वोटर लिस्ट में महिलाओं के नाम जुड़वाने की प्रक्रिया बेहद आसान: अब केवल पति के नाम के आधार पर ही नहीं होगा महिलाओं का वेरिफिकेशन
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा देश के मतदाताओं की सुविधा और लोकतांत्रिक प्रणाली को अधिक समावेशी बनाने के उद्देश्य से समय-समय
- निर्वाचन आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत नियमों में किया गया बड़ा बदलाव, शादीशुदा महिलाओं के मतदाता पहचान पत्र से जुड़ी जटिलताएं होंगी खत्म
- नया फॉर्म 8 और फॉर्म 6 भरने के नियमों में स्वतंत्रता का समावेश: पहचान और पते के प्रमाण के रूप में स्वयं के कानूनी दस्तावेज होंगे अधिक मान्य
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा देश के मतदाताओं की सुविधा और लोकतांत्रिक प्रणाली को अधिक समावेशी बनाने के उद्देश्य से समय-समय पर कई नियमों में बड़े बदलाव किए जाते हैं। इसी कड़ी में महिला मतदाताओं, विशेषकर नवविवाहित महिलाओं को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार किया गया है। नए दिशा-निर्देशों के तहत, अब वोटर लिस्ट यानी मतदाता सूची में नाम शामिल कराने या संशोधन कराने के दौरान महिलाओं का वेरिफिकेशन केवल उनके पति के नाम या उनके दस्तावेजों के आधार पर बाध्यकारी नहीं होगा। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की स्वतंत्र पहचान को सुदृढ़ करना और शादी के बाद होने वाले स्थान परिवर्तन व नाम परिवर्तन की जटिल प्रक्रियाओं को पहले के मुकाबले कहीं अधिक सरल व सुगम बनाना है।
अक्सर देखा जाता था कि शादी के बाद जब कोई महिला अपने ससुराल जाती थी, तो नई जगह की वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए उसे अपने पति के पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र या मैरिज सर्टिफिकेट पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता था। यदि किसी कारणवश पति के दस्तावेजों में कोई तकनीकी त्रुटि होती थी, तो महिला का आवेदन भी अधर में लटक जाता था। अब निर्वाचन आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया की निर्भरता को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान इस नए नियम को पूरी तरह से लागू किया जा रहा है, ताकि देश की आधी आबादी को बिना किसी प्रशासनिक बाधा के अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए पंजीकृत किया जा सके।
सत्यापन प्रणाली में नया बदलाव
अब महिलाएं वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने (फॉर्म 6) या सुधार (फॉर्म 8) के लिए स्वयं के नाम से जारी सरकारी दस्तावेजों को आधार बना सकती हैं। वेरिफिकेशन के लिए अब पति के दस्तावेजों का मिलान अनिवार्य शर्त के रूप में लागू नहीं रहेगा।
इस व्यवस्था के लागू होने से उन कामकाजी और स्वतंत्र महिलाओं को सबसे बड़ी राहत मिलेगी, जिनके पास अपने स्वयं के पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या पासपोर्ट मौजूद हैं। अब नए नियमों के अनुसार, यदि कोई विवाहित महिला अपने वोटर आईडी कार्ड में पता बदलना चाहती है या पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा रही है, तो वह अपने स्वयं के दस्तावेजों को मुख्य पते और पहचान के प्रमाण के तौर पर जमा कर सकती है। बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) जब घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन या गणना प्रपत्र भरने का कार्य करेंगे, तो वे केवल इस बात पर जोर नहीं देंगे कि महिला के पास उसके पति के नाम का ही कोई स्थानीय निवास प्रमाण पत्र मौजूद हो।
डिजिटल माध्यमों के विस्तार के इस दौर में निर्वाचन आयोग के वोटर्स सर्विसेज पोर्टल और वोटर हेल्पलाइन एप्लीकेशन पर भी इन बदलावों को तकनीकी रूप से अपडेट कर दिया गया है। जब भी कोई आवेदिका ऑनलाइन माध्यम से फॉर्म 6 या फॉर्म 8 भरने की प्रक्रिया शुरू करेगी, तो उसे रिलेशन टाइप और रिलेशन नेम के कॉलम में अधिक स्वायत्तता और विकल्प दिखाई देंगे। यदि महिला चाहे तो अपने पिता के नाम के साथ ही अपनी पहचान को जारी रख सकती है या फिर अपने नाम से पंजीकृत बिजली बिल, पानी बिल, गैस कनेक्शन या बैंक पासबुक को पते के साक्ष्य के रूप में अपलोड कर सकती है। इससे आवेदनों के निरस्त होने की दर में भारी कमी आने की संभावना है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के विभिन्न चरणों के दौरान यह देखा गया कि बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम केवल इसलिए मतदाता सूची में नहीं जुड़ पाते थे क्योंकि विवाह के तुरंत बाद उनके पास ससुराल के पते का कोई ठोस प्रमाण नहीं होता था और पति के नाम से दस्तावेज बनने में समय लगता था। इस प्रशासनिक देरी के कारण कई महिलाएं चुनावों में अपने वोट डालने के अधिकार से वंचित रह जाती थीं। इस समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के लिए अब स्वयं प्रमाणित दस्तावेजों को प्राथमिकता दी जा रही है। यदि महिला के पास 1 जुलाई 1987 से पूर्व का कोई जन्म प्रमाण पत्र या अन्य कोई वैध सरकारी दस्तावेज है, तो वह केवल उसी एक दस्तावेज के सहारे अपना वेरिफिकेशन पूर्ण करा सकती है।
इसके साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में जहां आज भी महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति उतनी जागरूक नहीं हैं, वहां बूथ लेवल अधिकारियों को विशेष तौर पर प्रशिक्षित किया जा रहा है। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे घर-घर जाकर वेरिफिकेशन करते समय महिलाओं को इस नए नियम के बारे में विस्तार से समझाएं ताकि वे बिना किसी संकोच के अपने नाम वोटर लिस्ट में दर्ज करा सकें। इस नई नीति से देश के भीतर जेंडर रेशियो (लिंगानुपात) के आधार पर मतदाताओं की सूची अधिक संतुलित और सटीक तैयार हो सकेगी, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में महिलाओं की कुल भागीदारी का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर की ओर बढ़ेगा।
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