एक ऐसे ऐतिहासिक विस्मृत स्वतंत्रता संग्राम सैनानी कैप्टन रामसिंह थापा का जिन्होंने रची थी राष्ट्रगान की मूल धुन -

Aug 15, 2024 - 13:34
Aug 16, 2024 - 16:28
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एक ऐसे ऐतिहासिक विस्मृत स्वतंत्रता संग्राम सैनानी कैप्टन रामसिंह थापा का जिन्होंने रची थी राष्ट्रगान की मूल धुन -

Edited By- Vijay Laxmi Singh       

एक ऐसे ऐतिहासिक विस्मृत स्वतंत्रता संग्राम सैनानी कैप्टन रामसिंह थापा का जिन्होंने रची थी " राष्ट्रगान"की मूल धुन-

" ये मेरे वतन के लोगो " इस महान गीत को सुनते ही हर भारतीय के अन्दर देशभक्ति का जज्बा जाग उठता है।लेकिन विरले ही लोग जानते हैं इस देशभक्ति  गीत  के रचनाकार प्रदीप जी को जिसके लिखने से उनको राष्ट्रकवि की उपाधि भी मिली थी।ठीक इसी प्रकार नेताजी सुभाषचन्द बोस की "आजाद हिन्द फौज " में एक बैंडमास्टर हुआ करते थे जो जोशीली धुनें बांधने के महारथी थे।एक से बढ़कर एक कौमी तरानों को उन्होंने तरन्नुम में रचा और झूम -झूम कर गाया। वे थे हिमाचल के वीर क्षत्रिय सपूत कैप्टन ठाकुर रामसिंह जी थापा।

" राष्ट्रगान की रचना रवीन्द्रनाथ टैगौर जी ने बांग्ला भाषा में की थी। इसे हिन्दी में राष्ट्रगान के रूप में बदलने के लिए शब्दों में बदलाव किए गए। लेकिन मूल धुन में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसे कैप्टन रामसिंह ठाकुर ने बनाया था "

  • जन्मभूमि एवं शिक्षा- 

कैप्टन राम सिंह ठाकुर का जन्म हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला जनपद में खनियारा निवासी दिलीप सिंह ठाकुर के घर में 15 अगस्त 1914 को हुआ। बचपन से ही संगीत का शौक था। नाना नत्थू राम ठाकुर से संगीत सीखने की प्रेरणा मिली। 

कैप्टन राम सिंह थापा जी जनवरी 1927 में धर्मशाला में सेकंड फर्स्ट गोरखा पलटन में भर्ती हुए थे। उन्हें बैंड पर धुन बजाने का शौक था। जब 1941 में जापान ने अमेरिका के विरुद्ध लड़ाई घोषित की तो उनकी पलटन मलाया पहुंची। लड़ाई में पकड़े गए। 15 फरवरी 1942 को सिंगापुर फॉल हुआ तो आजाद हिंद की लहर उठी ।वे भी जापानीयों की कैद से मुक्त हुए और मुक्त होने के बाद आईएनए में शामिल हो गए। ये कहानी है कैप्टन रामसिंह ठाकुर की जिन्होंने लगभग 65 वर्ष पूर्व अपनी धुनों व गीतों से समूचे राष्ट्र को अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अभिप्रेरित किया था।

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कदम कदम बढ़ाए जा,खुशी के गीत गाए जा ,
ये जिन्दगी है कौम की , तू कौम पर लुटाए जा'

इस धुन की रचना कैप्टन रामसिंह ठाकुर जी ने तब की थी , जब वे नेताजी सुभाषचन्द बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में बैंड मास्टर थे।बहुत कम लोग जानते हैं कि कैप्टन रामसिंहजी ने राष्ट्रगान "जन -गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता "की मूल धुन भी तैयार की थी।स्वाधीनता के उपरांत इस लम्बे गीत की शब्द रचना में।परिवर्तन किया गया , किंतु धुन ज्यों की त्यों रही ।आज जो राष्ट्रगान समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो देता है , उसकी मूल धुन के जन्मदाता कैप्टन रामसिंह जी ही थे।

सन 1943 में जब नेताजी सुभाषचन्द बोस जर्मनी से सिंगापुर आगये तो उन्होने आरजी हुकूमत-ए -आजाद हिंद का गठन किया।इसे स्वतंत्रभारत की "प्रोविजनल सरकार " कहा गया। आईएनए में इस बात को लेकर बहस हुई कि आरजी हुकूमत के लिए कम्पोज किये जाने वाले किस गीत को कौमी तराने के लिए चुना जाऐ? बंकिमचन्द्र चटर्जी के गीत " वंदे मातरम " पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इसे अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह और जन आंदोलन को प्रेरित करने वाला गीत तो माना गया , लेकिन मुस्लिम समाज इस गीत की शब्द रचना से खपा था।अतः आईएनए की लक्ष्मी सहगल ने सुझाव दिया कि टैगौर जी के गीत "जन गण- मन को ही आजाद हिंद सेना का कौमी तराना बनाया जाय ।नेताजी टैगौर के मूल बांग्ला में रचित "जन-गण -मन "के संस्कृतिनिष्ठ शब्दों के पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि गीत का अनुवाद हिन्दुस्तानी में हो, ताकि भारतवासी इससे भावनात्मक रूप से जुड़ें। 

  • पैसे बचाकर खरीदा था वायलिन--

कैप्टन रामसिंह ने बताया था कि पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था।लेकिन संगीत में रुचि थी।अपनी तनख्वाह से पैसे बचाकर एक वायलिन खरीद लिया।उस जमाने में एक रुपया आठ आना मासिक वेतन था।अंग्रेज कप्तान डेनिस रोज ने संगीत के प्रति मेरी गहरी रुचि को देखते हुए मुझे वायलिन बजाना सिखाया था।

  • नेताजी सुभाषचन्द बोस से मिली राष्ट्रगान धुन बनाने की प्रेरणा-

राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की धुन बनाने की प्रेरणा कैप्टन रामसिंह जी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ने दी। नेताजी ने कैप्टन रामसिंह जी से  कहा था कि यह धुन इतनी सुंदर और जोरदार बननी चाहिए कि लोग जब इसे गाएं तो जोश में आ जाएं, उनके दिलों में, रग-रग में इस धुन का हर शब्द समा जाए। हम लोग बिरादरी कैंप में इस धुन पर ताल के साथ परेड करते रहे। 

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  • सिंगापुर की कैथ बिल्डिंग में गूंजा था "शुभ सुख चैन की बरखा बरसे-

कैप्टन साहब कहते थे कि मुझे आज भी याद है नेताजी ने इस गीत के विषय में मुझ से कहा था, ‘रामसिंह सिंगापुर की कैथे बिल्डिंग में जिस दिन हमारी आरजी हुकूमत बनेगी, उस दिन ‘शुभ सुख चैन की बरखा बरसे ---’ गीत बजेगा। इतना जोश होना चाहिए कि कैथे बिल्डिंग के दो टुकड़े हो जाएं और आकाश नजर आने लगे। आकाश से देवी-देवता फूल बरसाएं और वे फूल सीधे तिरंगा झंडे पर आ गिरें और ‘जय हो, जय हो’ के जयघोष की ध्वनि भारत तक पहुंच जाए और यही हुआ। जब सिंगापुर में 31 अक्तूबर, 1943 को आजाद हिंद फौज की हुकूमत बनी, तो मेरी बैंड पार्टी ने यही गीत बजाया। कैथे बिल्डिंग गूंज उठी।बस फिर क्या था ।देश को आजाद कराने का सपना साकार होने लगा।

'आईएनए के गठन से पूर्व जब 2 जुलाई 1943 को नेताजी सिंगापुर आये थे तो कैप्टन रामसिंह के ऑर्केस्ट्रा ने उनके स्वागत में ये गीत गाया था ।"सुभाष जी , सुभाष जी वह जाने -हिन्द आ गए ।"हमने बैंड का नाम आजाद हिंद रेडियो स्टेशन रखा था ।नेताजी की हिदायत पर कैप्टन रामसिंह जी सिंगापुर के स्कूलों में जाकर बच्चों को कौमी तराने सिखाते थे।"शुभ सुख चैन की बरखा बरसे-- "के अलावा जिस गीत ने तब करोड़ों भारतीयों को झंकृत किया , वह था , "कदम कदम बढ़ाए जा , खुशी के गीत गाए जा , ये जिन्दगी है कौम की , तू कौम पर लुटाए जा " ।यह गीत उन्होंने स्वयं लिखा था।

  • एमिरेट्स संगीतज्ञ सम्मान से विभूषित-

कैप्टन रामसिंह जी को एमिरेट्स संगीतज्ञ के सम्मान से विभूषित किया गया। कैप्टन साहिब के अनुसार यह स्वर्णपदक उनके सिंगापुर से रंगून आने के बाद सिंगापुर हैडक्वाटर रंगून को भेज दिया था।नेताजी चाहते थे कि वह स्वर्ण पदक भारत के ऐतिहासिक दिन पर बड़ी परेड आयोजित कर हुकूमत उन्हें प्रदान करे।लेकिन ऐसा नहीं हो पाया ।लड़ाई की स्थित ऐसी बनी कि प्रोग्राम स्थगित करना पड़ा।

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तदोपरांत जनरल लोकानन्द ने रंगून में तमाम आईएनए अफसरों के सामने उन्हें वह स्वर्ण पदक पहनाया ।स्वर्ण पदक के बारे में नेताजी प्रशस्ति लिख गये थे।उसे समारोह में पढ़ा गया, "आज हम अपनी आरजी हुकूमत व सुप्रीम कमांड आजाद हिंद फौज की तरफ से कैप्टन राम सिंह को उनकी संगीत रचना के लिए यह पदक दे रहे हैं ।इस कौमी तराने को आजाद हिंद फौज सहित पूर्व एशिया में बसे 30 लाख हिंदुस्तानियों ने मिलकर एक स्वर में गाया था।बाद में यही राष्ट्रगान गाते हुए वे भारत पहुंचे।बाद में भारत आने के बाद 21 मई 1946 को दिल्ली में आईएनए सेंट्रल रिलीफ कमेटी की पहली बैठक में उन्हें टेलीग्राम देकर बुलाया गया ।तार में लिखा था , Come with your vayalin which is given to you by Netaji Subhash Chand Bos " ।

कैप्टन रामसिंह जी का एक और गीत खूब लोकप्रिय हुआ , जिसे उन्होंने जवानों का मनोबल ऊंचा रखने के लिए गाया था-

" चल चल रे नौजवान , 
     दूर तेरा गांव, कभी न थकें तेरे पांव , 
     रुकना तेरा काम नहीं , चलना तेरी शान। चल रे नौजवान ।"

  • गांधी जी ने सुनी थी कैप्टन राम सिंह  के द्वारा राष्ट्रगान की धुन-

एक बार कैप्टन राम सिंह को महात्मा गांधी जी के स्वागत में कौमी तराना बजाने का अवसर मिला, कैप्टन रामसिंह जी कहते थे कि  ‘हम लोग दिल्ली में काबुल लाइन कैंटोनमेंट में बंदी थे। सायं सात बजे हमें तैयार होने का हुक्म हुआ। हमारी बैरक के सामने दो-तीन कारें रुकीं। पहली कार पर आर्मी जनरल का झंडा लगा हुआ था। बापू जी जनरल की कार से उतरे। उनके साथ सरदार पटेल जी भी थे। हम सभी कतार में खड़े थे।

बापू जी ने कहा, ‘अंग्रेज सरकार की कृपा है कि उसने आप लोगों से मिलने का मौका दिया।’ फिर बापू जी ने प्रत्येक जवान के नाम व ग्राम का पता पूछा। हमें बेहद खुशी हुई। फिर आईएनए के जनरल भौंसले ने सरदार पटेल जी से कहा कि हमारे जवान  बापू जी को कौमी तराना गाकर सुनाना चाहते हैं। बापू जी ने अंग्रेज आर्मी जनरल से आज्ञा ली, तो वह तुरंत राजी हो गए। राष्ट्र गान सुनकर बापू जी प्रसन्न हुए। हमने ‘महात्मा गांधी की जय, ‘भारत माता की जय नेताजी की जय’ नारों से बापू जी का स्वागत किया। लेकिन नेताजी द्वारा उन्हें दी गई वायलिन लाल किले में छीन ली गई।

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बताया गया कि जिस दिन रिहा होंगे , वायलिन लौटा दी जायेगी।23 जनवरी 1946 की सुबह एक ब्रिटिश मेजर और उनके साथ एक सार्जेंट वायलिन लेकर आये और उन्हें सौंप दी।साथ ही हिदायत दी कि वे आई एन ए धुनें न बजाएं , केवल इंग्लिश धुनें ही बजाएं।

मई 1946 में कैप्टन रामसिंह अपने घर धर्मशाला गये।वे घरवालों से काफी समय बाद मिले थे तो कुछ दिन वहां रहे।कुछ दिनों बाद दिल्ली से बुलावा आया।आईएनए के सिपाहियों की बैठक थी।जनरल शाहनवाज साहब ने नेहरु जी और सरदार पटेल जी से उनको मिलवाया।फिर एक बैंड पार्टी बनाने की बात उठी।सरदार पटेल जी ने उन्हें पांच हजार रुपये दिए और कहा , आप 10-15 आदमियों को लेकर बैड पार्टी बनाएं ।उन्होंने बम्बई रिलीफ कमेटी से वाद्य यंत्र दिलवाने को भी कहा गया।

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कर्नल पीके सहगल , कर्नल रतौडी , कर्नल महमूद अहमद के अधीन बैंड पार्टी का गठन हुआ।इस पार्टी का नाम " ऑल इंडिया आईएनए आर्केष्ट्रा ,कंडक्टेड बाय कैप्टन राम सिंह " रखा गया।राष्ट्र भावना जगाने के लिए पूरे देश का भृमण  किया।बम्बई ,कलकत्ता , पटना ,लाहौर ,सिलीगुड़ी , सीतामडी और न जाने कहां-कहां। फिर वह दिन आया ,जिसका हर हिंदुस्तानी को इंतजार था।15 अगस्त 1947 को देश ब्रिटिश राज से आजाद हुआ।कैप्टन रामसिंह ने अपनी बैंड पार्टी के साथ लाल किले पर झंडा फहराते समय धुन बजाई। समूचे देश में खुशी की लहर थी , लेकिन आजाद हिंद फौज के कैप्टन रामसिंह के दिल में एक ही मलाल था : नेताजी इस मौके पर मौजूद नहीं थे ।

  • पंडित जी ने भी लगाया था कैप्टन रामसिंह जी को अपने गले-

1953 तक मिलिट्री ब्रास बैंड बन चुका था। इसी में से 35 आदमियों की स्ट्रांग आर्केष्ट्रा टीम बनी। इस बैंड की चर्चा सम्पूर्ण देश में हुई।पहली बार अमौसी ऐरोड्रम पर कैप्टन साहिब अपने साथियों सहित पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के आगमन पर उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देने गए। गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करने के बाद जब पंडित जी मंच की तरफ लौटने लगे तो पद्मजा नायडू ने कहा, ‘मिस्टर नेहरू आप रामसिंह से बिना मिले ही आ गए।’ पंडित जी कहने लगे, ‘कौन रामसिंह’ हमारे कैप्टन रामसिंह आईएनए बैंड मास्टर।’ यह सुनते ही पंडित जी ने मुझे गले लगा लिया। बोले मुझे यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि आप पीएसी में आ गए।पीएसी बैंड में रहकर कैप्टन राम सिंह ने अगरतला , नेफा, बोमदिला क्षेत्रों की यात्राएं की और भारत के वीर सपूतों का मनोबल बढाते रहे।

  • महान देशभक्त का गुजरा अंतिम  समय निराशापूर्ण-

राष्ट्र के प्रति अभूतपूर्व योगदान देने के बावजूद रामसिंह को अजीविका के लिए 1947 में आजादी के बाद  भटकना पड़ा। बंबई में पंकज मलिक न्यू थियेटर ने उन्हें सहायक संगीत निदेशक के रूप में काम करने का आग्रह किया था, परंतु अपने आर्केस्ट्रा ग्रुप  को उन्होंने नहीं छोड़ा। किसी तरह उन्हें उत्तर प्रदेश में पीएसी में नौकरी मिल गई। 74 वर्ष की आयु में वे सेवा मुक्त हो गए ।अंततः वह लखनऊ में ही बस गए और वहीं के होकर रह गए। 23 जनवरी 1974 को नेताजी सुभाषचन्द बोस जी के जन्मदिवस पर कैप्टन रामसिंह को स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया था । कैप्टन  राम सिंह ठाकुर का निधन 87 वर्ष की आयु में 15 अप्रैल, 2002 को लखनऊ में हुआ।

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लेखक:- डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव-: लढोता ,सासनी
जनपद:- हाथरस ,उत्तरप्रदेश
प्राचार्य:- राजकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सवाईमाधोपुर, राज.

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