के जंगलों और वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की तस्वीर बेहद सकारात्मक रूप

Dec 4, 2025 - 19:50
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Lakhimpur Kheri: यूपी के जंगलों में लौटी रौनक: इको-टूरिज्म बनी वन्यजीवों की सहेली, 161 करोड़ का मेगा प्लान। 
यूपी के जंगलों में लौटी रौनक: इको-टूरिज्म बनी वन्यजीवों की सहेली, 161 करोड़ का मेगा प्लान। 

लखीमपुर खीरी: विश्व वन्यजीव संरक्षण दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के जंगलों और वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की तस्वीर बेहद सकारात्मक रूप में सामने आई है। प्रदेश सरकार के प्रयासों से न सिर्फ दुर्लभ वन्य जीवों के सुरक्षित आवास मजबूत हुए हैं, बल्कि इको-टूरिज्म के विकास ने दुधवा से लेकर कतर्नियाघाट तक के जंगलों को प्रकृति प्रेमियों का नया पसंदीदा गंतव्य बना दिया है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि वन विभाग, सिंचाई विभाग तथा अन्य संबद्ध एजेंसियों के समन्वय से ऐसी व्यवस्थाएं तैयार की गई हैं, जो एक ओर पर्यावरण संरक्षण को मजबूती दे रही हैं और दूसरी ओर स्थानीय समुदाय को नई आजीविका का आधार भी बन रही हैं।

पिछले तीन वर्षों में इको-टूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड द्वारा 161 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च कर विभिन्न संरक्षित वन क्षेत्रों और प्राकृतिक स्थलों को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से विकसित किया गया है, जिसमें मार्ग सुधार, विश्राम स्थल, नेचर ट्रेल, बर्ड-वॉचिंग जोन, बच्चों के लिए एडवेंचर क्षेत्र, गजिबो और कैफेटेरिया जैसी सुविधाएं शामिल हैं। वित्तीय साल 2022-23 में 21.04 करोड़, 2023-24 में 68.56 करोड़ और 2024-25 में 72.30 करोड़ रुपए की स्वीकृतियों से यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार इको-टूरिज्म को प्राथमिकता सूची में शीर्ष स्थान दे रही है।

इसी दौरान वन विभाग के संरक्षण प्रयासों ने प्रदेश के जंगलों में वन्य प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज कराई है। वर्ष 2022 की रिपोर्ट के अनुसार दुधवा नेशनल पार्क में 65 हजार से अधिक, कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य में तकरीबन 12 हजार और बफर जोन में 14 हजार से ज्यादा वन्य जीव रिकॉर्ड किए गए थे। नवीनतम 2025 के सर्वेक्षण ने इस वृद्धि को और गति देता दिखाया है, जिसमें दुधवा टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की संख्या बढ़कर 1.13 लाख से ऊपर, कतर्नियाघाट में 17 हजार से अधिक और बफर क्षेत्र में करीब 15 हजार के आसपास पहुंच चुकी है। दुर्लभ प्रजातियों में भी बड़ा उछाल देखा गया है—2022 में 92 की संख्या वाला गुलदार/तेंदुआ 2025 में बढ़कर 275 तक पहुंच गया है, वहीं गैंडा भी 49 से बढ़कर 66 की संख्या पर दर्ज किया गया है।

दुधवा, पीलीभीत, कतर्नियाघाट, अमानगढ़ और सोहगीबरवा जैसे क्षेत्र अब पर्यटकों को न सिर्फ प्राकृतिक सुंदरता, बल्कि बेहतर प्रबंधन और सुरक्षित वन्यजीव दर्शन का भी भरोसा दे रहे हैं। तराई, ब्रज, बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र में जैव-विविधता संरक्षण की दिशा में किए गए कामों का असर प्रदेश की वन संपदा पर स्पष्ट दिखाई देता है। ‘विकसित उत्तर प्रदेश 2047’ कार्यशाला में भी इको-टूरिज्म को भविष्य की विकास रणनीति में प्रमुख स्थान दिया गया है, जिसके तहत वेटलैंड्स व वन्यजीव क्षेत्रों में हरित नेटवर्क विकसित करना, जंगलों को प्लास्टिक मुक्त बनाना और स्थायी पर्यटन मॉडल को लागू करना आगामी योजनाओं में शामिल है।

पर्यटन मंत्री ने बताया कि दुधवा, पीलीभीत और कतर्नियाघाट क्षेत्रों में प्रशिक्षित नेचर गाइड्स की तैनाती की गई है, जिससे सैलानियों को वैज्ञानिक ज्ञान के साथ रोचक जानकारी भी उपलब्ध हो सके। थारू जनजाति को पर्यटन से जोड़ने की दिशा में सरकार की पहलें भी प्रभाव दिखा रही हैं—उनके पारंपरिक भोजन, संस्कृति और जीवनशैली को पर्यटन आकर्षण का हिस्सा बनाया जा रहा है, साथ ही स्थानीय ग्रामीणों को होम स्टे योजना से जोड़कर आय में वृद्धि के अवसर दिए जा रहे हैं।

सरकार का लक्ष्य है कि वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन एक-दूसरे के पूरक बनकर प्रदेश के समग्र विकास का आधार बनें। प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए, स्थानीय समुदाय को मजबूत कर और पर्यटकों को विश्वस्तरीय सुविधाएं प्रदान कर उत्तर प्रदेश आने वाले वर्षों में देश का प्रमुख इको-टूरिज्म हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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