चंपावत में सिस्टम की भेंट चढ़ा होनहार खिलाड़ी: अस्पताल के ठीक सामने मैदान में तोड़ा दम, समय पर नहीं मिली एम्बुलेंस

उत्तराखंड के सीमांत जनपद चंपावत से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने खेल जगत और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक उभरते हुए युवा खिलाड़ी की खेल के मैदान में अचानक तबीयत बिगड़ने और समय पर उपचार न मिल पाने के कारण मृत्यु हो गई।

Apr 19, 2026 - 11:24
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चंपावत में सिस्टम की भेंट चढ़ा होनहार खिलाड़ी: अस्पताल के ठीक सामने मैदान में तोड़ा दम, समय पर नहीं मिली एम्बुलेंस
चंपावत में सिस्टम की भेंट चढ़ा होनहार खिलाड़ी: अस्पताल के ठीक सामने मैदान में तोड़ा दम, समय पर नहीं मिली एम्बुलेंस

  • उत्तराखंड खेल जगत में शोक की लहर: मैच के दौरान खिलाड़ी को आया हार्ट अटैक, चंद कदमों की दूरी पर स्थित अस्पताल नहीं बचा सका जान
  • प्रशासनिक लापरवाही ने छीना घर का चिराग: चंपावत में बैडमिंटन टूर्नामेंट के दौरान दर्दनाक हादसा, स्वास्थ्य सुविधाओं की खुली पोल

उत्तराखंड के चंपावत जिला मुख्यालय स्थित गौरलचौड़ मैदान में रविवार को एक बैडमिंटन प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा था। इस टूर्नामेंट में क्षेत्र के कई प्रतिभावान खिलाड़ी हिस्सा ले रहे थे। मैच के दौरान ही एक युवा खिलाड़ी की अचानक तबीयत खराब हो गई और वह मैदान पर ही गिर पड़ा। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, खिलाड़ी को अचानक सीने में तेज दर्द महसूस हुआ और वह बेसुध हो गया। प्रतियोगिता स्थल पर मौजूद अन्य खिलाड़ियों और दर्शकों में हड़कंप मच गया। विडंबना यह रही कि जिस स्थान पर यह मैच हो रहा था, वहां से जिला अस्पताल की दूरी महज कुछ ही कदमों की थी। इसके बावजूद, खिलाड़ी को तत्काल प्राथमिक उपचार या अस्पताल पहुँचाने के लिए कोई आपातकालीन व्यवस्था मौके पर मौजूद नहीं थी। घटना के समय मैदान पर मौजूद लोगों ने तत्काल एम्बुलेंस को फोन किया और मदद की गुहार लगाई, लेकिन काफी देर तक कोई रिस्पांस नहीं मिला। अस्पताल सामने होने के बावजूद स्ट्रेचर या ऑक्सीजन जैसी मूलभूत सुविधाएं खिलाड़ी तक पहुँचाने में अमूल्य समय व्यर्थ हो गया। साथी खिलाड़ियों ने अपने स्तर पर उसे सीपीआर (CPR) देने की कोशिश की और निजी वाहन के जरिए उसे अस्पताल ले जाने का प्रयास किया। जब तक खिलाड़ी को अस्पताल के आपातकालीन कक्ष तक पहुँचाया गया, तब तक उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन अस्पताल के संसाधनों की अपनी सीमाएं और इलाज में हुई देरी के कारण उसे मृत घोषित कर दिया गया।

खेल आयोजनों में सुरक्षा मानकों का अभाव

राष्ट्रीय खेल नियमावली के अनुसार, किसी भी आधिकारिक या जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिता के दौरान आयोजन स्थल पर एक मेडिकल टीम, प्राथमिक उपचार किट और एक एम्बुलेंस की तैनाती अनिवार्य है। चंपावत की इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर इन नियमों की धड़ल्ले से अनदेखी की जा रही है, जिसका परिणाम जानलेवा साबित हो रहा है।

युवा खिलाड़ी की मौत की खबर फैलते ही चंपावत मुख्यालय में तनाव और शोक का माहौल व्याप्त हो गया। मृतक खिलाड़ी की पहचान क्षेत्र के एक सक्रिय और लोकप्रिय एथलीट के रूप में हुई है, जो कई वर्षों से बैडमिंटन और अन्य खेलों में जिले का प्रतिनिधित्व कर रहा था। उसके परिवारजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और उन्होंने सीधे तौर पर खेल विभाग और स्वास्थ्य प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया है। स्थानीय निवासियों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए यह सवाल उठाया कि जब अस्पताल आंखों के सामने था, तो चिकित्सक या पैरामेडिकल स्टाफ की टीम मैदान तक पहुँचने में विफल क्यों रही। लोगों का आक्रोश इस बात को लेकर भी था कि अक्सर वीआईपी ड्यूटी के लिए एम्बुलेंस उपलब्ध रहती है, लेकिन आम जनता के लिए आपात स्थिति में सिस्टम फेल हो जाता है। इस घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की चरमराई स्थिति को एक बार फिर सार्वजनिक कर दिया है। कहने को तो चंपावत का जिला अस्पताल आधुनिक सुविधाओं से लैस होने का दावा करता है, लेकिन एक आपातकालीन स्थिति में वह एक खिलाड़ी की जान बचाने में नाकाम रहा। खेल मैदान और अस्पताल के बीच की न्यूनतम दूरी होने के बाद भी 'गोल्डन ऑवर' (दुर्घटना के बाद का सबसे महत्वपूर्ण समय) में उपचार न मिलना सिस्टम की बड़ी विफलता है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होनी चाहिए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में किसी अन्य खिलाड़ी या नागरिक को इस तरह अपनी जान न गंवानी पड़े।

जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अब इस मामले में बचाव की मुद्रा में नजर आ रहे हैं। अधिकारियों का तर्क है कि खिलाड़ी को संभवतः 'मैसिव कार्डियक अरेस्ट' आया था, जिसके कारण उसे संभलने का मौका नहीं मिला। हालांकि, यह तर्क स्थानीय लोगों के गले नहीं उतर रहा है। उनका कहना है कि यदि मैदान पर ही ऑक्सीजन या पोर्टेबल डिफिब्रिलेटर उपलब्ध होता, तो शायद परिणाम कुछ और हो सकते थे। उत्तराखंड में खेल महाकुंभ और विभिन्न प्रतियोगिताओं का दौर चलता रहता है, लेकिन खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए बजट और योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित दिखाई देती हैं। गौरलचौड़ मैदान की इस घटना ने यह भी सिखाया है कि बड़े दावों के बीच जमीनी हकीकत कितनी भयावह हो सकती है। मृतक खिलाड़ी के सम्मान में क्षेत्र के सभी खेल कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं और स्थानीय व्यापारियों ने भी शोक स्वरूप अपने प्रतिष्ठान बंद रखे। खिलाड़ी की अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा, जिसमें हर आंख नम थी। युवाओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार तक अपनी आवाज पहुँचाई है और खेल मैदानों में अनिवार्य स्वास्थ्य इकाई की स्थापना की मांग की है। उत्तराखंड को 'देवभूमि' के साथ-साथ 'वीरभूमि' और 'खेलभूमि' के रूप में विकसित करने के सरकारी विजन को इस तरह की घटनाएं गहरा आघात पहुँचाती हैं। बिना बुनियादी सुरक्षा और चिकित्सा गारंटी के युवाओं को मैदान में उतारना उनकी जान के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।

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