संसद में गूँजी बच्चों की डिजिटल लत की गूँज: दीपेंद्र हुड्डा ने सोशल मीडिया और ऑनलाइन सट्टेबाजी के खिलाफ सख्त कानून की मांग की।

संसद की कार्यवाही के दौरान सांसद हुड्डा ने विस्तृत आंकड़ों और शोध का हवाला देते हुए बताया कि आज के दौर में बच्चे अपना कीमती समय

By INA News Desk
Mar 28, 2026 - 13:29
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संसद में गूँजी बच्चों की डिजिटल लत की गूँज: दीपेंद्र हुड्डा ने सोशल मीडिया और ऑनलाइन सट्टेबाजी के खिलाफ सख्त कानून की मांग की।
संसद में गूँजी बच्चों की डिजिटल लत की गूँज: दीपेंद्र हुड्डा ने सोशल मीडिया और ऑनलाइन सट्टेबाजी के खिलाफ सख्त कानून की मांग की।
  • रील्स और वीडियो की लत से बढ़ रहा अवसाद और चिंता: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शून्यकाल में उठाए गए इस विषय को बताया अत्यंत महत्वपूर्ण
  • ऑनलाइन 'एविएटर' जैसे खेलों पर प्रतिबंध की तैयारी? सरकार ने दिया ठोस कदम उठाने का भरोसा, आयु सीमा और स्क्रीन टाइम पर बनेगा नया नियम

संसद की कार्यवाही के दौरान सांसद हुड्डा ने विस्तृत आंकड़ों और शोध का हवाला देते हुए बताया कि आज के दौर में बच्चे अपना कीमती समय रचनात्मक कार्यों के बजाय घंटों तक रील्स और छोटे वीडियो देखने में व्यर्थ कर रहे हैं। इस अनियंत्रित डिजिटल उपभोग के कारण बच्चों में 'स्क्रीन एडिक्शन' यानी मोबाइल की लत एक महामारी की तरह फैल रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस समस्या का सीधा प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जिससे उनमें नींद की कमी, बेवजह की चिंता, गहरा अवसाद और किसी भी कार्य पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में भारी गिरावट देखी जा रही है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से कमजोर और शारीरिक रूप से सुस्त हो सकती है।

डिजिटल लत के साथ-साथ सांसद ने ऑनलाइन सट्टा आधारित गेम्स के बढ़ते मकड़जाल पर भी कड़ा प्रहार किया। उन्होंने विशेष रूप से 'एविएटर' जैसे खतरनाक खेलों का उल्लेख किया, जो युवाओं को रातों-रात अमीर बनने का लालच देकर जुए की प्रवृत्ति की ओर धकेल रहे हैं। यह आरोप लगाया गया कि फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे बड़े वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे सट्टेबाजी वाले गेम्स का प्रचार खुलेआम और धड़ल्ले से किया जा रहा है। इन विज्ञापनों का एल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वे किशोरों और युवाओं को अपना शिकार बनाते हैं। उन्होंने सरकार से मांग की कि इन प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय की जाए और ऐसे भ्रामक विज्ञापनों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए जो युवाओं को वित्तीय और मानसिक बर्बादी की ओर ले जा रहे हैं।

सांसद ने अपने संबोधन में साइबर दुनिया के अन्य खतरों जैसे साइबर बुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न और डेटा गोपनीयता की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों का भी जिक्र किया। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे अपनी कम उम्र और नासमझी के कारण अक्सर ऑनलाइन ठगी और उत्पीड़न का शिकार हो जाते हैं, जिसका उनके कोमल मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने पहले ही बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग की आयु-सीमा निर्धारित कर दी है, जबकि चीन ने बच्चों के स्क्रीन टाइम पर सख्त सीमाएं लागू कर दी हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में, जहाँ इंटरनेट की पहुँच बहुत तेजी से बढ़ी है, ऐसे वैश्विक मानकों को अपनाना अब एक विकल्प नहीं बल्कि जरूरत बन गया है।

डिजिटल लत के मनोवैज्ञानिक प्रभाव

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल मीडिया पर लगातार मिलने वाली 'लाइक्स' और 'व्यूज' बच्चों के मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का स्राव बढ़ाती हैं, जो एक प्रकार के नशे के समान है। इससे बच्चों में धैर्य की कमी हो जाती है और वे वास्तविक सामाजिक संवाद के बजाय आभासी दुनिया को ही अपनी हकीकत मानने लगते हैं। यह स्थिति दीर्घकाल में व्यक्तित्व विकास में बाधक बनती है।

सदन में इस महत्वपूर्ण पहल की सराहना करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शून्यकाल के दौरान इसी तरह के राष्ट्रव्यापी और भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषय उठाए जाने चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि यह समस्या हर घर की है और इस पर सामूहिक विचार-विमर्श की आवश्यकता है। सदन की भावना और विषय की गंभीरता को देखते हुए सरकार की ओर से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है। सरकारी प्रतिनिधियों ने सदन को भरोसा दिलाया कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। मंत्रालय इस दिशा में पहले से ही शोध कर रहा है और जल्द ही नए दिशा-निर्देश या कानून का मसौदा तैयार किया जा सकता है।

हुड्डा ने सरकार के समक्ष जो मुख्य मांगें रखीं, उनमें सबसे प्रमुख एक स्पष्ट और व्यापक 'राष्ट्रीय डिजिटल सुरक्षा कानून' का निर्माण है। इस प्रस्तावित कानून में आयु सत्यापन की एक फूलप्रूफ प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि कम उम्र के बच्चे प्रतिबंधित कंटेंट और प्लेटफॉर्म्स तक न पहुँच सकें। साथ ही, उन्होंने सुझाव दिया कि ऐप्स और वेबसाइट्स के लिए सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया जाए और बच्चों के लिए दैनिक स्क्रीन टाइम की एक सीमा निर्धारित की जाए, जिसके बाद ऐप अपने आप काम करना बंद कर दे। उन्होंने कहा कि तकनीक का विकास अनिवार्य है, लेकिन वह विकास बच्चों की मासूमियत और उनके स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

संसद में हुई इस चर्चा का असर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और टेक कंपनियों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। अब तक ये कंपनियां स्व-नियमन की बात करती रही हैं, लेकिन सरकार के कड़े रुख के बाद उन्हें अपनी नीतियों में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है। यदि भारत सरकार आयु सीमा और स्क्रीन टाइम जैसे प्रावधानों को कानूनी रूप देती है, तो यह वैश्विक टेक दिग्गजों के लिए एक बड़ा संदेश होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा गोपनीयता और ऑनलाइन सुरक्षा के नए नियमों से बच्चों को इंटरनेट के काले साये से बचाया जा सकेगा। अभिभावकों ने भी इस पहल का स्वागत किया है और वे एक ऐसे तंत्र की उम्मीद कर रहे हैं जो उनके बच्चों को डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रख सके।

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