'हमको जो सही बुझाता है, वही बोलते हैं'- अनंत सिंह का दोटूक बयान; कहा- छिपकर पीने से बढ़ रही है बीमारी और मौतें।
बिहार की राजनीति में अपनी दबंग छवि और बेबाक अंदाज के लिए मशहूर मोकामा के विधायक अनंत सिंह, जिन्हें उनके समर्थक प्यार से 'छोटे
- बिहार में शराबबंदी पर मचेगा घमासान? 'छोटे सरकार' ने अपनी ही सरकार की नीति पर उठाए सवाल, बोले- "शराब चालू होनी चाहिए"
- शराबबंदी के खिलाफ मोकामा विधायक की खुली बगावत; बोले- "जब सब पी ही रहे हैं, तो सरकार को पाबंदी हटाने में कैसी हिचक?"
बिहार की राजनीति में अपनी दबंग छवि और बेबाक अंदाज के लिए मशहूर मोकामा के विधायक अनंत सिंह, जिन्हें उनके समर्थक प्यार से 'छोटे सरकार' भी कहते हैं, ने राज्य की सबसे संवेदनशील नीति यानी शराबबंदी को लेकर एक बड़ा बयान देकर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। हाल ही में एक सार्वजनिक संवाद के दौरान जब उनसे बिहार में लागू शराबबंदी कानून की सफलता पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि उन्हें जो सही लगता है, वह वही बोलते हैं। अनंत सिंह का तर्क है कि राज्य में शराबबंदी का उद्देश्य तो पवित्र था, लेकिन धरातल पर इसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत है। उनके इस बयान ने न केवल विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है, बल्कि सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर भी असहजता की स्थिति पैदा कर दी है। विधायक अनंत सिंह ने अपनी बात को विस्तार से रखते हुए कहा कि जब बिहार में शराबबंदी कानून लाया गया था, तब उन्होंने भी इसका पुरजोर समर्थन किया था। शुरुआती दिनों में इसका असर भी दिखा और समाज में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद जगी थी, लेकिन समय बीतने के साथ यह कानून केवल कागजों तक सीमित होकर रह गया है। अनंत सिंह का दावा है कि आज शहर से लेकर गांव तक लोग धड़ल्ले से शराब पी रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले लोग खुलेआम पीते थे और अब छिपकर पी रहे हैं। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि सड़क पर कोई शराबी नहीं दिखता, इसका मतलब यह नहीं है कि लोग पीना छोड़ चुके हैं; लोग अपने घरों और गुप्त ठिकानों पर अवैध तरीके से उपलब्ध शराब का सेवन कर रहे हैं।
शराबबंदी कानून के दुष्परिणामों पर चर्चा करते हुए अनंत सिंह ने स्वास्थ्य संबंधी खतरों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब से शराब की कानूनी बिक्री बंद हुई है, तब से 'होम डिलीवरी' के नाम पर गलत और मिलावटी शराब का धंधा बढ़ गया है। लोग मजबूरी में "गलत-सलत" नशा कर रहे हैं, जिससे वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। विधायक ने जोर देकर कहा कि शुद्ध शराब न मिलने के कारण लोग देसी जुगाड़ और जहरीली शराब का सहारा ले रहे हैं, जो सीधे तौर पर मौत को निमंत्रण देने जैसा है। उनके अनुसार, शराबबंदी का वर्तमान स्वरूप लोगों के जीवन को सुरक्षित बनाने के बजाय उन्हें और अधिक खतरे में डाल रहा है। अनंत सिंह ने आर्थिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से इस कानून की समीक्षा की मांग की है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार शराब को फिर से चालू कर देती है और इसे कानून के दायरे में लाती है, तो कम से कम लोग सड़क पर पीकर हंगामा करने से डरेंगे। उनके अनुसार, जो लोग कानून तोड़कर सड़क पर पीते हुए पकड़े जाएं, उन्हें सीधे जेल भेजा जाए, लेकिन पाबंदी के नाम पर जिस तरह का काला कारोबार चल रहा है, उसे बंद करना अनिवार्य है। विधायक का मानना है कि शराबबंदी के कारण राज्य को भारी राजस्व की हानि भी हो रही है, जबकि पीने वाले अभी भी ऊंचे दामों पर शराब खरीद रहे हैं, जिससे केवल अपराधियों और माफियाओं की जेबें भर रही हैं।
बिहार शराबबंदी कानून - एक नजर
बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी कानून लागू है। इस कानून के तहत शराब का निर्माण, बिक्री और सेवन पूरी तरह प्रतिबंधित है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में जहरीली शराब से होने वाली मौतों और अदालतों में शराबबंदी से जुड़े मामलों के बोझ के कारण इस कानून की समीक्षा की मांग समय-समय पर उठती रही है।
अपनी पार्टी की विचारधारा से इतर राय रखने के सवाल पर अनंत सिंह ने साफ किया कि वह किसी के दबाव में अपनी बात नहीं बदलते। उन्होंने कहा कि "हमको जो सही बुझाता है, हम वही बोलते हैं," चाहे वह किसी को अच्छा लगे या बुरा। उनके इस तेवर ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी व्यक्तिगत राय को सरकार की नीतियों से ऊपर रखते हैं, खासकर तब जब मामला जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ा हो। उन्होंने यह भी कहा कि वह सरकार नहीं हैं, लेकिन एक जन-प्रतिनिधि होने के नाते समाज में जो देख रहे हैं, उसे बयां करना उनकी जिम्मेदारी है। उनके इस बयान को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पसंदीदा नीति के खिलाफ एक बड़ी बगावत के तौर पर देखा जा रहा है। मोकामा के विधायक के इस बयान का समर्थन करते हुए कई अन्य नेताओं ने भी दबी जुबान में शराबबंदी की समीक्षा की वकालत शुरू कर दी है। विपक्षी दलों का कहना है कि अनंत सिंह ने वही कहा है जो बिहार की कड़वी हकीकत है। जेलों में बंद लाखों गरीब लोगों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि इस कानून का सबसे अधिक प्रहार समाज के निचले तबके पर हुआ है, जबकि बड़े तस्कर और रसूखदार लोग अभी भी सुरक्षित हैं। अनंत सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद नई सरकार के गठन और नीतियों के पुनर्मूल्यांकन की चर्चाएं जोरों पर हैं।
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