Lucknow : अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य ने  भारत के पहले एआई असिस्टेड ‘लिवर पूप’ ऐप के प्रस्तुतीकरण का किया अवलोकन

बिलीरी एट्रेसिया एक गंभीर बीमारी है, जिसमें जन्म के 60 दिनों के भीतर शल्य चिकित्सा (कसाई सर्जरी) हो जाने पर बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है और लीवर ट्रांसप्लांट से बच सकता है। वहीं 90 दिनों के बाद लीवर अत्यधिक क्षति

Apr 13, 2026 - 23:21
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Lucknow : अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य ने  भारत के पहले एआई असिस्टेड ‘लिवर पूप’ ऐप के प्रस्तुतीकरण का किया अवलोकन
Lucknow : अपर मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य ने  भारत के पहले एआई असिस्टेड ‘लिवर पूप’ ऐप के प्रस्तुतीकरण का किया अवलोकन

  • यह अभिनव एप अपर मुख्य सचिव के मार्गदर्शन में डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. पीयूष उपाध्याय द्वारा किया गया है विकसित
  • नवजातों की जान बचाने की नई उम्मीद:एआई तकनीक से नवजातों में लिवर रोग की होगी समय पर पहचान
  • अब मोबाइल से होगी गंभीर बीमारी की पहचान, नवजातों के लिए लॉन्च हुआ ऐप
  • एप जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम : अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
  • शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में मिलेगी मदद मिलेगी: अमित कुमार घोष

लखनऊ : अपर मुख्य सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अमित कुमार घोष ने भारत के पहले एआई असिस्टेड “लिवर पूप” (LiverPoop) मोबाइल एप्लिकेशन के प्रस्तुतीकरण का अवलोकन किया। यह अभिनव एप अपर मुख्य सचिव के मार्गदर्शन में  डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के बाल रोग विभाग के प्रोफेसर (जूनियर ग्रेड) डॉ. पीयूष उपाध्याय, MBBS, MD, DM (Pediatric Hepatology and Liver Transplant) द्वारा विकसित किया गया है। प्रो० उपाध्याय ILBS, New Delhi से डीएम की डिग्री प्राप्त करने वाले उत्तर प्रदेश के पहले डॉक्टर हैं।
अपर मुख्य सचिव ने कहा कि यह एप जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने अधिकारियों को इसे पूरे प्रदेश ने लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने इसे प्रत्येक माँ, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आशा के लिए एक उपयोगी साधन बताते हुए कहा कि नवजात शिशुओं में गंभीर बीमारियों की पहचान जन्म के तुरंत बाद सुनिश्चित करने मदद मिलेगी। किसी भी बच्चे को समय पर उपचार से वंचित न रहना पड़ेगा।
  उन्होंने यह भी कहा कि इस तकनीक के माध्यम से पारंपरिक पेपर स्टूल चार्ट पर होने वाले अनावश्यक खर्च को समाप्त किया जा सकता है, जो भारत जैसे विशाल देश के लिए आर्थिक रूप से अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। इसके उपयोग से स्वास्थ्य विभाग को रियल-टाइम डेटा उपलब्ध होगा, जिससे त्वरित हस्तक्षेप संभव होगा और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में मदद मिलेगी। 
एप के विकासकर्ता डॉ. पीयूष उपाध्याय ने बताया कि तीन वर्षों के सतत प्रयास और पिछले डेढ़ वर्ष की गहन मेहनत के बाद यह एआई आधारित मोबाइल एप्लिकेशन विकसित किया गया है। यह ऐप विशेष रूप से नवजात शिशुओं (0-1 वर्ष) में बिलीरी एट्रेसिया जैसे जानलेवा लिवर रोग की स्क्रीनिंग करता है, जिसकी सेंसिटिविटी अध्ययन में 100 प्रतिशत पाई गई है।
यह तकनीक नवजातों में लिवर संबंधी गंभीर बीमारियों की समय पर पहचान सुनिश्चित कर सकती है और डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नवाचार के रूप में उभरकर सामने आई है। ऐप स्क्रीन पर स्पष्ट रूप से बताता है कि मल का रंग 'पेल (हल्का/खतरनाक)' है अथवा 'पिगमेंटेड (सामान्य)'। अगर मल का रंग संदिग्ध पाया जाता है, तो ऐप 'पेशाब (urine) के रंग के बारे मे और कपड़े पर पेशाब के गहरे दाग पड़ते हैं या नहीं' भी पूछता है। इन सभी जवाबों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार होती है, जिससे डॉक्टर को शुरुआती स्तर पर ही समस्या का अंदाजा मिल जाता है।
उन्होंने आगे बताया कि यह एप न केवल नवजात शिशुओं के जीवन को बचाने में सहायक होगा, बल्कि सरकार के ₹290 करोड़ से अधिक की संभावित बचत भी करेगा। इस बचत से हजारों लीवर ट्रांसप्लांट किए जा सकते हैं या सैकड़ों नवजात गहन चिकित्सा इकाइयाँ स्थापित की जा सकती हैं।
  यह एप 40 भाषाओं में पूर्णतः निःशुल्क उपलब्ध है और इसे https://liverpoop.netlify.app/ से डाउनलोड किया जा सकता है। निकट भविष्य में यह एप Google Play Store एवं Apple App Store पर भी उपलब्ध होगा।
बिलीरी एट्रेसिया एक गंभीर बीमारी है, जिसमें जन्म के 60 दिनों के भीतर शल्य चिकित्सा (कसाई सर्जरी) हो जाने पर बच्चा सामान्य जीवन जी सकता है और लीवर ट्रांसप्लांट से बच सकता है। वहीं 90 दिनों के बाद लीवर अत्यधिक क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे सर्जरी संभव नहीं रह जाती और महंगे ट्रांसप्लांट या मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में यह एप समय पर पहचान सुनिश्चित कर जीवनरक्षक साबित हो सकता है।
यह एप स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए भी एक प्रभावी उपकरण है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) के अंतर्गत ASHA एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल एक फोटो के माध्यम से यह निर्धारित कर सकती हैं कि शिशु को विशेषज्ञ के पास भेजना आवश्यक है या नहीं। साथ ही, यह एप रियल-टाइम डेटा संग्रह कर स्वास्थ्य विभाग को लाइव डैशबोर्ड के माध्यम से जिलावार स्थिति की जानकारी प्रदान करता है, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव होती है।
यह एप शून्य सीमांत लागत पर आधारित है, अर्थात एक बार विकसित होने के बाद इसे करोड़ों नवजातों तक पहुँचाने में कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आता। इसमें किसी प्रकार की प्रिंटिंग, परिवहन या भंडारण की आवश्यकता नहीं होती। यह पहल न केवल भारत के लिए, बल्कि विकासशील देशों के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
यह ऐप 18 भारतीय भाषाओं — जिनमें हिंदी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बांग्ला, पंजाबी, ओड़िया, असमिया, गुजराती, मैथिली, डोगरी, कोंकणी और मिज़ो सम्मिलित हैं — के साथ-साथ 22 विदेशी भाषाओं में भी उपलब्ध है, जिनमें अरबी, फारसी, स्वाहिली, अंग्रेजी, स्पेनिश, जर्मन, पुर्तगाली, रूसी, चीनी, जापानी और कोरियन प्रमुख हैं। भारत में कार्यरत प्रवासी श्रमिक भी अपनी भाषा में इस तकनीक का लाभ उठा सकते हैं।

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