600 करोड़ रुपये की बेशकीमती जमीन और 500 से अधिक झोपड़ियों पर कार्रवाई- गरीब नगर में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान जमकर हुआ पथराव और लाठीचार्ज।

मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर इलाके में रेलवे की जमीन पर बने अवैध निर्माणों को हटाने के लिए चलाया गया अब तक का सबसे बड़ा

May 21, 2026 - 16:03
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600 करोड़ रुपये की बेशकीमती जमीन और 500 से अधिक झोपड़ियों पर कार्रवाई- गरीब नगर में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान जमकर हुआ पथराव और लाठीचार्ज।
600 करोड़ रुपये की बेशकीमती जमीन और 500 से अधिक झोपड़ियों पर कार्रवाई- गरीब नगर में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान जमकर हुआ पथराव और लाठीचार्ज।
  • बांद्रा में सालों पुराने अवैध कब्जे पर चला रेलवे का बुलडोजर- हाई कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुआ मुंबई का सबसे बड़ा अतिक्रमण हटाओ अभियान
  • भीषण गर्मी और ईद के त्योहार के बीच आशियाने ढहने से भड़का गुस्सा- अवैध धार्मिक ढांचे को गिराने के बाद अचानक नियंत्रण से बाहर हो गए जमीनी हालात

मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर इलाके में रेलवे की जमीन पर बने अवैध निर्माणों को हटाने के लिए चलाया गया अब तक का सबसे बड़ा अतिक्रमण विरोधी अभियान भारी हिंसा और अराजकता की चपेट में आ गया है। इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई की पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाई कोर्ट का वह सख्त आदेश है, जिसके तहत पश्चिम रेलवे को अपनी जमीन को पूरी तरह से अतिक्रमण मुक्त कराने की विधिक अनुमति मिली थी। यह कड़ा कूटनीतिक और प्रशासनिक कदम अचानक तब एक हिंसक संघर्ष में बदल गया जब सुरक्षा बलों और तोड़फोड़ दस्ते का सामना स्थानीय निवासियों के भारी विरोध से हुआ। सालों से बसे इस स्लम क्लस्टर को खाली कराने के लिए जैसे ही बुलडोजर आगे बढ़े, वैसे ही वहां का पूरा माहौल तनाव और आक्रोश से भर गया। इस कार्रवाई के दूसरे दिन स्थितियां इतनी अधिक संवेदनशील हो गईं कि कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तैनात पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर अचानक पत्थरों और बर्तनों से हमला कर दिया गया, जिसके बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा।

इस बड़े भू-सांस्कृतिक और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट अभियान के केंद्र में वह बेशकीमती जमीन है, जो बांद्रा रेलवे स्टेशन और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) के बिल्कुल नजदीक स्थित है। पश्चिम रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस अभियान के तहत लगभग 5200 वर्ग मीटर रेलवे भूमि को खाली कराया जा रहा है, जिसकी वर्तमान बाजार हिस्सेदारी और रणनीतिक स्थिति को देखते हुए अनुमानित कीमत करीब 600 करोड़ रुपये आंकी गई है। इस बेहद कीमती जमीन पर पिछले कई दशकों से करीब 500 से अधिक अवैध झोपड़ियां और बहुमंजिला अवैध पक्के ढांचे खड़े हो गए थे, जो न केवल रेल पटरियों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके थे बल्कि भविष्य के विकास कार्यों में भी बड़ी बाधा थे। कानूनी तौर पर यह लड़ाई साल 2017 से पहले पब्लिक प्रेमाइसेस एक्ट के तहत शुरू हुई थी, जो बाद में हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची और अंततः अदालती हरी झंडी मिलने के बाद इस पांच दिवसीय महा-अभियान की शुरुआत की गई।

  • रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और सुरक्षा संबंधी चिंताएं

इस बेशकीमती जमीन को खाली कराना मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों और लंबी दूरी की रेल सेवाओं के आधुनिकीकरण के लिए बेहद जरूरी हो गया था। इस खाली कराई गई जमीन का मुख्य उपयोग सांताक्रुज से मुंबई सेंट्रल कॉरिडोर के बीच पांचवीं और छठी रेलवे लाइन के विस्तार के लिए किया जाएगा, जिससे मुंबई से चलने वाली लगभग 50 नई ट्रेनों का संचालन सुचारू रूप से शुरू हो सकेगा।

इस बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान अचानक हिंसा भड़कने और स्थितियां बेकाबू होने के पीछे कई बेहद संवेदनशील और मानवीय कारण शामिल रहे हैं, जिन्होंने स्थानीय लोगों के गुस्से को बारूद की तरह हवा दे दी। सबसे बड़ा तात्कालिक कारण तब बना जब तोड़फोड़ दस्ते ने रेलवे स्काईवॉक के पास बने एक बेहद पुराने और कथित तौर पर अवैध रूप से निर्मित तीन मंजिला धार्मिक ढांचे (मस्जिद) और उसके ऊपर अवैध रूप से लगे निजी टेलीकॉम टॉवर को गिराने की प्रक्रिया शुरू की। इसके साथ ही आगामी 27 मई को होने वाले ईद के बड़े त्योहार को लेकर भी स्थानीय निवासियों में भारी डर और असंतोष व्याप्त था, क्योंकि त्योहार के ठीक कुछ दिन पहले उनके सिर से छत छीनी जा रही थी। लोगों का यह भी आरोप था कि कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी के इस मौसम में उन्हें अपने घरों से जरूरी सामान, राशन और कीमती चीजें बाहर निकालने के लिए प्रशासन द्वारा पर्याप्त समय और अवसर नहीं दिया गया, जिससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई।

धार्मिक ढांचे को गिराए जाने की कार्रवाई से पैदा हुए भारी तनाव के बीच दोपहर के समय अचानक स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गई और एक बड़ी भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों को घेर लिया। देखते ही देखते संकरी गलियों और छतों से प्रशासनिक अमले, रेलवे अधिकारियों और पुलिस बल पर ताबड़तोड़ पथराव शुरू कर दिया गया, जिसमें घर के बर्तनों और पत्थरों का खुलकर इस्तेमाल किया गया। इस हिंसक हमले में सात से अधिक पुलिसकर्मी और छह प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें तुरंत नजदीकी भाभा अस्पताल और वीएन देसाई अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। भीड़ को तितर-बितर करने और इलाके में कानून का राज स्थापित करने के लिए पुलिस को अंततः मजबूरन प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करना पड़ा। इस पूरी हिंसक झड़प और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में स्थानीय निर्मल नगर पुलिस स्टेशन में दंगा करने, गैर-कानूनी रूप से इकट्ठा होने और घातक हथियारों से हमला करने के तहत गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है।

इस बेहद जटिल और बड़े स्तर के कूटनीतिक अभियान को अंजाम देने के लिए प्रशासन ने सुरक्षा के अभूतपूर्व और कड़े इंतजाम किए थे, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। मौके पर मुंबई शहर पुलिस के 400 जवानों के साथ-साथ रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) के करीब 400 अतिरिक्त कमांडो और 200 से अधिक रेलवे के तकनीकी अधिकारियों को तैनात किया गया था। बांद्रा स्टेशन और बांद्रा टर्मिनस को जोड़ने वाली तमाम मुख्य सड़कों और संपर्क मार्गों पर भारी बैरिकेडिंग कर दी गई थी, जिससे पूरे इलाके में भारी ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा हो गई और सैकड़ों रेल यात्रियों को अपना सामान लेकर पैदल चलने पर मजबूर होना पड़ा। पूरे इलाके को छावनी में तब्दील करने और ड्रोन कैमरों से लगातार निगरानी रखने के बाद ही प्रशासन इस हिंसक माहौल के बीच भी पहले दो दिनों में लगभग 60 प्रतिशत से अधिक अवैध ढांचों को पूरी तरह जमींदोज करने में सफल हो पाया है।

इस पूरी तोड़फोड़ की कार्रवाई के दौरान बांद्रा की सड़कों पर बेहद भावुक और विचलित करने वाले दृश्य भी देखने को मिले, जहां कंक्रीट के मलबे के बीच मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह तार-तार होती नजर आईं। नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को इस भीषण तपती गर्मी के बीच खुले आसमान के नीचे अपने बचे-कुचे सामान, कपड़ों और बर्तनों के साथ सड़क किनारे बैठे देखा गया। स्थानीय निवासियों का यह भी तर्क था कि पूर्व में कई राजनेताओं ने उन्हें इस जगह पर सुरक्षा और पूर्ण पुनर्वास का भरोसा दिया था, इसलिए बिना किसी वैकल्पिक आवास या मुआवजे के उन्हें इस तरह बेघर करना पूरी तरह से अमानवीय है। हालांकि, अदालती आदेशों के तहत केवल उन्हीं परिवारों के अधिकारों की रक्षा की जा रही है जो साल 2021 के आधिकारिक सर्वेक्षणों के दौरान पुनर्वास के लिए पूरी तरह से पात्र पाए गए थे, जबकि बाकी अवैध निवासियों को तुरंत हटने को कह दिया गया है।

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