लिपिक सहायक ने गलत ढ़ंग से छुआ और .... हरदोई की महिला मुख्य सेविका ने लगाए आरोप, मेहनत कर सपनों को उड़ान देने वाली महिलाओं पर ये कैसी बर्बरता?
देश की लाखों लड़कियां छोटे गांवों से निकलकर शहरों में पढ़ाई करती हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होती हैं और सरकारी या निजी नौकरियां हासिल करती हैं। लेकिन कार्यस्थलों पर पुरुष सहकर्मियों या व
By VIjay Laxmi Singh(Editor-In-Chief)
देशभर में महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे नारे दिए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। छोटे-छोटे गांवों और शहरों से निकलकर मेहनत से पढ़ाई करने वाली लड़कियां जब नौकरी की दहलीज पर कदम रखती हैं, तो अक्सर उन्हें कार्यस्थलों पर गंदी नजर रखने वाले लोगों का शिकार बनना पड़ता है। ऐसी ही एक दिल दहला देने वाली घटना उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से सामने आई है, जहां, हरदोई के जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय की शहर परियोजना में नवनियुक्त मुख्य सेविका कोमल रावत ने जिलाधिकारी को लिखित शिकायत दी है कि कार्यालय के ही लिपिक सहायक कमल कुमार ने उनके साथ बार-बार छेड़खानी की, जबरन गलत ढंग से छुआ, गलत हरकतें करने की कोशिश और हाथ पकड़कर खींचा।
लिखित शिकायत में कोमल रावत ने बताया कि कमल कुमार उन्हें नौकरी से निकलवाने और रिपोर्ट खराब करने की धमकी देता है। वह ट्रेन में भी उनका पीछा करता है और जबरन अपने पास बैठाने की कोशिश करता है। कार्यालय में उसकी मौजूदगी में वह खुद को असुरक्षित महसूस करती है। इससे पहले रेलवे स्टेशन पर भी कमल कुमार ने उनका हाथ खींचा था, जिससे वह बहुत आहत हुई। कोमल रावत ने जिलाधिकारी से मांग की है कि कमल कुमार के खिलाफ तुरंत सख्त कार्रवाई की जाए ताकि वह कार्यालय में सुरक्षित काम कर सकें। शिकायत की प्रति जिला कार्यक्रम अधिकारी को भी भेजी गई है।
यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि देशभर में महिलाओं के सामने आने वाली एक बड़ी समस्या का प्रतीक है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बाल विकास पुष्टाहार विभाग में लगभग 2500 महिलाओं की भर्ती हुई है, जिसमें हरदोई जिले में 67 महिलाओं को नियुक्ति मिली। इनमें से करीब 40-42 अविवाहित लड़कियां हैं, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए घर से निकलीं। लेकिन क्या ऐसी लड़कियां नौकरी पाने के बाद भी सुरक्षित हैं? क्या उन्हें मनोरंजन का साधन समझा जाना चाहिए? इस घटना से साफ है कि कुछ लोग 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारे को उल्टा कर रहे हैं – बेटी अगर पढ़कर आगे बढ़े, तो उसे शोषण का शिकार बनाओ।
देश की लाखों लड़कियां छोटे गांवों से निकलकर शहरों में पढ़ाई करती हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होती हैं और सरकारी या निजी नौकरियां हासिल करती हैं। लेकिन कार्यस्थलों पर कुछ पुरुष सहकर्मियों या वरिष्ठों की गंदी नजरें, छेड़खानी, धमकियां और शोषण की घटनाएं उन्हें डराती रहती हैं। कई मामलों में, जैसे इस घटना में, जब पीड़िता अपनी बात साझा करती है, तो उसे चुप रहने या ट्रांसफर करवाने की सलाह दी जाती है।
इससे साफ जाहिर होता है कि ऐसे विभागों में, जहां 90 प्रतिशत महिलाएं काम करती हैं, शोषण की घटनाएं आम हो गई हैं। विरोध करने वाली महिलाओं को दबाने की कोशिश की जाती है, जिससे अन्य लड़कियां भी चुप रहने पर मजबूर हो जाती हैं। महिलाएं नौकरी करने नहीं, बल्कि समाज में योगदान देने आती हैं। अगर ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साधी गई, तो 'बेटी बचाओ' का नारा सिर्फ कागजों पर रह जाएगा। प्रशासन को चाहिए कि वह महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करें, ताकि वे बिना डर के अपने सपनों को उड़ान दे सकें।
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