Sambhal: जकात और सदका-ए-फ़ित्र: इबादत की पाकीज़गी और समाजी बराबरी का पैग़ाम।
रमज़ान-उल-मुबारक के मुक़द्दस महीने में जकात और सदका-ए-फ़ित्र को लेकर लोगों के बीच अक्सर सवाल उठते हैं। इन्हीं अहम सवालों
उवैस दानिश, सम्भल
सम्भल: रमज़ान-उल-मुबारक के मुक़द्दस महीने में जकात और सदका-ए-फ़ित्र को लेकर लोगों के बीच अक्सर सवाल उठते हैं। इन्हीं अहम सवालों पर रोशनी डालते हुए कारी गुलजार अशरफ ने जकात और सदका-ए-फ़ित्र की अहमियत, मक़सद और उसके सही तरीक़े को आसान लफ़्ज़ों में समझाया।
कारी गुलजार अशरफ ने बताया कि इस्लाम के पाँच बुनियादी उसूल (अरकान) हैं—नमाज़, रोज़ा, हज, जकात और तौहीद। इनमें जकात एक अहम फ़र्ज़ इबादत है, जो हर उस शख़्स पर वाजिब होती है जो मालिक-ए-निसाब हो। मालिक-ए-निसाब वह इंसान कहलाता है जिसके पास साढ़े 52.5 तोला चांदी, साढ़े 7.5 तोला सोना या इसके बराबर की कोई रकम या माल मौजूद हो। जकात साल में एक बार अदा की जाती है और अक्सर लोग इसे रमज़ान में इसलिए निकालते हैं, क्योंकि इस महीने में जकात देने से सवाब कई गुना बढ़ जाता है। वहीं सदका-ए-फ़ित्र के बारे में उन्होंने बताया कि यह रमज़ान की तमाम इबादतों की मुकम्मलगी के लिए बेहद ज़रूरी है। जब तक सदका-ए-फ़ित्र अदा नहीं किया जाता, तब तक रोज़े, नमाज़ और अन्य इबादतें ज़मीन और आसमान के दरमियान मुअल्लक रहती हैं। सदका-ए-फ़ित्र की रक़म एक व्यक्ति के हिसाब से करीब 2 किलो 45 ग्राम गेहूं की क़ीमत के बराबर होती है। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि सदका-ए-फ़ित्र ज़रूरतमंदों को दिया जाना चाहिए। सबसे पहले अपने आसपास के गरीबों, मिस्कीनों को तलाशें। अगर ऐसा मुमकिन न हो, तो इसे किसी ग़रीब, मिस्कीन या दीनी मदरसे को दिया जा सकता है। सदका-ए-फ़ित्र देने का सबसे बेहतर वक़्त ईद की नमाज़ से पहले बताया गया है। यह पैग़ाम न सिर्फ़ इबादत की सही समझ देता है, बल्कि समाज में बराबरी, हमदर्दी और मदद की रूह को भी मज़बूत करता है।
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