मेरे पति तो प्लंबर थे, उन्हें जबरन सीवर में भेजा गया'- मृतक की पत्नी के चीत्कार से गूंजा नागरिक अस्पताल परिसर, ठेकेदार पर गंभीर आरोप।
हरियाणा के झज्जर जिले के अंतर्गत आने वाले औद्योगिक शहर बहादुरगढ़ से एक बेहद ही हृदयविदारक और झकझोर देने वाली
- बहादुरगढ़ में सीवर सफाई के दौरान फिर दहला दिल- बिना सुरक्षा उपकरणों के गहरे मैनहोल में उतारे गए प्लंबर की जहरीली गैस से मौत
- मैन्युअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही ने ली एक और मासूम जान- पुलिस ने गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर शुरू की जांच
हरियाणा के झज्जर जिले के अंतर्गत आने वाले औद्योगिक शहर बहादुरगढ़ से एक बेहद ही हृदयविदारक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने प्रशासनिक दावों और सीवर सफाई के सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है। यहाँ एक निजी और व्यावसायिक परिसर की सीवरेज लाइन की सफाई और मरम्मत कार्य के दौरान एक युवक की जहरीली गैस की चपेट में आने से दर्दनाक मौत हो गई। घटना के वक्त वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई और आनन-फानन में युवक को अचेत अवस्था में बाहर निकालकर नजदीकी नागरिक अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सुरक्षा दिशानिर्देशों को ताक पर रखकर किस तरह गरीब और असहाय श्रमिकों के जीवन को जोखिम में डाला जा रहा है। स्थानीय पुलिस और प्रशासन की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं और शव को कब्जे में लेकर मामले की जांच शुरू कर दी है, लेकिन इस हादसे ने पूरे इलाके में गहरे आक्रोश और शोक का माहौल पैदा कर दिया है।
इस दर्दनाक हादसे की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम के विवरण के अनुसार, मृतक युवक मूल रूप से कतरनी और मरम्मत के कार्यों से जुड़ा हुआ था और उसे एक ठेकेदार द्वारा इस काम के लिए बुलाया गया था। परिजनों के मुताबिक, मृतक बुनियादी तौर पर एक प्लंबर था और उसका मुख्य काम पाइपलाइन, नल और सामान्य जल निकासी व्यवस्था को ठीक करना था, न कि गहरे सीवर के भीतर उतरकर उसकी गाद साफ करना। घटना वाले दिन सीवरेज लाइन में भारी रुकावट होने के कारण वहां काम देख रहे सुपरवाइजर और ठेकेदार ने उस पर मैनहोल के भीतर उतरने का भारी दबाव बनाया। युवक ने शुरुआत में बिना किसी सुरक्षा उपकरण और ऑक्सीजन मास्क के इतने गहरे और खतरनाक सीवर में जाने से पूरी तरह मना कर दिया था, लेकिन नौकरी से हटाए जाने की धमकी और मजदूरी न मिलने के डर से उसे मजबूरन उस मौत के कुएं में उतरना पड़ा। जैसे ही वह सीवर की गहराई में पहुंचा, वहां पहले से जमा अत्यधिक जहरीली गैसों के रिसाव के कारण उसका दम घुटने लगा और वह कुछ ही सेकंडों में बेहोश होकर वहीं गिर गया।
कानूनी प्रतिबंध के बाद भी जारी है जानलेवा प्रथा
देश की सर्वोच्च अदालत और सरकार द्वारा हाथ से मैला उठाने और बिना सुरक्षा गियर के सीवर में उतरने (मैन्युअल स्कैवेंजिंग) पर पूरी तरह से कानूनी प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर ठेकेदारों की मनमानी और प्रशासनिक निगरानी की कमी के कारण इस तरह के जानलेवा हथकंडे आज भी धड़ल्ले से अपनाए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर मानव अधिकारों का उल्लंघन है।
इस भयंकर हादसे के बाद नागरिक अस्पताल के शवगृह के बाहर मृतक की पत्नी और उसके छोटे-छोटे बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है, जिनकी चीखें सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। मृतक की पत्नी ने रोते हुए बेहद गंभीर और संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि उनके पति सीवर सफाई कर्मचारी नहीं थे, वे केवल एक साधारण प्लंबर थे जिनका काम सीवर के भीतर जाना कभी नहीं रहा है। ठेकेदार और साइट के जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी लापरवाही और काम को जल्दी निपटाने के चक्कर में उनके पति को जबरन उस जहरीले चैंबर के अंदर धकेल दिया। पीड़ित परिवार ने प्रशासन से न्याय की गुहार लगाते हुए कहा है कि जब तक दोषी ठेकेदार और सुपरवाइजर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा नहीं मिलता, वे शांत नहीं बैठेंगे। इस बयान ने स्थानीय प्रशासन पर कानूनी कार्रवाई को कड़ा करने और दोषियों को तुरंत गिरफ्तार करने का भारी दबाव बना दिया है।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग की फोरेंसिक टीम और स्थानीय जांच अधिकारियों ने घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और वहां मौजूद अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए। प्रारंभिक जांच में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि कार्यस्थल पर सुरक्षा के नाम पर एक भी उपकरण मौजूद नहीं था, न तो कर्मचारी को कोई सुरक्षा बेल्ट दी गई थी और न ही सीवर के भीतर की जहरीली गैसों की जांच करने के लिए किसी गैस डिटेक्टर का उपयोग किया गया था। पुलिस ने कानून की विभिन्न धाराओं और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के साथ-साथ मैन्युअल स्कैवेंजिंग एक्ट के उल्लंघन के तहत ठेकेदार और संबंधित प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कर ली है। पुलिस उपाधीक्षक ने आश्वासन दिया है कि इस मामले में किसी भी स्तर पर ढिलाई नहीं बरती जाएगी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट में एक मजबूत चार्जशीट पेश की जाएगी ताकि दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिल सके।
इस तरह के हादसों के बार-बार होने से स्थानीय नागरिक संगठनों और श्रमिक यूनियनों में भारी रोष व्याप्त हो गया है और उन्होंने बहादुरगढ़ नगर परिषद और संबंधित विभागों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। श्रमिक नेताओं का कहना है कि औद्योगिक क्षेत्रों और निजी सोसायटियों में कंक्रीट की बड़ी-बड़ी इमारतों के नीचे काम करने वाले इन असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सुरक्षा का कोई माई-बाप नहीं है। सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी सीवर की सफाई के लिए आधुनिक सक्शन और जेटिंग मशीनों का उपयोग अनिवार्य है, लेकिन निजी ऑपरेटर पैसों की बचत करने के लिए मानव श्रम का दुरुपयोग करते हैं। नागरिक संगठनों ने मांग की है कि बहादुरगढ़ के सभी औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों में चल रहे निर्माण और मरम्मत कार्यों की एक व्यापक ऑडिट कराई जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार का चिराग इस तरह की लापरवाही के कारण न बुझ सके।
मजदूरों की सुरक्षा और उनके कल्याण के लिए बनाई गई तमाम कूटनीति और नीतियां इस घटना के बाद पूरी तरह से खोखली नजर आ रही हैं, क्योंकि नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। जब तक जमीनी स्तर पर इन नियमों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं को सख्त आर्थिक दंड और लंबी जेल की सजा नहीं दी जाएगी, तब तक इस सामाजिक बुराई और जानलेवा लापरवाही को रोकना असंभव होगा। श्रम विभाग के अधिकारियों को भी इस तरह की साइट्स का औचक निरीक्षण करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, जो आमतौर पर सुस्त रवैया अपनाए रखते हैं। इस घटना ने एक बार फिर यह कड़वा सच बयां किया है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की जान की कीमत कितनी सस्ती समझ ली जाती है, जहां एक प्लंबर को सीवर साफ करने के लिए मजबूर कर उसकी जान ले ली जाती है।
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