रुझानों में 'खेला' जारी: भाजपा 170 सीटों के पार, तृणमूल कांग्रेस के कई मंत्रियों और दिग्गजों को लगा शुरुआती झटका।
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए हो रही मतगणना के शुरुआती दौर ने ही राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को हिलाकर
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए हो रही मतगणना के शुरुआती दौर ने ही राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने रुझानों में निर्णायक बढ़त हासिल करते हुए बहुमत के लिए आवश्यक 148 के आंकड़े को पार कर लिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, भाजपा फिलहाल 170 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस 110 सीटों के आसपास संघर्ष करती नजर आ रही है। यह पहली बार है जब बंगाल में भाजपा इतनी बड़ी और स्पष्ट बढ़त के साथ सत्ता के मुख्य द्वार पर खड़ी दिखाई दे रही है। राज्य के विभिन्न मतगणना केंद्रों से आ रहे नतीजे यह संकेत दे रहे हैं कि जनता ने इस बार बड़े पैमाने पर बदलाव के पक्ष में मतदान किया है। विशेष रूप से उत्तर बंगाल और जंगलमहल के क्षेत्रों में भाजपा की आंधी साफ तौर पर देखी जा सकती है, जहाँ उसने तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई है।
कोलकाता की हाई-प्रोफाइल भवानीपुर विधानसभा सीट पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा के फायरब्रांड नेता शुभेंदु अधिकारी के बीच जबरदस्त मुकाबला चल रहा है। मतगणना के शुरुआती दौर में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी पर लगभग 1,500 मतों की बढ़त बना ली थी, जिससे टीएमसी खेमे में खलबली मच गई थी। हालांकि, जैसे-जैसे ईवीएम के राउंड आगे बढ़े, ममता बनर्जी ने जबरदस्त वापसी की और चौथे राउंड के बाद वह 2,000 से अधिक मतों के अंतर से आगे निकल गई हैं। भवानीपुर में यह रस्साकशी पूरे राज्य के चुनावी मिजाज का प्रतिनिधित्व कर रही है, जहाँ एक-एक वोट की कीमत किसी बड़े राजनीतिक भविष्य को तय करने वाली साबित हो रही है। ममता बनर्जी के लिए यह सीट जीतना उनके मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की साख से जुड़ा हुआ है। जंगलमहल और उत्तर बंगाल के इलाकों में भगवा लहर ने तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है। दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कोचबिहार जैसे जिलों में भाजपा उम्मीदवारों ने बड़ी बढ़त बना ली है। वहीं जंगलमहल के पुरुलिया और बांकुरा में भी भाजपा पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। यहाँ आदिवासी समुदाय और स्थानीय युवाओं ने विकास और रोजगार के मुद्दों पर भाजपा के 'सोनार बांग्ला' के वादे पर भरोसा जताया है। मतगणना के रुझान यह भी बताते हैं कि भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने मतदाताओं के मन में सत्ता के प्रति असंतोष पैदा किया है, जिसका सीधा लाभ विपक्षी दल को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है।
दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना जिलों में भी इस बार मुकाबला त्रिकोणीय न होकर सीधा भाजपा और टीएमसी के बीच सिमट गया है। संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी संवेदनशील घटनाओं का असर इन जिलों की सीटों पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। महिला मतदाताओं का झुकाव इस बार सुरक्षा के मुद्दे पर बदला हुआ नजर आ रहा है, जो कभी ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता था। पानीहाटी सीट पर आरजी कर पीड़िता की मां, जो भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं, शुरुआती रुझानों में निर्णायक बढ़त बनाए हुए हैं। यह रुझान राज्य के भावनात्मक माहौल और सत्ता के प्रति बढ़ती नाराजगी को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। टीएमसी के जो नेता पहले अजेय माने जाते थे, वे अब अपने ही गढ़ में पिछड़ते नजर आ रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय 'तृणमूल भवन' में मतगणना के रुझानों को देखते हुए गंभीर चिंतन का दौर शुरू हो गया है। पार्टी के कई कद्दावर मंत्रियों जैसे शशि पांजा और उदयन गुहा के पिछड़ने की खबरें आ रही हैं, जिसने सत्ताधारी दल को हतप्रभ कर दिया है। ममता बनर्जी ने मतगणना से पहले ही अपने कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने और ईवीएम की सुरक्षा पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए थे। दूसरी ओर, भाजपा के प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाना और अबीर-गुलाल उड़ाना शुरू कर दिया है। हुगली और हावड़ा जैसे औद्योगिक बेल्ट में भी भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या में इजाफा किया है, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग भी इस बार बदलाव की राह पर है। पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में वामपंथी दलों और कांग्रेस की स्थिति एक बार फिर हाशिए पर जाती दिख रही है। सुबह से आ रहे रुझानों में सीपीएम महज एक सीट पर आगे चल रही है, जबकि कांग्रेस का खाता खुलता भी नजर नहीं आ रहा है। यह स्पष्ट करता है कि बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह से दो-ध्रुवीय हो चुकी है, जहाँ मुख्य लड़ाई केवल 'दीदी' और 'दादा' (भाजपा के नेतृत्व) के बीच ही सिमट गई है। तीसरे मोर्चे की अनुपस्थिति ने भाजपा के लिए सीधे मुकाबले की राह आसान कर दी है, जिससे मतों का बिखराव रुक गया और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। बंगाल का मतदाता अब किसी भी अस्पष्ट जनादेश के बजाय एक मजबूत विकल्प की ओर बढ़ता दिख रहा है।
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