कर्षति आकर्षति इति कृष्णः

Aug 28, 2024 - 15:59
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कर्षति आकर्षति इति कृष्णः

!!कर्षति आकर्षति इति कृष्णः!!

डॉ.अतुल मोहन सिंह

कृष्ण के अनंत स्वरूप हैं। अपनी अपनी मूल प्रकृति के अनुसार भारत की हर भाषा, हर बोली, हर सांस्कृतिक-समूह, हर उपासना पद्धति, हर प्रान्त-जनपद ने कृष्ण को बारम्बार सुमिरा है। हर दर्शन परम्परा, हर एक आयातित निर्यातित विचारधारा ने कृष्ण को येन केन प्रकारेण भजा है। अद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत हो या आधुनिक लेफ्टिस्म, फेमिनिज्म़ जैसे वाद। कृष्ण का संक्रामक आकर्षण सबको है। शांकर दार्शनिकों को लुभाता कृष्ण-काली ऐक्य हो या राधा-कृष्ण अद्वैत हो।

तनिक स्त्रैण सौंदर्य वाले, तीन माताओं वाले सौभाग्यशाली त्रयम्बक 'मम्मास् ब्वाय' मातृशक्तियों को लुभाते हैं। तो एंटी इस्टेब्लिशमैंट प्रकृति वालों को इन्द्र, वरुण, कुबेर, अग्नि, ब्रह्मा, काम, नाग का मानमर्दन करने वाले क्रांतिकारी देवदमन श्रीकृष्ण पसंद आते हैं। नागरों को द्वारिकाधीश, ग्राम्यों को गोकुल का लल्ला, बौद्धिकों को गीता-गीतकार, प्रेमियों को राधावल्लभ, नीतिज्ञों को महाभारत-सूत्रधार पसंद हैं। संगीत-रस मर्मज्ञ वंशी पर मोहित हैं, टैगोर कह चुके 'तोमार वांशि आमार प्राणे बेजे छे'। मल्ल योद्धा को चाणूर-मुष्टिक मर्दनम् पर आसक्ति है। और सुकुमारियों के आकर्षण पर कहने ही क्या।

अनासक्त योगीश्वर महादेव तक तो आसक्त हैं। यशोदा का आदेशात्मक स्वर पहचानिए शिव के लिए, "जब-जब मेरौ लाला रोबै,तब-तब दरसन दीजै।" मिथक और इतिहास की परिधि से बहुत बाहर कृष्ण का एक रूप भारत भाव-रूप भी है। गोप संस्कृति का गोपाल दक्षिण में कण्णन है। भारतीय कलाओं का मादन-मोहन-रमण-आकर्षण तत्व उड़िया में जगन्नाथ है। वही दक्षिण में तिरुपति, वेणुगोपाल और वरदराज हैं तो उत्तराखंड में बदरीनाथ हैं। मराठों के बिठोवा गर्वीले गुजरातियों के द्वारकानाथ और राजपूताने में श्रीनाथ हैं।

कृष्ण के राष्ट्र-नायक स्वरूप और राष्ट्र-निर्माण की रचना प्रक्रिया को समझना होगा। युगधर्म का यही संदेश है। ध्यान रहे कि उस समय अश्वमेध राजसूय आदि यज्ञ श्रेष्ठता की स्वीकृति थे कोई स्वामित्व या दास्य बोध नहीं। कब्जा करने की परिपाटी तो संभवतः मगध के नन्द वंश से शुरू हुई। उसके पहले एक राज्य की पहचान उसके देवता, ध्वज, संस्कृति, गुरू, भोजन शैली, समृद्धि, कला आदि से अधिक थी भौगोलिक स्थिति से कम। एक तरफ जैसे जैसे सरस्वती का जल सूखता जाता है वैसे ही मगध और मथुरा की शत्रुता और प्रगाढ़ होती जाती है।

हिरण्यवती की स्वामिनी अन्नवती सरस्वती के प्रवाह-क्षेत्र में क्रमशः आती रिक्तता के कारण एक बड़ी जनसंख्या गंगा-आप्लावित भूभाग की तरफ शनैः शनैः 'पलायन' कर रही है। मथुरा और मगध के वैवाहिक संबंधों ने वैमनस्य कम जरूर किया है पर यह पर्याप्त नहीं। इस वैमनस्य के मूल में शक्ति असंतुलन है। मगध मध्य भारत के अपने यादव सहयोगियों चेदिराज (बुंदेलखंड), विदर्भराज भीष्मक, रूक्मी, करवीर-राज (कोल्हापुर) आदि के कारण अति महत्वाकांक्षी है।

दूसरी तरफ 'कुरु' राजवंश है जिसपर अनेक राजा रजवाड़ों रियासतों की भृकुटि पहले से ही टेढ़ी है। गांधार क्रुद्ध हैं कि अन्धे धृतराष्ट्र से गांधारी का विवाह उनके साथ विद्रूप छल है। उनका श्रेष्ठतम रणनीतिकार 'राजकुमार शकुनि' उसी छल के बदले के लिए हस्तिनापुर में ही विराज रहा है। काशीनरेश स्पष्टतः खिन्न और अप्रसन्न हैं कि उनकी तीन अनिंद्य सुंदरी राजकुमारियों को भीष्म अपहृत कर ले गए। अपहरण के बाद का अपमान तो किसी भी स्त्री का भयंकरतम भीषणतम अपमान होगा। कुरुवंश का अर्थ तंत्र 'आदिबद्री' से निकलने वाली वेदस्मृति सरस्वती पर निर्भर है। वेदवती सरस्वती की कलाएं दिन प्रतिदिन क्षीण हो रही हैं। मुख्य धारा के सूखने से इसकी सहायिकाएं  कालिन्दी यमुना और सदानीरा शतद्रु अर्थात सतलुज भी क्षीणकाय होती जा रही हैं। और क्षीण हो रही है 'कुरु' की आभा। एक जड़त्व घेर रहा है उसे।

उधर जड़मति किंकर्तव्यविमूढ 'पांचाल'! कभी यह कुरु और मगध के बीच 'बफर स्टेट' रहे। अभी इनकी स्थिति इन दो महाशक्तियों के बीच 'स्विंग स्टेट' की है। पर जैसा कि द्रौपदी के स्वयंवर के समय मागध सामंतों, राजकुमारों और राज्याश्रयी गुप्तचरों की उपस्थिति से सिद्ध होता है कि पांचाल अब मगध की तरफ झुकने लगे थे। तिस पर द्रोण द्वारा अपने पुराने मित्र पांचालनरेश को बलपूर्वक दण्डित करना। हालांकि इस दण्डित करने के प्रयास में पाण्डुपुत्र राजकुमार युधिष्ठिर एक अलग स्तर का राजनीतिक 'एक्यूमेन' प्रदर्शित करते हैं जब वह दुर्योधन के पांचालों द्वारा परास्त होने के बाद अर्जुन भीम के साथ बिना कुरु-वंश के ध्वज के लड़ते हैं।

यहाँ दो सगे वृष्णिवंशी भाई जो सहोदर भी हैं और नहीं भी। संकर्षण बलराम और कृष्ण जो महाविलासी अभिमानी कंस के भान्जे हैं अपने आततायी मामा का वध कर देते हैं। कृष्ण दोनों मामियों को ससम्मान गिरिव्रज (आधुनिक राजगीर) भेजते हैं। मथुरा में एक रिक्तता का निर्माण हो जाता है। नए राजा 'एक रबर स्टैम्प' हैं और बहुत हद तक 'प्रो-मगध साफ्ट पालिसी' रखते हैं।

उधर चालाक मगध मथुरा पांचाल और कुरु की वास्तविकता को समझता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार जरासन्ध मथुरा पर कुल सत्रह बार आक्रमण करता है। पर हलधर-चक्रधर वृष्णि-बंधु हर बार उसके आक्रमण को विफल करते हैं। अन्तिम अठारहवें आक्रमण की योजना जरा अलग है। पश्चिम से पर्शियन म्लेच्छराज कालयवन जो लूटपाट की नीयत रखता है और पूर्व से मागध जरासंध जो यदुकुल के विनाश और मथुरा पर अधिकार की मंशा रखता है, दोनों एक साथ आक्रमण करते हैं।

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'रणछोड़' तपस्वी मुचुकुन्द की सहायता से कालयवन का वध करते हैं फिर दोनों भाई दक्षिण दिशा में भाग लेते हैं। 'यदु' की प्रभाव सीमा के बाहर जाकर वह मगध के हितैषी करवीर-नरेश श्रगाल का वध करते हैं। मागध सैन्य-शक्ति से बचने छिपने के क्रम में दोनों भाई गोमांतक प्रदेश यानि कि आज के गोवा और कोंकण पहुंचते हैं। एक घनघोर तटीय वन में मागध सेना को घेर वहां आग लगा देते हैं।

हताश निराश जरासंध वापस मगध लौट जाता है। यहां से दक्षिणापथ मार्ग पर यह दोनों वृष्णिवंशी श्रीविद्यापरमाचार्य विष्णु के छठे अवतार 'जामदग्नेय परशुराम' से मिले। श्री हरिवंश के अनुसार तो कृष्ण को सुदर्शन चक्र भी यहीं परशुराम से ही प्राप्त हुआ। बार बार के आक्रमणों से प्रजा की रक्षा के लिए यदुकुल की राजधानी द्वारिका स्थानांतरित की गई। शूरसेन यादव पूरे सौराष्ट्र, पश्चिमी घाट, दक्खिनी पठार और सिंध तक फैल गए। बिल्कुल जैसा विस्तार बहुत बाद में मराठों का हुआ था एक बार।

यमुना सरस्वती का लगभग बंजर इलाका पांडवों को दिया और गंगा बेसिन रिजर्व का उपजाऊ क्षेत्र दुर्योधन ने अपने पास रखा था। यही समय था जब भारतीय राजनीति में इन दो वृष्णि वंशी भाइयों का शानदार पदार्पण हुआ। वाचाल छलिया अनुज को पता है कितना कैसे कहां कब बोलना है उधर महीधर अग्रज कब चुप रह जाना है यह जानते हैं, सुभद्रा हरण और महाभारत युद्ध इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

कृष्ण बलराम ने वंचित पाण्डवों के साथ सहृदयता का संबंध बना लिया। यहीं योगेश्वर श्रीकृष्ण को एक सुयोग्य 'निमित्तमात्र सव्यसाचिन्' भी मिल जाते हैं। यह वृष्णि-पाण्डव गठबंधन प्रजा की अभिलाषाओं के अनुरूप 'खाण्डव दाह' भी करते हैं। 'कृष्णार्जुन' से भयभीत अनार्य 'नाग' और असुर सिंधु घाटी की उपरी उपत्यकाओं की तरफ भागने को विवश होते हैं जहां 'तक्षक' के नेतृत्व में तक्षशिला नगर बसाया जाता है।

खाण्डवप्रस्थ की इस घटना के समय ही युद्ध बंदी 'मयासुर' को अभयदान देकर कृष्ण अनार्यों का भी हृदय जीत लेते हैं। इन्हीं अनार्यों के विश्वकर्मा के माध्यम से इंद्रप्रस्थ और द्वारिका का निर्माण कराया जाता है जो भारतीय स्थापत्य के अद्भुत उदाहरण बने। यह द्वारिका-इंद्रप्रस्थ गठबंधन वैसे तो माधवी राजनीतिक शैली थी पर इसे कृष्णार्जुनी आक्रमण समझा गया जो कुरु के विरोध तथा मगध के विकल्प के तौर पर उभर रही थी।

भ्रमित पांचाल सदा के लिए इनके साथ हो लिए। उधर जरासंध का प्रभाव अवन्तिका तक पहुंच रहा था जहां उसके पक्षधर विन्द और अनुविन्द का राज्य था। मगध कुरू और द्वारका को घेरने के प्रयास में था तो उधर कृष्ण ने विदर्भ की राजकुमारी रूक्मिणी, उज्जैन की राजकुमारी तथा अपने वंश की भी एक कन्या से विवाह संबंध बनाकर अपनी स्थिति बहुत मजबूत कर ली।

पाण्डव अभी भी कुरू वंश के ही भाग थे। तो,दुर्योधन भी कहां कम रणनीतिकार थे। मित्र कर्ण को अंग देश (उत्तरी बंगाल/उड़ीसा) ही क्यों दिया? क्योंकि मगध को वहाँ से नियंत्रित किया जा सकता था और सूर्यपुत्र कर्ण कलिंग में हुए एक द्वन्द युद्ध में पहले ही जरासन्ध को परास्त कर चुके थे। यहां से कृष्ण के राजनीतिक कौशल का असल खेल शुरू होता है।

कृष्ण अपने हर स्वरूप में अतुलनीय हैं पर थोड़ी 'पोएटिक फ्रीडम' के साथ उनकी तुलना चाणक्य या फिर गाडफादर-1 के डान कार्लियोन से कर सकते हैं। कृष्ण के उद्देश्य और द्वारिका-इन्द्रप्रस्थ धुरी के लिए तात्कालिक चुनौती थी कि मगध नरेश जरासंध को भारत के राजनीतिक परिदृश्य से सदा सदा के लिए हटा दिया जाए। यहाँ कृष्ण-अर्जुन-भीम की तिकड़ी ने लगभग वैसा ही गेम प्लान बनाया जैसा कि शिवाजी ने शाइस्ता खान के लाल महल में अंजाम दिया।

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जरासंध और भीम को द्वन्द युद्ध के लिए तैयार कर लेना एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक के ही वश की बात थी। लक्षणा में कहा जाए तो एक तरफ साठ हजार हाथियों के बल वाला वृद्ध जरासंध जिसकी मृत्यु का तरीका रहस्य है दूसरी तरफ दस हजार गजशक्ति युक्त युवा भीम जिसे आश्वस्त किया गया है कि जरासंध अपराजेय नहीं है क्योंकि कुछ वर्ष पहले कर्ण के हाथों वह पहले पराभव फिर क्षमादान प्राप्त कर चुका है। भीम के हाथों जरा की मृत्यु के बाद कृष्ण कामरूप (असम) के आततायी शासक नरकासुर को मारकर उसके पुत्र भगदत्त को वहां प्रतिष्ठित करते हैं। जरासंध के पुत्र सहदेव की भगिनी का विवाह सुंदर नकुल से कराने का प्रस्ताव भी होता है। पश्चात, पौंड्र प्रदेश (मध्य बंगाल) के नकलची राजा पौंड्रक का वध करते हैं।

चंद्रवंश और सूर्यवंश ने भी एक बड़े समय तक जिस यज्ञ के आयोजन का साहस न किया उस 'राजसूय' के लिए महाराज युधिष्ठिर कैसे तैयार हो गए? इस रहस्य के सूत्रधार भी कृष्ण ही थे। अर्जुन भीम सात्यकि धृष्टद्युम्न आदि के भुजबल कृष्ण के चातुर्य और युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा ने अंग को छोड़ समूचे पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र को अपना बना लिया। नागकन्या उलूपी, मणिपुर की चित्रांगदा आदि से अर्जुन के विवाहों ने भी इन्हें शक्ति दी। राजसूय के समय शिशुपाल वध ने इनकी शक्ति को आधिकारिक प्रतिष्ठा दी। दूसरे वृष्णि वंशीय शेषावतार संकर्षण की तीर्थयात्राओं ने भारत को और मजबूती से जोड़ने का काम किया। वह वर्तमान पाकिस्तान के अटक में सिन्धु-कुभा संगम तक गए।  

रोहिणीनन्दन सीरपाणी अपने प्रतिलोम सरस्वती यात्रा के क्रम में प्रभास, पृथुदक, त्रितकूप, बिंदुसर, चक्रतीर्थ नैमिष, विशाल, ब्रह्मतीर्थ, सरयू, हरिद्वार, गोंती, गंडकी,गया, शोणभद्र, विपाशा,परशुराम क्षेत्र,वेणा, पंपा, सप्तगोदावरी,दुर्गा देवी, त्रिगर्त, केरल,श्रीरंग, मदुरै, दण्डकारण्य, अर्या देवी, कांची, कावेरी, कामोष्णी, सेतुबंध, कृतमाला,पयोष्णी, ताम्रपर्णी, नर्मदा अनेकानेक स्थानों को एकसूत्र जोड़ते चले गए। सम्पूर्ण भारत और भारतवंशी उन वृष्णिवंशी भाइयों का ऋणी है। धूमधाम से इनका जन्मोत्सव मनाया जाए। शुभकामनाएं...

गोपिका-वृन्द-मध्यस्थं, रास-क्रीडा-स-मण्डलम्।
क्लम प्रसति केशालिं, भजेऽम्बुज-रूचि हरिम्।।

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