Deoband : वंदे मातरम अनिवार्य करने पर मदनी का कड़ा विरोध- धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला
अरशद मदनी के बयान में केंद्र सरकार के आदेश को बहुत दुखद और नागरिकों पर जबरन थोपा गया फैसला बताया गया। उन्होंने कहा कि यह फैसला पक्षपातपूर्ण है और संविधा
देवबंद। वंदे मातरम को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में इसके सभी छंदों को गाने और बजाने को अनिवार्य करने के केंद्र सरकार के फैसले का जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी और दूसरे गुट के महासचिव हकीमुद्दीन कासमी ने कड़ा विरोध किया है।
अरशद मदनी के बयान में केंद्र सरकार के आदेश को बहुत दुखद और नागरिकों पर जबरन थोपा गया फैसला बताया गया। उन्होंने कहा कि यह फैसला पक्षपातपूर्ण है और संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरा प्रहार है। उन्होंने कहा कि अब यह साफ हो गया है कि इन लोगों को देश की तरक्की और जनता की मुश्किलों से कोई सरोकार नहीं है, वे हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं। मदनी ने कहा कि उनका हर फैसला और काम इस बात पर टिका होता है कि चुनाव में कितना फायदा होगा। मदनी ने कहा कि वंदे मातरम का विवाद पुराना है। संसद में जब इस पर चर्चा हुई थी तब भी हमने अपना मत साफ कर दिया था। हमें किसी के वंदे मातरम गाने या किसी कार्यक्रम में इसकी धुन बजाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन हम मुसलमान इस गीत को इसलिए नहीं गा सकते क्योंकि हम सिर्फ एक अल्लाह की पूजा करते हैं और अपनी पूजा में किसी दूसरे को शामिल नहीं कर सकते।
जमीयत उलमा-ए-हिंद (महमूद मदनी गुट) के महासचिव मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने भी इसे चिंताजनक बताते हुए साफ कहा कि यह कदम भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता को खत्म करने वाला है। उन्होंने कहा कि भारत के संविधान में हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रसार करने और अपनी मान्यताओं के मुताबिक जीवन जीने का पूरा अधिकार दिया गया है। हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि वंदे मातरम के मूल में खासतौर पर चौथे और पांचवें छंद में मूर्ति पूजा और कुछ हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है। इस्लामी विश्वास में तौहीद (एक ईश्वरवाद) के चलते मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की पूजा या पूजा नहीं कर सकता और न ही ऐसी पूजा व्यक्त कर सकता है। उन्होंने भारत सरकार से संवैधानिक जरूरतों, न्यायिक उदाहरणों और देश के विविध सामाजिक ढांचे को ध्यान में रखते हुए जारी आदेश की जल्द समीक्षा करने की मांग की है।
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